sankhya Darshan 100 MCQ with Solution in hindi और उनके सटीक व्याख्या यहां उपलब्ध हैं। यह संग्रह UPSC, SSC, Railway, Bank, Police, CDS, NDA, State PCS, TET, NET, CTET, B.Ed., Defence, Forest Services तथा अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्रों के लिए विशेष रूप से तैयार किया गया है। प्रत्येक प्रश्न के साथ विस्तृत व्याख्या दी गई है, जिससे विषय की गहराई से समझ विकसित हो सके। सांख्य दर्शन भारतीय दर्शन की छह प्रमुख दर्शनों में से एक है, जो तत्वमीमांसा और मोक्ष मार्ग की व्याख्या करता है। इस पोस्ट के माध्यम से छात्र न केवल परीक्षा के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण प्रश्नों का अभ्यास कर पाएंगे, बल्कि सांख्य दर्शन के सिद्धांतों और अवधारणाओं को भी सरल भाषा में समझ सकेंगे।
यह "sankhya Darshan 100 MCQ with Solution" प्रश्न-संग्रह परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण तथ्यों को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है, जिससे अभ्यर्थियों को विषय की गहन समझ प्राप्त हो सके और सफलता की ओर एक मजबूत कदम बढ़ाया जा सके।
सांख्य दर्शन 100 MCQ solution के साथ
Q1. सांख्य दर्शन के प्रवर्तक कौन माने जाते हैं?
A) पतंजलि
B) गौतम
C) कणाद
D) कपिल मुनि
व्याख्या: सांख्य दर्शन के प्रवर्तक कपिल मुनि माने जाते हैं। इन्होंने ‘सांख्य सूत्र’ की रचना की। कपिल मुनि का दर्शन "नास्तिक" दर्शन की श्रेणी में आता है क्योंकि यह ईश्वर की सत्ता को स्वीकार नहीं करता (निर्वीश्वर सांख्य)। उन्होंने सृष्टि के मूल में प्रकृति (जड़) और पुरुष (चेतन) को रखा, और दोनों के संयोग से सृष्टि की उत्पत्ति को समझाया।
Q2. सांख्य दर्शन में कितने तत्त्वों को मूल माना गया है?
A) 25
B) 9
C) 5
D) 7
व्याख्या: सांख्य दर्शन में कुल 25 तत्वों को स्वीकार किया गया है। इन 25 तत्वों में एक पुरुष (चेतन), एक प्रकृति (जड़) और 23 अन्य विकार (प्रकृति से उत्पन्न तत्व) शामिल हैं, जैसे बुद्धि, अहंकार, मन, इंद्रियाँ, तन्मात्राएँ और महाभूत। यह दर्शन ब्रह्मांड की जटिलता को इन 25 तत्वों से समझाता है।
Q3. सांख्य दर्शन के अनुसार सृष्टि की उत्पत्ति किससे होती है?
A) पुरुष
B) आत्मा
C) प्रकृति
D) ईश्वर
व्याख्या: सांख्य दर्शन के अनुसार सृष्टि का मूल कारण "प्रकृति" है, जो जड़ (अचेतन) है। पुरुष (चेतन) केवल साक्षी है। जब पुरुष और प्रकृति का संपर्क होता है, तब प्रकृति में विकार उत्पन्न होते हैं और यही सृष्टि की उत्पत्ति का कारण बनते हैं। इसमें ईश्वर का कोई स्थान नहीं है, यही कारण है कि यह दर्शन 'निर्वीश्वर' है।
Q4. सांख्य दर्शन में ‘पुरुष’ किस तत्व का प्रतीक है?
A) चेतन तत्व
B) जड़ तत्व
C) शरीर
D) अहंकार
व्याख्या: ‘पुरुष’ सांख्य दर्शन का चेतन तत्व है, जो केवल "साक्षी" की भूमिका निभाता है। यह न तो कार्य करता है, न बदलता है, लेकिन यह "अनुभवकर्ता" होता है। जब पुरुष प्रकृति से भिन्नता को पहचान लेता है, तभी वह मोक्ष को प्राप्त करता है।
Q5. सांख्य दर्शन के अनुसार प्रकृति की प्रमुख विशेषता क्या है?
A) निर्गुणता
B) त्रिगुणात्मकता
C) केवल सतोगुण
D) केवल तमोगुण
व्याख्या: सांख्य दर्शन में प्रकृति को त्रिगुणात्मक माना गया है। इसके तीन गुण हैं – सत्त्व (ज्ञान, शांति), रज (क्रिया, गति), और तम (अंधकार, जड़ता)। इन तीनों के असंतुलन से ही सृष्टि का विकास होता है।
Q6. सांख्य दर्शन में ‘अविद्या’ किसे कहा गया है?
A) तप न करना
B) पुरुष और प्रकृति को एक समझना
C) मन की चंचलता
D) भक्ति न करना
व्याख्या: सांख्य दर्शन के अनुसार 'अविद्या' का अर्थ है पुरुष (चेतन) और प्रकृति (जड़) को एक समझना। जब कोई जीव प्रकृति को अपना स्वरूप समझ बैठता है, तभी वह बंधन में पड़ता है। असली ज्ञान इसी भेद को समझने में है।
Q7. सांख्य दर्शन के अनुसार मोक्ष किससे प्राप्त होता है?
A) विवेक ज्ञान से
B) भक्ति से
C) कर्मकांड से
D) ध्यान से
व्याख्या: सांख्य दर्शन में मोक्ष का मार्ग ‘विवेकज्ञान’ है — जब व्यक्ति यह ज्ञान प्राप्त करता है कि "मैं पुरुष हूं, प्रकृति नहीं", तो वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है। यह ज्ञान ही मोक्ष का कारण है, न कि कोई उपासना या यज्ञ।
Q8. सांख्य दर्शन का कौन-सा प्रकार ईश्वर की सत्ता को नहीं मानता?
A) सैवश्वर सांख्य
B) वेदांत
C) निर्वीश्वर सांख्य
D) योग दर्शन
व्याख्या: सांख्य दर्शन के दो रूप हैं – निर्वीश्वर (Kapil's Samkhya) और सैवश्वर (Ishwar Krishna’s Samkhya)। कपिल का निर्वीश्वर सांख्य ईश्वर को नहीं मानता। यह दर्शन केवल प्रकृति और पुरुष को ही ब्रह्मांड के मूल कारण मानता है।
Q9. सांख्य दर्शन के अनुसार बुद्धि उत्पन्न होती है:
A) पुरुष से
B) आत्मा से
C) ईश्वर से
D) प्रकृति से
व्याख्या: सांख्य दर्शन के अनुसार, जब प्रकृति की तीनों गुणों में असंतुलन उत्पन्न होता है, तब सबसे पहले 'बुद्धि' की उत्पत्ति होती है। बुद्धि निर्णय और विवेक का स्थान है। इसे महत् तत्व भी कहा जाता है।
Q10. सांख्य दर्शन में प्रकृति को किस रूप में माना गया है?
A) मूल कारण
B) पुरुष का परिणाम
C) ईश्वर की शक्ति
D) भौतिक संसार
व्याख्या: सांख्य दर्शन में प्रकृति को "मूल कारण" (प्रकृति = मूलप्रकृति) माना गया है। इसका अर्थ है कि समस्त सृष्टि का आरंभिक स्रोत प्रकृति है — जिससे बुद्धि, अहंकार, मन, इंद्रियाँ आदि उत्पन्न होते हैं। यह स्वतः क्रियाशील होती है।
Q11. सांख्य दर्शन में 'अहंकार' किससे उत्पन्न होता है?
A) पुरुष
B) प्रकृति
C) बुद्धि
D) मन
व्याख्या: सांख्य दर्शन के अनुसार, प्रकृति से बुद्धि (महत्तत्त्व) उत्पन्न होती है और बुद्धि से 'अहंकार' उत्पन्न होता है। अहंकार का अर्थ है 'मैं' की भावना। यही तत्व तन्मात्राओं, इंद्रियों और मन की उत्पत्ति का कारण बनता है। यह ब्रह्मांडीय विकास की तीसरी कड़ी है।
Q12. सांख्य दर्शन में इंद्रियों को किस श्रेणी में रखा गया है?
A) अंतःकरण के अवयव
B) पंचमहाभूत
C) पुरुष के विकार
D) आत्मा के गुण
व्याख्या: सांख्य दर्शन में इंद्रियाँ अहंकार से उत्पन्न होती हैं और इन्हें ‘ज्ञानेन्द्रियाँ’ (श्रवण, चक्षु, त्वचा, रसना, घ्राण) तथा ‘कर्मेन्द्रियाँ’ (वाणी, पाणि, पाद, पायु, उपस्थ) के रूप में वर्गीकृत किया गया है। इन्हें अंतःकरण के सहायक अंग माना गया है।
Q13. सांख्य दर्शन में ‘मन’ को किस श्रेणी में रखा गया है?
A) बुद्धि
B) आत्मा
C) इंद्रिय
D) तन्मात्रा
व्याख्या: मन को सांख्य दर्शन में ग्यारहवीं इंद्रिय माना गया है। यह अन्य दस इंद्रियों का समन्वय करने वाला तत्व है। यह न तो केवल ज्ञानेन्द्रिय है और न ही केवल कर्मेन्द्रिय — बल्कि यह निर्णय न करने वाला, संकल्प-विकल्प करने वाला उपकरण है।
Q14. सांख्य दर्शन के अनुसार ‘तन्मात्राएँ’ कितनी होती हैं?
A) 3
B) 7
C) 10
D) 5
व्याख्या: तन्मात्राएँ पांच होती हैं — शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध। ये सूक्ष्म गुण हैं जो पंचमहाभूतों की सूक्ष्म अवस्थाएँ हैं। इन्हीं से आगे चलकर पाँच भौतिक तत्व (आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी) उत्पन्न होते हैं।
Q15. सांख्य दर्शन में ‘पुरुष’ की संख्या कितनी मानी गई है?
A) अनेक
B) केवल एक
C) दो
D) दस
व्याख्या: सांख्य दर्शन में पुरुष की संख्या 'अनेक' मानी गई है। प्रत्येक जीव में अलग-अलग पुरुष होते हैं। इसका कारण यह है कि जन्म, मृत्यु, कर्मफल आदि भिन्न-भिन्न अनुभव होते हैं, जो केवल अनेक चेतन सत्ता (पुरुष) के होने से ही संभव है।
Q16. सांख्य दर्शन के अनुसार मोक्ष की स्थिति कैसी होती है?
A) स्वर्ग प्राप्ति
B) ज्ञान प्राप्ति के बाद प्रकृति से पृथक्करण
C) पुनर्जन्म का चक्र
D) ईश्वर का साक्षात्कार
व्याख्या: सांख्य दर्शन में मोक्ष का तात्पर्य है — जब पुरुष को यह ज्ञान हो जाता है कि वह प्रकृति से भिन्न है। इस ज्ञान से प्रकृति की क्रियाशीलता समाप्त नहीं होती, लेकिन पुरुष उससे असंग होकर साक्षी बन जाता है। यही मुक्ति की स्थिति है — दुख से परे, निर्विकारी, स्थायी।
Q17. सांख्य दर्शन किस प्रकार का दर्शन है?
A) द्वैतवादी
B) अद्वैतवादी
C) शून्यवाद
D) विशिष्टाद्वैत
व्याख्या: सांख्य दर्शन ‘द्वैतवादी’ दर्शन है क्योंकि यह दो स्वतंत्र तत्त्वों — 'प्रकृति' (जड़) और 'पुरुष' (चेतन) — को स्वीकार करता है। दोनों अनादि, नित्य और स्वतंत्र हैं। इनका संयोग ही बंधन और पृथक्करण ही मोक्ष का कारण है।
Q18. सांख्य दर्शन किस वेद या उपनिषद से प्रभावित माना जाता है?
A) कठ उपनिषद
B) ईश उपनिषद
C) श्वेताश्वतर उपनिषद
D) मुण्डक उपनिषद
व्याख्या: श्वेताश्वतर उपनिषद में सांख्य दर्शन के तत्व – प्रकृति और पुरुष की चर्चा स्पष्ट रूप से मिलती है। यहाँ ‘प्रकृति’ को त्रिगुणात्मक और ‘पुरुष’ को साक्षी बताया गया है। इस उपनिषद ने योग और सांख्य को संयोजन करने की भी कोशिश की है।
Q19. सांख्य दर्शन में ज्ञान का स्रोत क्या है?
A) केवल प्रत्यक्ष
B) केवल अनुमान
C) प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द
D) केवल वेद
व्याख्या: सांख्य दर्शन तीन प्रमाणों को मानता है – प्रत्यक्ष (इंद्रियों द्वारा अनुभव), अनुमान (तर्क आधारित ज्ञान) और आप्तवाक्य (शब्द – योग्य व्यक्ति द्वारा कहा गया सत्य)। इनसे ही तत्वज्ञान का विकास होता है और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।
Q20. सांख्य दर्शन का मुख्य उद्देश्य क्या है?
A) दुःखों से मुक्ति
B) भौतिक सुख प्राप्त करना
C) स्वर्ग प्राप्त करना
D) ईश्वर की प्राप्ति
व्याख्या: सांख्य दर्शन का मुख्य उद्देश्य है — **‘दुःखों की निवृत्ति’**। यह दर्शन कहता है कि जब पुरुष प्रकृति से अपने को पृथक जान लेता है, तभी सभी दुःखों से छुटकारा मिलता है। यह ज्ञान ही मोक्ष है। यह व्यवहारिक और दार्शनिक दोनों दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
Q21. सांख्य दर्शन के अनुसार 'प्रकृति' की उत्पत्ति किससे हुई है?
A) पुरुष से
B) बुद्धि से
C) प्रकृति अनादि है, किसी से उत्पन्न नहीं हुई
D) ईश्वर से
व्याख्या: सांख्य दर्शन में ‘प्रकृति’ को अनादि और नित्य माना गया है, अर्थात इसकी कोई उत्पत्ति नहीं है। यह स्वयंभू है और सृष्टि की समस्त भौतिकता का मूल स्रोत है। प्रकृति जड़ होते हुए भी परिवर्तनशील है, जबकि पुरुष चेतन लेकिन अक्रिय होता है।
Q22. सांख्य दर्शन में ‘प्रकृति’ को कौन-से गुणों का संयोग कहा गया है?
A) धर्म, अर्थ, काम
B) सत्त्व, रज, तम
C) अहंकार, मन, बुद्धि
D) ज्ञान, भक्ति, कर्म
व्याख्या: प्रकृति को त्रिगुणात्मक माना गया है — सत्त्व (प्रकाश/ज्ञान), रज (क्रिया/गतिशीलता), और तम (जड़ता/अवरोध)। इन तीनों गुणों का संतुलन ही प्रकृति की "प्रकृत" अवस्था है। जब यह संतुलन बिगड़ता है, तभी सृष्टि की प्रक्रिया प्रारंभ होती है।
Q23. सांख्य दर्शन के अनुसार ‘पुरुष’ का मूल कार्य क्या है?
A) केवल साक्षी बनकर देखना
B) सृष्टि की रचना करना
C) मनुष्य का निर्माण करना
D) कर्मफल देना
व्याख्या: पुरुष न तो कोई कार्य करता है, न ही किसी कार्य में बाधा डालता है। उसका कार्य मात्र साक्षी भाव से प्रकृति की गतिविधियों को देखना होता है। इसी साक्षी की उपस्थिति से प्रकृति सृष्टि की प्रक्रिया शुरू करती है।
Q24. सांख्य दर्शन में ‘मोक्ष’ को किस रूप में परिभाषित किया गया है?
A) ईश्वर की प्राप्ति
B) आत्मा का ब्रह्म में विलय
C) स्वर्ग की प्राप्ति
D) प्रकृति और पुरुष का विवेकपूर्वक पृथक्करण
व्याख्या: सांख्य दर्शन में मोक्ष का अर्थ है — पुरुष को यह ज्ञान हो जाना कि वह प्रकृति से भिन्न है। जब यह विवेक उत्पन्न होता है, तब पुरुष प्रकृति की क्रियाओं में उलझता नहीं और वह दुखों से मुक्त हो जाता है। इसे ही कैवल्य या मोक्ष कहते हैं।
Q25. सांख्य दर्शन का कौन-सा सिद्धांत ईश्वर की सत्ता को नकारता है?
A) सैवश्वरवाद
B) निर्वीश्वरवाद
B) वेदांतवाद
D) भागवतवाद
व्याख्या: सांख्य दर्शन में कपिल मुनि द्वारा प्रतिपादित 'निर्वीश्वरवाद' ईश्वर की सत्ता को अस्वीकार करता है। इसमें सृष्टि का कारण केवल प्रकृति और पुरुष को माना गया है। यह दर्शन तर्क और अनुभव पर आधारित है, न कि ईश्वर-आश्रित उपासना पर।
Q26. सांख्य दर्शन में ‘बुद्धि’ को किस नाम से भी जाना जाता है?
A) महत्
B) हिरण्यगर्भ
C) अव्यक्त
D) आत्मा
व्याख्या: सांख्य दर्शन में बुद्धि को ‘महत्’ नाम से भी जाना जाता है। जब प्रकृति में विकार उत्पन्न होता है, तो सबसे पहले ‘महत्’ या बुद्धि की उत्पत्ति होती है। यह विवेकशील और निर्णय-क्षम तत्व है, जिससे आगे ‘अहंकार’ की उत्पत्ति होती है।
Q27. सांख्य दर्शन में ‘प्रकृति’ को क्यों माना गया है?
A) चेतन तत्व
B) पुरुष का विस्तार
C) समस्त जड़ जगत का मूल कारण
D) ब्रह्म का अंश
व्याख्या: सांख्य दर्शन के अनुसार प्रकृति ही समस्त जड़ जगत — जैसे पंचमहाभूत, इंद्रियाँ, मन, बुद्धि — का मूल कारण है। यह जड़ होते हुए भी क्रियाशील होती है, और पुरुष की उपस्थिति से सृष्टि की प्रक्रिया प्रारंभ करती है।
Q28. किस दर्शन ने सबसे पहले 'त्रिगुण सिद्धांत' को प्रतिपादित किया?
A) वेदांत दर्शन
B) सांख्य दर्शन
C) योग दर्शन
D) वैशेषिक दर्शन
व्याख्या: 'त्रिगुण सिद्धांत' — सत्त्व, रज, तम — को सबसे पहले सांख्य दर्शन में व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किया गया। यही सिद्धांत आगे योग, वेदांत और आयुर्वेद में भी स्वीकार किया गया। यह विश्व की सृजनात्मक शक्ति को समझने का दार्शनिक आधार है।
Q29. ‘कैवल्य’ शब्द का प्रयोग सांख्य दर्शन में किसके लिए किया गया है?
A) मोक्ष
B) ध्यान
C) अहंकार
D) बुद्धि
व्याख्या: 'कैवल्य' का अर्थ है — पूर्ण स्वतंत्रता। सांख्य दर्शन में यह पुरुष की प्रकृति से पूर्ण मुक्ति की अवस्था है, जब पुरुष मात्र साक्षी रहता है और प्रकृति की सभी क्रियाएँ रुक जाती हैं। यही मोक्ष या अंतिम मुक्ति की अवस्था मानी जाती है।
Q30. सांख्य दर्शन का ग्रंथ ‘सांख्य कारिका’ किसने लिखा?
A) पतंजलि
B) कपिल मुनि
C) ईश्वरकृष्ण
D) बृहस्पति
व्याख्या: 'सांख्य कारिका' ग्रंथ की रचना आचार्य ईश्वरकृष्ण ने की थी। यह ग्रंथ सांख्य दर्शन के सूत्रों को कारिका (श्लोक) रूप में प्रस्तुत करता है और कपिल मुनि के मूल सिद्धांतों को व्यवस्थित रूप में समझाता है।
Q31. सांख्य दर्शन के अनुसार दुख का मूल कारण क्या है?
A) ईश्वर की अवज्ञा
B) इंद्रिय सुखों की लालसा
C) कर्मों का फल
D) पुरुष और प्रकृति का असंवेदनशील संयोग
व्याख्या: सांख्य दर्शन में दुख का कारण पुरुष (चेतन) और प्रकृति (जड़) का संपर्क या संयोग है। जब पुरुष प्रकृति के विकारों को अपना मान लेता है, तब अज्ञान उत्पन्न होता है, और वही दुख का मूल कारण बनता है। इसका समाधान 'विवेक ज्ञान' है।
Q32. सांख्य दर्शन के अनुसार ज्ञान प्राप्ति का अंतिम उद्देश्य क्या है?
A) मोक्ष या कैवल्य की प्राप्ति
B) ईश्वर भक्ति
C) स्वर्ग प्राप्ति
D) कर्म सिद्धि
व्याख्या: सांख्य दर्शन में ज्ञान का उद्देश्य केवल सूचना नहीं है, बल्कि पुरुष को प्रकृति से अलग समझने की बौद्धिक विवेकता प्राप्त करना है। जब यह ज्ञान होता है कि "मैं पुरुष हूँ, प्रकृति नहीं", तभी व्यक्ति मोक्ष को प्राप्त करता है — जिसे ‘कैवल्य’ कहा जाता है।
Q33. सांख्य दर्शन में किस तत्व को 'अनुभवकर्ता' कहा गया है?
A) प्रकृति
N) पुरुष
C) बुद्धि
D) मन
व्याख्या: पुरुष को सांख्य दर्शन में ‘अनुभवकर्ता’ कहा गया है, क्योंकि वह चेतन है और अनुभव करता है। जबकि प्रकृति और उसके विकार (बुद्धि, अहंकार, मन, इंद्रियाँ) केवल कार्यकर्ता हैं। पुरुष स्वयं कुछ नहीं करता, लेकिन उसमें अनुभव करने की शक्ति है।
Q34. सांख्य दर्शन की दृष्टि में ‘प्रकृति’ किस प्रकार का तत्व है?
A) चेतन
B) पुरुष का विकार
C) आत्मा का स्वरूप
D) जड़, परंतु सक्रिय
व्याख्या: प्रकृति को सांख्य दर्शन में ‘जड़’ माना गया है — अर्थात उसमें चेतना नहीं है, लेकिन यह अत्यंत सक्रिय है। जब पुरुष की उपस्थिति होती है, तब प्रकृति की त्रिगुणात्मक शक्तियाँ कार्य में आकर संपूर्ण सृष्टि की उत्पत्ति करती हैं।
Q35. किस दर्शन का प्रभाव योग दर्शन पर सबसे अधिक पड़ा है?
A) वेदांत दर्शन
B) सांख्य दर्शन
C) न्याय दर्शन
D) वैशेषिक दर्शन
व्याख्या: योग दर्शन का आधारभूत ढाँचा सांख्य दर्शन से लिया गया है। पतंजलि का योगसूत्र ‘सांख्य दर्शन’ की तत्वमीमांसा को मानते हुए उसमें ‘ईश्वर’ को जोड़ता है। अतः योग और सांख्य दर्शन को प्रायः ‘सहधर्मी’ माना जाता है।
Q36. सांख्य दर्शन में पुरुष और प्रकृति का संयोग किसके लिए होता है?
A) पुरुष के अनुभव हेतु
B) ईश्वर की कृपा हेतु
C) कर्म सिद्धि हेतु
D) ब्रह्मज्ञान हेतु
व्याख्या: सांख्य दर्शन के अनुसार पुरुष का प्रकृति से संयोग केवल अनुभव के लिए होता है। प्रकृति पुरुष को अनुभव प्रदान करती है — सुख, दुख, ज्ञान, अज्ञान। जब पुरुष यह भेद जान लेता है कि वह प्रकृति से भिन्न है, तभी यह संयोग समाप्त होता है।
Q37. सांख्य दर्शन में ‘विकृति’ शब्द किसके लिए प्रयुक्त होता है?
A) पुरुष
B) प्रकृति से उत्पन्न तत्व
C) आत्मा
D) ईश्वर
व्याख्या: ‘विकृति’ का अर्थ होता है — वह जो किसी अन्य से उत्पन्न हुआ हो। सांख्य दर्शन में प्रकृति को ‘प्रकृति’ और उससे उत्पन्न 23 तत्वों (बुद्धि, अहंकार, मन, इंद्रियाँ, तन्मात्रा, महाभूत आदि) को ‘विकृति’ कहा जाता है।
Q38. सांख्य दर्शन में ‘अव्यक्त’ शब्द किसके लिए प्रयोग होता है?
A) पुरुष
B) बुद्धि
C) प्रकृति
D) तन्मात्रा
व्याख्या: ‘अव्यक्त’ का अर्थ है — जो व्यक्त नहीं हुआ है, अर्थात अप्रकट। सांख्य दर्शन में प्रकृति को 'अव्यक्त' कहा गया है क्योंकि वह सृष्टि के प्रारंभ में अव्यक्त अवस्था में रहती है। जब उसमें असंतुलन होता है, तब ‘व्यक्त’ रूपों (बुद्धि, अहंकार, आदि) की उत्पत्ति होती है।
Q39. सांख्य दर्शन की गिनती किस प्रकार के दर्शनों में होती है?
A) आस्तिक दर्शन
B) नास्तिक दर्शन
C) लोकायत दर्शन
D) शून्यवाद
व्याख्या: भले ही सांख्य दर्शन ईश्वर को नहीं मानता, फिर भी यह वेदों को प्रमाण मानता है, इसलिए इसे 'आस्तिक दर्शन' कहा गया है। भारत के छह आस्तिक दर्शनों में से यह एक प्रमुख दर्शन है — सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा, वेदांत।
Q40. ‘प्रकृति’ को किस रूप में मोक्ष के मार्ग में बाधा माना गया है?
A) क्योंकि वह ईश्वर की शक्ति है
B) क्योंकि वह असत्य है
C) क्योंकि वह आत्मा को नष्ट कर देती है
D) अविद्या के कारण पुरुष उसमें फँस जाता है
व्याख्या: प्रकृति स्वयं मोक्ष में बाधा नहीं है, लेकिन जब पुरुष अज्ञानवश प्रकृति को अपना स्वरूप मान लेता है, तो वह बंधन में पड़ जाता है। यह 'अविद्या' ही मोक्ष के मार्ग में बाधा है। विवेक के द्वारा जब पुरुष यह पहचान लेता है कि वह प्रकृति से भिन्न है, तभी मोक्ष संभव है।
Q41. सांख्य दर्शन में पुरुष और प्रकृति दोनों को किस रूप में माना गया है?
A) अनादि और नित्य
B) नश्वर
C) अव्यक्त और व्यक्त
D) एक-दूसरे पर आश्रित
व्याख्या: सांख्य दर्शन में पुरुष (चेतन तत्व) और प्रकृति (जड़ तत्व) दोनों को अनादि (जिसकी कोई उत्पत्ति नहीं) और नित्य (शाश्वत) माना गया है। ये दोनों स्वतंत्र सत्ता हैं। सृष्टि का आरंभ इन दोनों के संयोग से होता है, लेकिन दोनों का अस्तित्व एक-दूसरे पर निर्भर नहीं है।
Q42. सांख्य दर्शन में इंद्रियों को कितनी श्रेणियों में विभाजित किया गया है?
A) दो – ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ
B) एक – केवल ज्ञानेन्द्रियाँ
C) तीन – ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ और मन
D) चार
व्याख्या: सांख्य दर्शन में इंद्रियों को दो भागों में बांटा गया है — (1) ज्ञानेन्द्रियाँ (श्रवण, चक्षु, घ्राण, रसना, त्वचा) जो ज्ञान देती हैं और (2) कर्मेन्द्रियाँ (वाणी, पाणि, पाद, पायु, उपस्थ) जो कर्म कराती हैं। मन को ग्यारहवीं इंद्रिय कहा गया है, जो इन दोनों का संयोजन करता है।
Q43. सांख्य दर्शन में ‘मन’ की क्या भूमिका है?
B) निर्णय लेने वाली
C) अनुभवकर्ता
A) समन्वयक की
D) चेतन तत्व
व्याख्या: सांख्य दर्शन के अनुसार मन का कार्य है — ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों का समन्वय करना। यह 'संकल्प-विकल्प' करता है, लेकिन निर्णय नहीं लेता — निर्णय बुद्धि का कार्य है। इसलिए मन को इंद्रियों और बुद्धि के बीच का 'संचार केंद्र' कहा गया है।
Q44. सांख्य दर्शन में किस तत्त्व से समस्त सृष्टि की उत्पत्ति होती है?
A) प्रकृति
B) पुरुष
C) आत्मा
D) ईश्वर
व्याख्या: सांख्य दर्शन के अनुसार पूरी सृष्टि प्रकृति से उत्पन्न होती है। यह प्रकृति ही बुद्धि, अहंकार, मन, इंद्रियाँ, तन्मात्रा और पंचमहाभूत आदि की जननी है। पुरुष केवल साक्षी है, वह सृष्टि की रचना नहीं करता।
Q45. ‘सांख्य’ शब्द का शाब्दिक अर्थ क्या है?
A) शून्यता
B) संयम
C) संकल्प
D) संख्या या विवेचन
व्याख्या: 'सांख्य' शब्द ‘संख्या’ या ‘विवेचन’ से बना है, जिसका अर्थ है — तत्वों की गणना या तर्क द्वारा विश्लेषण। सांख्य दर्शन ने सृष्टि के तत्वों (24 प्रकृतिक + 1 पुरुष = 25) की स्पष्ट रूप से संख्या करके तात्त्विक विवेचन किया है।
Q46. सांख्य दर्शन के अनुसार कौन-सा तत्त्व परिवर्तनशील नहीं है?
A) प्रकृति
B) पुरुष
C) बुद्धि
D) अहंकार
व्याख्या: पुरुष को सांख्य दर्शन में शुद्ध, नित्य, अविकारी और केवल साक्षी कहा गया है। यह न कभी बदलता है, न किसी कर्म में लिप्त होता है। जबकि प्रकृति और उसके समस्त विकार (बुद्धि, अहंकार, आदि) परिवर्तनशील और नश्वर हैं।
Q47. सांख्य दर्शन में 'ज्ञान' किस प्रकार प्राप्त होता है?
A) तप से
B) भक्ति से
C) विवेक से
D) पूजा से
व्याख्या: सांख्य दर्शन में मुक्ति का मार्ग है — विवेक ज्ञान। जब मनुष्य विवेक से यह भेद जान लेता है कि “मैं पुरुष हूँ, प्रकृति नहीं”, तब वह प्रकृति के विकारों से अलग होकर कैवल्य को प्राप्त करता है।
Q48. सांख्य दर्शन में ‘सृष्टि’ की प्रक्रिया किस स्थिति से प्रारंभ होती है?
A) प्रकृति में त्रिगुणों के असंतुलन से
B) पुरुष की इच्छा से
C) ईश्वर की प्रेरणा से
D) मन की क्रिया से
व्याख्या: जब प्रकृति के त्रिगुण (सत्त्व, रज, तम) में संतुलन बिगड़ता है, तब सृष्टि का आरंभ होता है। यह असंतुलन पुरुष की साक्षी रूप उपस्थिति से होता है, न कि उसकी इच्छा से। इसी से बुद्धि, अहंकार, इंद्रियाँ आदि क्रमशः उत्पन्न होते हैं।
Q49. सांख्य दर्शन में कितने मूल तत्वों (तत्त्वों) की चर्चा की गई है?
A) 24
B) 23
C) 26
D) 25
व्याख्या: सांख्य दर्शन में कुल 25 तत्त्व माने गए हैं — जिनमें 24 हैं प्रकृति के विकार (बुद्धि, अहंकार, मन, इंद्रियाँ, तन्मात्राएँ, पंचमहाभूत आदि) और 25वाँ तत्त्व है ‘पुरुष’, जो चेतन, शुद्ध और साक्षी है।
Q50. सांख्य दर्शन में मोक्ष किसे कहा गया है?
A) प्रकृति और पुरुष के विवेकपूर्वक पृथक्करण को
B) स्वर्ग प्राप्ति को
C) तपस्या को
D) ईश्वर की कृपा को
व्याख्या: मोक्ष का तात्पर्य है — पुरुष और प्रकृति का विवेकपूर्वक ज्ञान के माध्यम से पृथक्करण। जब पुरुष जान लेता है कि वह केवल साक्षी है और प्रकृति के कार्यकलापों से असंबद्ध है, तब वह बंधन से मुक्त हो जाता है।
Q51. सांख्य दर्शन में ‘तन्मात्रा’ शब्द का तात्पर्य किससे है?
A) सूक्ष्म तत्व जो इंद्रिय ज्ञान का आधार हैं
B) मन
C) पंचमहाभूत
D) कर्मेन्द्रियाँ
व्याख्या: ‘तन्मात्रा’ का अर्थ है – सूक्ष्म तत्त्व, जो ज्ञानेन्द्रियों के आधार होते हैं। ये पाँच होते हैं – शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध। इन्हीं तन्मात्राओं से आगे चलकर पंचमहाभूत (आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी) की उत्पत्ति होती है।
Q52. सांख्य दर्शन के अनुसार ‘बुद्धि’ की उत्पत्ति किससे हुई है?
A) प्रकृति
B) पुरुष
C) अहंकार
D) मन
व्याख्या: सांख्य दर्शन में सृष्टि की प्रक्रिया में सबसे पहले प्रकृति से ‘बुद्धि’ (महत्) की उत्पत्ति होती है। यह बुद्धि निर्णय लेने वाली शक्ति है और इसके बाद अहंकार की उत्पत्ति होती है। यह ज्ञानात्मक क्रम को दर्शाता है।
Q53. अहंकार की उत्पत्ति किससे मानी गई है?
A) प्रकृति से
B) मन से
C) इन्द्रियों से
D) बुद्धि से
व्याख्या: सांख्य दर्शन में कहा गया है कि बुद्धि से अहंकार की उत्पत्ति होती है। यह ‘मैं’ भाव उत्पन्न करने वाला तत्त्व है, जो आगे ज्ञानेन्द्रियों, कर्मेन्द्रियों, मन और तन्मात्राओं को उत्पन्न करता है।
Q54. सांख्य दर्शन में ‘त्रिगुणों’ को किस रूप में माना गया है?
A) प्रकृति के मूल गुण
B) पुरुष के लक्षण
C) कर्म के प्रकार
D) मोक्ष की अवस्थाएँ
व्याख्या: सत्त्व, रज और तम को ‘त्रिगुण’ कहते हैं, जो प्रकृति के मूल गुण हैं। ये तीनों गुण ही प्रकृति की गतिविधियों का कारण हैं। जब ये संतुलन में होते हैं, तब प्रकृति अव्यक्त अवस्था में रहती है। असंतुलन से सृष्टि आरंभ होती है।
Q55. सांख्य दर्शन किस प्रकार का दर्शन है?
A) अद्वैतवाद
B) शून्यवाद
C) द्वैतवाद
D) नास्तिकवाद
व्याख्या: सांख्य दर्शन एक द्वैतवादी दर्शन है, क्योंकि यह दो स्वतंत्र तत्त्वों को मानता है – ‘पुरुष’ (चेतन) और ‘प्रकृति’ (जड़)। दोनों का अस्तित्व अलग-अलग है और सृष्टि का आधार इन्हीं का संयोग है।
Q56. सांख्य दर्शन के अनुसार पुरुष की संख्या क्या है?
A) एक
B) दो
C) चार
D) अनेक
व्याख्या: सांख्य दर्शन के अनुसार पुरुष एक नहीं, अनेक हैं। प्रत्येक जीव में अलग-अलग पुरुष हैं, जो चेतन और साक्षी स्वरूप होते हैं। यदि पुरुष एक होता, तो एक के मुक्त होने से सब मुक्त हो जाते, जो व्यावहारिक नहीं है।
Q57. सांख्य दर्शन किस प्रकार के प्रमाणों को मान्यता देता है?
A) प्रत्यक्ष, अनुमान, शाब्द
B) केवल प्रत्यक्ष
C) प्रत्यक्ष और अनुमेय
D) केवल वेद
व्याख्या: सांख्य दर्शन तीन प्रमाणों को स्वीकार करता है – प्रत्यक्ष (प्रत्यक्ष अनुभव), अनुमान (तर्क), और शाब्द (श्रुति या वेदवाक्य)। ये तीनों ज्ञान प्राप्ति के स्रोत हैं। सांख्य दर्शन में तर्क का विशेष स्थान है।
Q58. सांख्य दर्शन में कौन-सा तत्व कर्म करता है?
A) पुरुष
B) प्रकृति
C) आत्मा
D) ब्रह्म
व्याख्या: सांख्य दर्शन के अनुसार सभी क्रियाएँ प्रकृति द्वारा होती हैं — चाहे वह मन की हो, बुद्धि की, या इंद्रियों की। पुरुष केवल साक्षी है, वह स्वयं कोई क्रिया नहीं करता। प्रकृति ही ‘कर्मकर्ता’ है।
Q59. सांख्य दर्शन में सृष्टि का अंत कब होता है?
A) जब पुरुष इच्छा करे
B) जब त्रिगुण संतुलन में आ जाएं
C) जब ईश्वर उसे नष्ट करे
D) जब ज्ञान प्राप्त हो
व्याख्या: सृष्टि की उत्पत्ति प्रकृति में त्रिगुणों के असंतुलन से होती है, और जब यह असंतुलन पुनः संतुलन में आ जाता है, तब सृष्टि का अंत हो जाता है। यह एक चक्र है — उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय।
Q60. सांख्य दर्शन की कौन-सी शाखा ईश्वर को स्वीकार करती है?
A) सैवश्वर सांख्य
B) निर्वीश्वर सांख्य
C) योग दर्शन
D) वेदांत दर्शन
व्याख्या: सांख्य दर्शन की दो शाखाएं मानी जाती हैं – (1) निर्वीश्वर सांख्य (जो ईश्वर को नहीं मानती, कपिल मुनि द्वारा प्रतिपादित) और (2) सैवश्वर सांख्य, जो ईश्वर की सत्ता को मानती है। बाद में योग दर्शन ने सैवश्वर सांख्य को अपनाया।
Q61. सांख्य दर्शन के अनुसार 'कैवल्य' क्या है?
A) ईश्वर का साक्षात्कार
B) आत्मा का विलय
C) पुरुष की स्वतंत्र अवस्था
D) स्वर्ग प्राप्ति
व्याख्या: ‘कैवल्य’ का अर्थ है – अकेलापन या पूर्ण स्वतंत्रता। सांख्य दर्शन में कैवल्य का तात्पर्य उस स्थिति से है जहाँ पुरुष प्रकृति से पूरी तरह पृथक होकर केवल अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है। यही मोक्ष या मुक्ति की अंतिम अवस्था है।
Q62. सांख्य दर्शन के अनुसार बुद्धि का मुख्य कार्य क्या है?
A) निर्णय लेना
B) संकल्प-विकल्प करना
C) अनुभव करना
D) संवेदन देना
व्याख्या: बुद्धि का कार्य ‘विनिश्चय’ यानी निर्णय करना होता है। यह ज्ञानेन्द्रियों और मन द्वारा प्राप्त सूचनाओं का विश्लेषण कर निर्णय देती है। मन केवल संकल्प-विकल्प करता है, जबकि बुद्धि अंतिम निर्णय लेती है।
Q63. सांख्य दर्शन में 'अविद्या' का अर्थ क्या है?
A) वेदों की अनभिज्ञता
B) भक्ति का अभाव
C) पाप कर्म
D) पुरुष और प्रकृति को एक मानना
व्याख्या: सांख्य दर्शन में ‘अविद्या’ का अर्थ है — जब पुरुष स्वयं को प्रकृति या प्रकृति के विकारों (जैसे मन, बुद्धि) के साथ भ्रमवश जोड़ लेता है। यही अज्ञान बंधन का कारण है। विवेक द्वारा इस भ्रम को दूर करना ही मोक्ष का मार्ग है।
Q64. सांख्य के अनुसार ‘सृष्टि की उत्पत्ति’ का कारण क्या है?
A) पुरुष की उपस्थिति में प्रकृति के त्रिगुणों का असंतुलन
B) ईश्वर की इच्छा
C) आत्मा की इच्छा
D) पंचमहाभूतों की क्रिया
व्याख्या: सांख्य दर्शन में सृष्टि की उत्पत्ति ईश्वर से नहीं मानी गई है। यह प्रकृति के त्रिगुणों (सत्त्व, रज, तम) में पुरुष की निकटता के कारण उत्पन्न असंतुलन से होती है। पुरुष केवल साक्षी होता है, सृष्टि में सक्रिय नहीं।
Q65. सांख्य दर्शन के अनुसार मुक्ति किससे होती है?
A) तपस्या से
B) पूजा से
C) दान से
D) विवेक ज्ञान से
व्याख्या: सांख्य दर्शन में मुक्ति का मार्ग है – ‘विवेक ज्ञान’। जब पुरुष जान लेता है कि वह प्रकृति नहीं है, और सभी कर्म, सुख-दुख प्रकृति के हैं – तब वह बंधन से मुक्त हो जाता है। यही कैवल्य या मोक्ष है।
Q66. सांख्य के अनुसार बुद्धि किसके द्वारा प्रभावित होती है?
A) पुरुष द्वारा
B) त्रिगुणों द्वारा
C) ईश्वर द्वारा
D) मन द्वारा
व्याख्या: बुद्धि, जो प्रकृति का विकार है, त्रिगुणों (सत्त्व, रज, तम) से प्रभावित होती है। जब बुद्धि में सत्त्व अधिक होता है, तब विवेक उत्पन्न होता है और जब रज-तम प्रभावी होते हैं, तब मोह, क्रोध, अहंकार आदि बढ़ते हैं।
Q67. सांख्य दर्शन के अनुसार अहंकार कितने प्रकार का होता है?
A) तीन – सात्त्विक, राजसिक, तामसिक
B) दो – आभासिक और वास्तविक
C) चार
D) एक
व्याख्या: सांख्य में अहंकार को त्रिगुणों के आधार पर तीन भागों में बांटा गया है — (1) सात्त्विक अहंकार: इससे मन और ज्ञानेन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं, (2) राजसिक अहंकार: इससे कर्मेन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं, (3) तामसिक अहंकार: इससे तन्मात्राएँ उत्पन्न होती हैं।
Q68. सांख्य दर्शन में पंचमहाभूतों की उत्पत्ति किससे होती है?
A) मन से
B) अहंकार से
C) इन्द्रियों से
D) तन्मात्राओं से
व्याख्या: सांख्य दर्शन के अनुसार पांच तन्मात्राएँ — शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध — क्रमशः पंचमहाभूतों (आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी) को उत्पन्न करती हैं। ये भौतिक जगत के स्थूल तत्व हैं।
Q69. सांख्य दर्शन किसे 'स्वतंत्र चेतन सत्ता' मानता है?
A) प्रकृति को
B) पुरुष को
C) मन को
D) बुद्धि को
व्याख्या: पुरुष को सांख्य दर्शन में स्वतंत्र, शुद्ध, नित्य और चेतन सत्ता माना गया है। यह किसी अन्य तत्व पर आश्रित नहीं है और केवल साक्षी रूप में स्थित रहता है। वही मुक्ति का अधिकारी है।
Q70. सांख्य दर्शन में कौन-सा तत्व न तो उत्पन्न होता है और न उत्पन्न करता है?
A) पुरुष
B) प्रकृति
C) बुद्धि
D) अहंकार
व्याख्या: पुरुष को सांख्य दर्शन में अजन्य (जो उत्पन्न नहीं होता) और अकरण (जो कुछ उत्पन्न नहीं करता) माना गया है। यह निष्क्रिय चेतन है। इसके विपरीत, प्रकृति स्वयं उत्पन्न नहीं होती परंतु अन्य तत्वों की उत्पत्ति करती है।
Q71. सांख्य दर्शन में ‘प्रकृति’ की क्या विशेषता मानी गई है?
A) चेतन, निर्गुण और अविकारी
B) जड़, त्रिगुणात्मक और उत्पादक
C) सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान
D) आत्मस्वरूप
व्याख्या: प्रकृति को सांख्य दर्शन में *जड़* (अचेतन), *त्रिगुणात्मक* (सत्त्व, रज, तम से युक्त), और *उत्पादक* (बुद्धि से लेकर पंचमहाभूत तक की उत्पत्ति करने वाली) माना गया है। यह पुरुष के साक्षात्कार से सक्रिय होती है।
Q72. पुरुष और प्रकृति के संयोग से किसकी उत्पत्ति होती है?
A) बुद्धि
B) मोक्ष
C) त्रिगुण
D) सृष्टि
व्याख्या: सांख्य दर्शन के अनुसार जब *चेतन पुरुष* और *जड़ प्रकृति* एक-दूसरे के समीप आते हैं, तो प्रकृति की शक्तियाँ सक्रिय हो जाती हैं और सृष्टि की प्रक्रिया आरंभ होती है। पुरुष स्वयं कुछ नहीं करता, वह केवल साक्षी होता है।
Q73. सांख्य के अनुसार ज्ञान की प्राप्ति का प्रमुख साधन क्या है?
A) विवेक
B) तप
C) भक्ति
D) योग
व्याख्या: सांख्य दर्शन में *विवेक* (बुद्धि द्वारा किया गया भेद) को ही मोक्ष का साधन माना गया है। जब व्यक्ति समझता है कि “मैं पुरुष हूँ, प्रकृति नहीं”, तो यह *विवेक ज्ञान* उसे बंधन से मुक्त कर देता है।
Q74. सांख्य दर्शन में ‘मन’ किससे उत्पन्न होता है?
A) बुद्धि
B) प्रकृति
C) सात्त्विक अहंकार
D) पुरुष
व्याख्या: सांख्य दर्शन के अनुसार *सात्त्विक अहंकार* से मन, ज्ञानेन्द्रियाँ और इन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं। मन का कार्य है— इन्द्रियों और बुद्धि के बीच समन्वय स्थापित करना।
Q75. सांख्य दर्शन का उद्देश्य क्या है?
A) पूजा-पाठ सिखाना
B) कर्म का विधान बताना
C) ईश्वर प्राप्ति कराना
D) दुखों से मुक्ति दिलाना
व्याख्या: सांख्य दर्शन का *प्रमुख उद्देश्य* है— *प्रकृति और पुरुष के भेदज्ञान द्वारा दुखों से मुक्ति (कैवल्य) प्रदान करना*। यह दर्शन वैज्ञानिक और तर्कशील पद्धति से मुक्ति का मार्ग प्रस्तुत करता है।
Q76. सांख्य दर्शन में ‘साक्षीभाव’ किसे कहा गया है?
A) पुरुष के दृष्टा रूप को
B) मन के जानने के गुण को
C) बुद्धि के निर्णय को
D) ईश्वर के दर्शन को
व्याख्या: ‘साक्षीभाव’ का अर्थ है – केवल देखना, भाग नहीं लेना। पुरुष को सांख्य दर्शन में *साक्षी* या *दृष्टा* कहा गया है, जो प्रकृति और उसकी क्रियाओं को बिना हस्तक्षेप के देखता है।
Q77. सांख्य दर्शन की गिनती किस श्रेणी के दर्शन में की जाती है?
A) नास्तिक दर्शन
B) आस्तिक दर्शन
C) शून्यवाद
D) केवल तर्क दर्शन
व्याख्या: यद्यपि सांख्य दर्शन *ईश्वर को स्वीकार नहीं करता*, फिर भी *वेदों को प्रमाण मानता है*, इसलिए इसे *आस्तिक दर्शन* की श्रेणी में रखा गया है। वेदों को प्रमाण न मानने वाले दर्शन (जैसे चार्वाक, बौद्ध) को नास्तिक कहा जाता है।
Q78. सांख्य दर्शन में किसे ‘मूल कारण’ (Prime Cause) माना गया है?
A) पुरुष
B) बुद्धि
C) प्रकृति
D) अहंकार
व्याख्या: सांख्य दर्शन में *प्रकृति* को सृष्टि का *मूल कारण* माना गया है। सभी तत्त्व—बुद्धि से लेकर महाभूत तक, इसी से उत्पन्न होते हैं। पुरुष तो केवल साक्षी है, उत्पत्ति से उसका कोई संबंध नहीं।
Q79. सांख्य दर्शन में प्रकृति को क्यों माना गया है?
A) उपादान कारण
B) निमित्त कारण
C) कर्ता
D) ब्रह्म
व्याख्या: सांख्य में प्रकृति को *उपादान कारण* कहा गया है — अर्थात सृष्टि उसी से बनती है, जैसे मिट्टी से घड़ा बनता है। जबकि पुरुष *निमित्त कारण* नहीं बल्कि केवल *साक्षी* है।
Q80. सांख्य दर्शन में पुरुष और प्रकृति का संबंध किस प्रकार का माना गया है?
A) स्वामी और सेवक
B) कारण और कार्य
C) बंधन और मुक्ति
D) दर्शक और दृश्य
व्याख्या: पुरुष को सांख्य में *दृष्टा* (Observer) और प्रकृति को *दृश्य* (Seen) कहा गया है। पुरुष चेतन है और प्रकृति जड़। दोनों का संयोग केवल ज्ञान और मोक्ष हेतु होता है।
Q81. सांख्य दर्शन में 'नित्य' (eternal) किसे कहा गया है?
A) पुरुष
B) बुद्धि
C) मन
D) अहंकार
व्याख्या: सांख्य दर्शन में केवल *पुरुष* को नित्य (शाश्वत) माना गया है। वह कभी उत्पन्न नहीं होता, कभी नष्ट नहीं होता। अन्य सभी तत्व (प्रकृति के विकार जैसे बुद्धि, मन आदि) उत्पन्न होते हैं और नश्वर हैं।
Q82. सांख्य दर्शन में प्रकृति को क्यों जड़ कहा गया है?
A) वह पुरुष को जन्म देती है
B) उसमें सत्व गुण अधिक होता है
C) उसमें चेतना नहीं होती
D) वह ईश्वर का अंश है
व्याख्या: प्रकृति को *जड़* इसलिए कहा गया है क्योंकि उसमें स्वयं कोई चेतना नहीं होती। वह कार्य करती है, लेकिन चेतना के बिना। उसके कार्य पुरुष के साक्षीभाव में संभव होते हैं।
Q83. सांख्य दर्शन के अनुसार 'अविद्या' के कारण क्या होता है?
A) पुरुष प्रकृति से अपने को जोड़ लेता है
B) त्रिगुण समाप्त हो जाते हैं
C) मन शुद्ध हो जाता है
D) बुद्धि जन्म लेती है
व्याख्या: अविद्या का अर्थ है — अज्ञान। जब पुरुष स्वयं को प्रकृति या उसके विकारों (जैसे मन, बुद्धि) के साथ जोड़ लेता है, तो वह बंधन में पड़ जाता है। यही अविद्या मुक्ति में सबसे बड़ी बाधा है।
Q84. सांख्य दर्शन में तत्त्वों की कुल संख्या कितनी मानी गई है?
A) 24
B) 26
C) 23
D) 25
व्याख्या: सांख्य दर्शन में *25 तत्त्वों* को स्वीकार किया गया है — 24 जड़ तत्त्व (प्रकृति, बुद्धि, अहंकार, मन, 10 इन्द्रियाँ, 5 तन्मात्रा, 5 महाभूत) और 1 चेतन तत्त्व *पुरुष*।
Q85. सांख्य दर्शन में 'प्रकृति' को क्या कहा गया है?
A) ईश्वर
B) मूलप्रकृति
C) आत्मा
D) विद्या
व्याख्या: सांख्य दर्शन में प्रकृति को *मूलप्रकृति* कहा गया है, क्योंकि यही समस्त जगत के तत्त्वों का मूल कारण है। इसका स्वरूप त्रिगुणात्मक है और यह अव्यक्त रूप में रहती है जब तक कि सृष्टि आरंभ न हो।
Q86. सांख्य दर्शन के अनुसार ज्ञान किसका धर्म है?
A) बुद्धि का
B) मन का
C) आत्मा का
D) इन्द्रियों का
व्याख्या: सांख्य दर्शन में ज्ञान *पुरुष* का धर्म नहीं, बल्कि *बुद्धि* का धर्म माना गया है। पुरुष केवल ज्ञान का साक्षी है, ज्ञाता नहीं। ज्ञान, निर्णय, तर्क आदि कार्य बुद्धि के माने गए हैं।
Q87. सांख्य के अनुसार पुरुष को कैसे जाना जा सकता है?
A) योगाभ्यास से
B) भक्ति से
C) विवेक द्वारा
D) ध्यान से
व्याख्या: सांख्य दर्शन में पुरुष का बोध *विवेक ज्ञान* द्वारा होता है। जब मनुष्य प्रकृति और उसके विकारों से भिन्न पुरुष का साक्षात्कार करता है, तभी वह पुरुष को जान पाता है और मोक्ष की ओर बढ़ता है।
Q88. सांख्य दर्शन के अनुसार बंधन किसका है?
A) पुरुष का
B) आत्मा का
C) बुद्धि का
D) प्रकृति का
व्याख्या: बंधन पुरुष का नहीं होता क्योंकि वह निष्क्रिय और साक्षी है। बंधन बुद्धि और मन जैसे प्रकृति के विकारों में होता है, जो अविद्या से पुरुष को अपने साथ जोड़ लेते हैं। विवेक से यह भ्रम टूटता है।
Q89. सांख्य में ज्ञान, इच्छाशक्ति और क्रिया किसके गुण माने गए हैं?
A) त्रिगुणों के
B) पुरुष के
C) आत्मा के
D) ईश्वर के
व्याख्या: सांख्य दर्शन में सत्त्व से *ज्ञान*, रज से *क्रिया* और तम से *निरोध* (जड़ता) की उत्पत्ति मानी गई है। ये त्रिगुण ही संसार के सभी मानसिक और भौतिक कार्यों के मूल में हैं।
Q90. सांख्य दर्शन में 'प्रत्यय' शब्द का अर्थ क्या है?
A) आत्मा का अनुभव
B) इन्द्रियों का विषय
C) पुरुष का कर्म
D) बुद्धि में उत्पन्न होने वाला विचार
व्याख्या: ‘प्रत्यय’ का अर्थ है – बुद्धि में उत्पन्न होने वाला *विचार* या *विचार रूप धारणा*। यह विचार पुरुष के सामने प्रस्तुत होता है, लेकिन पुरुष उसमें संलग्न नहीं होता — केवल देखता है।
Q91. सांख्य दर्शन के अनुसार पुरुष की संख्या क्या है?
A) एक
B) अनेक
C) दो
D) केवल ईश्वर
व्याख्या: सांख्य दर्शन के अनुसार *पुरुष अनेक होते हैं*। इसका तर्क यह है कि सभी जीवों में अनुभव, जन्म-मरण, सुख-दुख आदि भिन्न-भिन्न होते हैं, अतः यदि पुरुष एक होता तो यह विविधता संभव नहीं होती।
Q92. सांख्य में मोक्ष प्राप्त पुरुष की क्या अवस्था होती है?
A) कैवल्य
B) समाधि
C) परमगति
D) ब्रह्मलीन
व्याख्या: सांख्य दर्शन में मोक्ष की अंतिम अवस्था को *कैवल्य* कहा गया है, जिसका अर्थ है – पूर्ण स्वतंत्रता, जहाँ पुरुष प्रकृति से पूर्णतः पृथक होकर अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित हो जाता है।
Q93. सांख्य दर्शन में कौन सा प्रमाण मुख्य रूप से स्वीकार किया गया है?
A) उपमान और अनुपलब्धि
B) केवल प्रत्यक्ष
C) ईश्वरवाणी
D) प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द
व्याख्या: सांख्य दर्शन *तीन प्रमाणों* को मानता है — (1) प्रत्यक्ष (प्रत्यक्ष ज्ञान), (2) अनुमान (तर्क से ज्ञान), और (3) शब्द (शास्त्रों का प्रमाण)। इनसे ही तत्त्वों की प्राप्ति और विवेक संभव है।
Q94. सांख्य में 'विकृति' का क्या अर्थ है?
A) प्रकृति से उत्पन्न तत्त्व
B) दोषयुक्त विचार
C) रजोगुण की प्रधानता
D) नाशवानता
व्याख्या: सांख्य में ‘विकृति’ का तात्पर्य उन तत्त्वों से है जो *प्रकृति से उत्पन्न* हुए हैं — जैसे बुद्धि, अहंकार, मन, इन्द्रियाँ, तन्मात्राएँ और पंचमहाभूत। इन सबकी उत्पत्ति प्रकृति से होती है।
Q95. सांख्य दर्शन में प्रकृति और पुरुष का संयोग क्यों होता है?
A) सृष्टि की रक्षा के लिए
B) पुरुष की इच्छा से
C) पुरुष के दर्शन हेतु प्रकृति कार्य करती है
D) ब्रह्मा की कृपा से
व्याख्या: सांख्य में कहा गया है – *“पुरुषस्य दर्शनार्थं प्रकृति कार्यं प्रवर्तते।”* अर्थात, प्रकृति का कार्य केवल इसलिए होता है ताकि पुरुष उसका साक्षी बन सके और विवेक द्वारा मुक्ति प्राप्त कर सके।
Q96. सांख्य में त्रिगुणों को कैसे देखा गया है?
A) प्रकृति की अनिवार्य प्रवृत्तियाँ
B) आत्मा के गुण
C) मन के विकार
D) ब्रह्म का स्वरूप
व्याख्या: सांख्य दर्शन में *सत्त्व, रज और तम* — ये तीनों गुण प्रकृति की अनिवार्य प्रवृत्तियाँ मानी गई हैं। ये न तो अलग हो सकते हैं, न ही किसी वस्तु में इनमें से कोई एक रह सकता है। सब वस्तुएँ त्रिगुणात्मक होती हैं।
Q97. सांख्य दर्शन का प्रमुख रचनाकार कौन माना जाता है?
A) पतंजलि
B) कपिल मुनि
C) गौतम
D) जैमिनि
व्याख्या: *कपिल मुनि* को सांख्य दर्शन का प्रवर्तक माना जाता है। इन्होंने ही प्रथम बार सृष्टि के तत्वों को विवेकपूर्वक विश्लेषित कर दर्शन का स्वरूप निर्मित किया। उनका ग्रंथ “सांख्य सूत्र” प्रसिद्ध है।
Q98. सांख्य दर्शन में पुरुष की विशेषता क्या है?
A) कर्ता, भोगता, सर्वज्ञ
B) गुणात्मक, उत्पादक
C) त्रिगुणात्मक, नश्वर
D) साक्षी, निरपेक्ष, स्वतंत्र
व्याख्या: सांख्य दर्शन में पुरुष को *साक्षी* (दृष्टा), *निरपेक्ष* (किसी चीज पर निर्भर नहीं), और *स्वतंत्र* चेतन सत्ता माना गया है। वह न तो कर्ता है, न भोगता। वह केवल ज्ञान का साक्षी है।
Q99. सांख्य में ‘प्रकृति’ को अव्यक्त क्यों कहा गया है?
A) क्योंकि उसमें रूप-रंग नहीं होता
B) क्योंकि वह दृश्य नहीं होती
C) क्योंकि वह तत्त्व नहीं है
D) क्योंकि वह पुरुष का अंश है
व्याख्या: प्रकृति को *अव्यक्त* (unmanifest) इसलिए कहा गया है क्योंकि वह स्थूल नहीं है — उसमें न तो रूप है, न गंध, न रंग। वह सूक्ष्म अवस्था में रहती है और जब त्रिगुण असंतुलन में आते हैं, तब व्यक्त रूप में सृष्टि उत्पन्न होती है।
Q100. सांख्य दर्शन का अंतिम लक्ष्य क्या है?
A) ईश्वर का दर्शन
B) पुनर्जन्म से बचना
C) पुरुष की प्रकृति से भिन्नता का बोध
D) मोक्ष के बाद ब्रह्म से एकत्व
व्याख्या: सांख्य दर्शन का अंतिम लक्ष्य है — *पुरुष और प्रकृति के भेद का सही ज्ञान (विवेक)*। जब यह ज्ञान हो जाता है, तब पुरुष प्रकृति से पूर्णतः पृथक हो जाता है और कैवल्य अवस्था प्राप्त करता है। यही मोक्ष है।
Q1. सांख्य दर्शन के अनुसार संसार का मूल कारण क्या है?
A) ईश्वर
B) आत्मा
C) प्रकृति
D) काल
व्याख्या: सांख्य दर्शन में संसार की उत्पत्ति का कारण 'प्रकृति' को माना गया है। प्रकृति अचेतन तत्व है जो त्रिगुणात्मक (सत्त्व, रज, तम) होती है। जब यह पुरुष के संपर्क में आती है तो उसमें विकार उत्पन्न होते हैं जिससे सृष्टि की उत्पत्ति होती है।
Q2. सांख्य दर्शन में 'पुरुष' की विशेषता क्या है?
A) वह चेतन, निष्क्रिय, साक्षी और नित्य है
B) वह सृष्टि करता है
C) वह त्रिगुणात्मक है
D) उसमें रजोगुण प्रधान होता है
व्याख्या: 'पुरुष' को सांख्य दर्शन में चेतन, निष्क्रिय, नित्य एवं साक्षी भाव में स्थित तत्व माना गया है। वह साक्षी भाव से प्रकृति की क्रिया का अवलोकन करता है, परंतु स्वयं कोई कार्य नहीं करता।
Q3. सांख्य दर्शन में किसे 'प्रकृति का प्रथम विकार' कहा गया है?
A) अहंकार
B) महत्तत्त्व (बुद्धि)
C) मन
D) चित्त
व्याख्या: प्रकृति से सबसे पहले जो तत्त्व उत्पन्न होता है, उसे 'महत्तत्त्व' या 'बुद्धि' कहा गया है। यह सृष्टि की योजना और विवेक शक्ति का प्रतीक है। इसके बाद 'अहंकार' का विकास होता है।
Q4. सांख्य दर्शन में 'अहंकार' से कौन-कौन से तत्त्व उत्पन्न होते हैं?
A) केवल तन्मात्राएँ
B) केवल मन
C) केवल इंद्रियाँ
D) इंद्रियाँ, तन्मात्राएँ और मन
व्याख्या: अहंकार से तीन प्रकार के तत्त्व उत्पन्न होते हैं: 1) ग्यारह इंद्रियाँ (5 ज्ञानेन्द्रियाँ, 5 कर्मेन्द्रियाँ और मन), 2) पाँच तन्मात्राएँ, और 3) इनमें सहयोगी तत्व। यह सभी सृष्टि के विविध रूपों के निर्माण में सहायक होते हैं।
Q5. सांख्य दर्शन में कितने तत्त्वों की मान्यता है?
A) 26
B) 23
C) 25
D) 24
व्याख्या: सांख्य दर्शन के अनुसार कुल 25 तत्त्व होते हैं - 1 पुरुष (चेतन) + 24 प्रकृति जन्य अवयव जैसे बुद्धि, अहंकार, मन, इंद्रियाँ, तन्मात्राएँ और पंचमहाभूत।
Q6. सांख्य दर्शन में ‘मोक्ष’ का अर्थ क्या है?
A) प्रकृति और पुरुष की भिन्नता की यथार्थ पहचान
B) ब्रह्म के साथ आत्मा का मिलन
C) पुनर्जन्म की प्राप्ति
D) ईश्वर की कृपा
व्याख्या: सांख्य दर्शन में मोक्ष का तात्पर्य है जब आत्मा (पुरुष) को यह यथार्थ ज्ञान हो जाए कि वह प्रकृति से भिन्न है, तब वह प्रकृति के संबंधों से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करता है।
Q7. सांख्य दर्शन में ईश्वर की क्या भूमिका मानी गई है?
A) सृष्टिकर्ता
B) ईश्वर को स्वीकार नहीं किया गया
C) वह पुरुष और प्रकृति का नियंत्रक है
D) वह पुनर्जन्म का निर्धारण करता है
व्याख्या: सांख्य दर्शन ईश्वर की सत्ता को अस्वीकार करता है। यह एक निरीश्वरवादी आस्तिक दर्शन है, जो वेदों को प्रमाण मानता है लेकिन ईश्वर को नहीं। इसके अनुसार सृष्टि प्रकृति और पुरुष की परस्पर क्रिया से स्वतः उत्पन्न होती है।
Q8. सांख्य दर्शन में 'तन्मात्राएँ' क्या हैं?
A) पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ
B) पाँच महाभूत
C) सूक्ष्म तत्व जिनसे महाभूत बनते हैं
D) पाँच कर्मेन्द्रियाँ
व्याख्या: तन्मात्राएँ पाँच सूक्ष्म तत्व होती हैं – शब्द, स्पर्श, रूप, रस, और गंध। इन्हीं से आगे चलकर पाँच महाभूत (आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी) की उत्पत्ति होती है।
Q9. सांख्य दर्शन में इंद्रियाँ कितनी मानी गई हैं?
A) सात
B) ग्यारह
C) पाँच
D) दस
व्याख्या: सांख्य दर्शन में ग्यारह इंद्रियाँ मानी गई हैं – पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और एक मन। मन को अंतःकरण का अंग माना गया है जो ज्ञानेन्द्रियों से प्राप्त ज्ञान को समन्वित करता है।
Q10. सांख्य दर्शन के अनुसार दुःख का कारण क्या है?
A) प्रकृति और पुरुष का अविवेक
B) पाप
C) ईश्वर की इच्छा
D) आत्मा की अशुद्धता
व्याख्या: सांख्य दर्शन के अनुसार मनुष्य की सभी पीड़ाओं और दुःखों का मूल कारण यह है कि वह पुरुष (चेतन) और प्रकृति (अचेतन) को एक मान बैठता है। इस अविवेक का निवारण ही मोक्ष है।
Q11. सांख्य दर्शन में 'गुणत्रय' किसे कहा गया है?
A) सुख, दुःख, मोह
B) कर्म, ज्ञान, भक्ति
C) सत्व, शक्ति, विवेक
D) सत्त्व, रजस, तमस
व्याख्या: सांख्य दर्शन के अनुसार सम्पूर्ण प्रकृति तीन गुणों – सत्त्व (शांति, प्रकाश), रजस (क्रिया, उग्रता) और तमस (अज्ञान, जड़ता) – से बनी होती है। इन्हें ही 'गुणत्रय' कहा गया है। जब ये गुण संतुलन में होते हैं तब प्रकृति निष्क्रिय रहती है।
Q12. 'मन' किस तत्त्व से उत्पन्न होता है?
A) बुद्धि
B) तन्मात्रा
C) अहंकार
D) महाभूत
व्याख्या: सांख्य दर्शन के अनुसार अहंकार से ग्यारह अवयव उत्पन्न होते हैं, जिनमें 'मन' भी शामिल है। मन इंद्रियों का समन्वय करता है और ज्ञान को एकत्र कर बुद्धि को भेजता है।
Q13. सांख्य दर्शन के अनुसार 'सृष्टि' की प्रक्रिया किस प्रकार आरंभ होती है?
A) ईश्वर की इच्छा से
B) पुरुष और प्रकृति के संयोग से
C) आत्मा की प्रेरणा से
D) समय के प्रभाव से
व्याख्या: सांख्य दर्शन में माना गया है कि जब चेतन पुरुष निष्क्रिय रूप से अचेतन प्रकृति के समीप आता है, तब प्रकृति में विकार उत्पन्न होता है और वही सृष्टि की प्रक्रिया को जन्म देता है। यह संयोग ही सृजन का प्रारंभ है।
Q14. सांख्य दर्शन के अनुसार ज्ञान का स्रोत क्या है?
A) केवल शास्त्र
B) प्रत्यक्ष, अनुमान और आप्तवचन
C) स्वप्न
D) तपस्या
व्याख्या: सांख्य दर्शन में तीन प्रमाणों को मान्यता दी गई है – प्रत्यक्ष (इंद्रिय अनुभव), अनुमान (तर्क) और आप्तवचन (विश्वसनीय व्यक्ति या वेदवाक्य)। इन्हीं के आधार पर सत्य का ज्ञान संभव होता है।
Q15. सांख्य दर्शन में 'प्रकृति' को क्या माना गया है?
A) अचेतन, सृजन की मूल शक्ति
B) ईश्वर की प्रतिछाया
C) पुरुष की शक्ति
D) साक्षात् ब्रह्म
व्याख्या: प्रकृति को सांख्य दर्शन में मूल कारण (प्रकृतिस्वरूप) माना गया है। यह अचेतन होती है, किन्तु त्रिगुणात्मक होती है और यही सम्पूर्ण जगत की रचना करती है। पुरुष इसके कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करता।
Q16. सांख्य दर्शन किस प्रकार की मुक्ति को मानता है?
A) ब्रह्म से एकत्व
B) ईश्वर प्राप्ति
C) प्रकृति से पुरुष की भिन्नता की अनुभूति
D) कर्मबंधन से मुक्ति
व्याख्या: सांख्य दर्शन के अनुसार मोक्ष तब प्राप्त होता है जब पुरुष को यह ज्ञान हो जाए कि वह प्रकृति से सर्वथा भिन्न है। यह विवेक जब स्थायी हो जाता है, तब प्रकृति पुरुष से विरक्त हो जाती है और पुरुष स्वतंत्र हो जाता है।
Q17. 'प्रकृति' शब्द का अर्थ सांख्य दर्शन में क्या है?
A) जीवनशक्ति
B) जगत
C) भौतिक वस्तुएँ
D) वह मूल कारण जिससे सृष्टि उत्पन्न हुई
व्याख्या: 'प्रकृति' का अर्थ सांख्य दर्शन में वह मूल कारण है जिससे समस्त सृष्टि उत्पन्न होती है। यह स्वतः विद्यमान, अचेतन, नित्य एवं त्रिगुणात्मक तत्व है जो न तो बनाया गया है और न ही नष्ट होता है।
Q18. सांख्य दर्शन में 'बुद्धि' की क्या भूमिका है?
A) ज्ञान का विरोध
B) विवेक द्वारा निर्णय लेना
C) कर्म करना
D) अनुभव का संग्रह करना
व्याख्या: बुद्धि को महत्तत्त्व कहा गया है जो प्रकृति का प्रथम विकार है। इसकी मुख्य विशेषता है विवेक – यानी सत्य और असत्य में भेद करना, जिससे पुरुष को अपने स्वरूप का बोध होता है।
Q19. सांख्य दर्शन में 'कर्मेन्द्रियाँ' कितनी मानी गई हैं?
A) पाँच
B) छः
C) चार
D) सात
व्याख्या: सांख्य दर्शन के अनुसार पाँच कर्मेन्द्रियाँ होती हैं – वाक (बोलने की शक्ति), पाणि (हाथ), पाद (पैर), उपस्थ (प्रजनन), और पायु (त्याग)। ये सभी शरीर के क्रियात्मक कार्यों में सहायक होती हैं।
Q20. सांख्य दर्शन में 'अविद्या' किसका कारण मानी गई है?
A) सृष्टि की उत्पत्ति
B) दुख और बंधन
C) ईश्वर से दूरी
D) पुनर्जन्म
व्याख्या: सांख्य दर्शन में 'अविद्या' का तात्पर्य है – पुरुष और प्रकृति के बीच भेद को न समझना। यही अज्ञान मनुष्य को संसार के बंधन में डालता है और दुःखों का कारण बनता है।
Q21. सांख्य दर्शन के अनुसार 'प्रकृति' की स्थिति पुरुष के बिना कैसी होती है?
A) वह स्वतंत्र रूप से सृष्टि करती है
B) वह नष्ट हो जाती है
C) वह निष्क्रिय एवं संतुलित अवस्था में रहती है
D) वह पुरुष में लीन हो जाती है
व्याख्या: पुरुष के अभाव में प्रकृति निष्क्रिय, संतुलन अवस्था में रहती है क्योंकि उसके त्रिगुण – सत्त्व, रजस और तमस – समान मात्रा में होते हैं। यह समता ही प्रकृति की शांति की अवस्था है। पुरुष के सान्निध्य में आने पर ही उसमें विकृति उत्पन्न होती है और सृष्टि की प्रक्रिया आरंभ होती है।
Q22. सांख्य दर्शन में 'मोक्ष' प्राप्ति का उपाय क्या है?
A) विवेक ज्ञान द्वारा प्रकृति और पुरुष का भेद जानना
B) उपासना और भक्ति
C) यज्ञ और तपस्या
D) गुरु की कृपा
व्याख्या: सांख्य दर्शन में मोक्ष की प्राप्ति किसी कर्मकांड, ईश्वर भक्ति या अनुष्ठान से नहीं होती। यह केवल 'विवेक' – यानी पुरुष और प्रकृति के भिन्नत्व का साक्षात्कार – से प्राप्त होती है। जब पुरुष जान जाता है कि वह प्रकृति से सर्वथा अलग है, तभी वह जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है।
Q23. सांख्य के अनुसार बुद्धि किस प्रकार की होती है?
A) चेतन एवं स्वतंत्र
B) अचेतन लेकिन निर्णायक शक्ति वाली
C) प्रकृति से भिन्न
D) पुरुष के अधीन
व्याख्या: बुद्धि को सांख्य में 'महत्तत्त्व' के रूप में जाना गया है। यह प्रकृति का प्रथम विकार है। यद्यपि यह अचेतन होती है, फिर भी इसकी विशेषता 'विवेक' है – अर्थात यह भिन्न-भिन्न विकल्पों में निर्णय करने की शक्ति रखती है, किंतु चेतना केवल पुरुष में होती है।
Q24. सांख्य दर्शन की मूल मान्यता क्या है?
A) केवल ईश्वर ही सत्य है
B) सृष्टि प्रकृति और पुरुष की परस्पर क्रिया से उत्पन्न होती है
C) आत्मा ब्रह्म का अंश है
D) दुखों का नाश केवल भक्ति से संभव है
व्याख्या: सांख्य दर्शन में ईश्वर की भूमिका को स्वीकार नहीं किया गया है। इसके अनुसार यह संसार 'प्रकृति' (अचेतन) और 'पुरुष' (चेतन) की पारस्परिक उपस्थिति से स्वयं उत्पन्न होता है। यह स्वाभाविक प्रक्रिया है, किसी ईश्वरीय योजना का परिणाम नहीं।
Q25. 'सांख्य' शब्द का शाब्दिक अर्थ क्या होता है?
A) योगयुक्त विचार
B) विश्लेषण
C) संख्या या विवेकपूर्ण ज्ञान
D) आत्मसाक्षात्कार
व्याख्या: 'सांख्य' शब्द 'संख्या' या 'सांख्य' धातु से बना है, जिसका अर्थ है 'विवेक' या तर्कपूर्ण विश्लेषण के द्वारा सत्य की खोज। इस दर्शन का उद्देश्य ज्ञान के द्वारा मुक्ति प्राप्त करना है, न कि कर्म या भक्ति के द्वारा।
Q26. सांख्य दर्शन में 'प्रकृति' की कौन-सी विशेषता प्रमुख नहीं है?
A) अचेतनता
B) त्रिगुणात्मकता
C) सृजनशक्ति
D) चेतनता
व्याख्या: सांख्य दर्शन में प्रकृति को अचेतन, नित्य और त्रिगुणात्मक माना गया है। यह चेतन नहीं होती, अर्थात इसमें स्व-चेतना नहीं होती। चेतना केवल 'पुरुष' में होती है। प्रकृति की क्रियाशीलता पुरुष के सान्निध्य से उत्पन्न होती है।
Q27. सांख्य दर्शन में 'विकृति' शब्द का अर्थ क्या है?
A) वह तत्त्व जो प्रकृति से उत्पन्न हुआ है
B) वह तत्त्व जो नाशवान है
C) वह तत्त्व जो पुरुष से उत्पन्न हुआ है
D) वह तत्त्व जो इंद्रियों से नहीं जाना जा सकता
व्याख्या: सांख्य दर्शन में प्रकृति से जो-जो तत्त्व उत्पन्न होते हैं – जैसे बुद्धि, अहंकार, मन, इंद्रियाँ, तन्मात्राएँ, पंचमहाभूत – उन्हें 'विकृति' कहा जाता है। स्वयं प्रकृति को 'प्रकृति' और पुरुष को 'अविकारी' कहा गया है।
Q28. 'पुरुष' और 'प्रकृति' के भेद का बोध किसके द्वारा होता है?
A) तपस्या से
B) ध्यान से
C) विवेक ज्ञान से
D) ईश्वर की कृपा से
व्याख्या: सांख्य दर्शन में ज्ञान को ही मोक्ष का उपाय माना गया है। 'विवेक' – अर्थात पुरुष (चेतन) और प्रकृति (अचेतन) के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान – ही बंधन से मुक्ति दिला सकता है।
Q29. सांख्य दर्शन के अनुसार 'पुरुष' की संख्या कितनी होती है?
A) एक
B) अनेक
C) दो
D) अनिर्णीत
व्याख्या: सांख्य दर्शन के अनुसार पुरुष अनेक होते हैं – हर जीव में एक स्वतंत्र चेतन पुरुष विद्यमान है। यदि पुरुष एक ही होता, तो एक के मुक्त होने पर सभी मुक्त हो जाते, जो व्यावहारिक रूप से असंगत है।
Q30. सांख्य दर्शन में 'मन' किस प्रकार का तत्त्व है?
A) अंतःकरण का अंग, इंद्रियों का समन्वयक
B) स्वतंत्र चेतन सत्ता
C) ईश्वर का माध्यम
D) पुरुष का विकार
व्याख्या: मन को अंतःकरण चतुष्टय (बुद्धि, अहंकार, चित्त और मन) का एक अंग माना गया है। यह ज्ञानेन्द्रियों से ज्ञान को ग्रहण कर बुद्धि को संप्रेषित करता है। यह स्वयं अचेतन होता है, परंतु पुरुष के संपर्क से क्रियाशील बनता है।
Q31. सांख्य दर्शन के अनुसार प्रकृति की मुख्य विशेषता क्या है?
A) त्रिगुणात्मकता
B) निर्गुणता
C) अचलता
D) चेतनता
व्याख्या: सांख्य दर्शन के अनुसार प्रकृति त्रिगुणात्मक होती है — अर्थात् उसमें सत्व, रज और तम ये तीन गुण विद्यमान होते हैं। ये त्रिगुण ही सृष्टि की विविधता और परिवर्तन के कारण बनते हैं। प्रकृति अचेतन होते हुए भी ये गुणों के माध्यम से जगत की रचना करती है।
Q32. सांख्य दर्शन में पुरुष को किस रूप में माना गया है?
A) कारण
B) प्रकृतिवादी
C) साक्षी
D) रचनाकार
व्याख्या: पुरुष को सांख्य दर्शन में निष्क्रिय, निर्लेप और साक्षी भाव में माना गया है। वह केवल देखने वाला है, भोगता नहीं है, न ही सृष्टि करता है। प्रकृति के साथ उसका संबंध केवल उपस्थिति मात्र से है, जिससे सृष्टि प्रारंभ होती है।
Q33. सांख्य दर्शन के अनुसार बुद्धि की उत्पत्ति किससे होती है?
A) अहंकार से
B) प्रकृति से
C) चित्त से
D) मन से
व्याख्या: सांख्य दर्शन में 24 तत्त्वों का उल्लेख है। इनमें सबसे पहला विकार "बुद्धि" है, जिसकी उत्पत्ति सीधे प्रकृति से मानी जाती है। इसके बाद बुद्धि से अहंकार, फिर मन और इंद्रियाँ उत्पन्न होती हैं।
Q34. सांख्य दर्शन में दुख की निवृत्ति का उपाय क्या माना गया है?
A) कर्मयोग
B) पुरुष और प्रकृति का विवेक
C) भक्ति
D) तपस्या
व्याख्या: सांख्य दर्शन के अनुसार दुख की निवृत्ति का प्रमुख उपाय है – पुरुष और प्रकृति का "विवेक" अर्थात दोनों की भिन्नता का साक्षात्कार। जब जीव (पुरुष) यह जान लेता है कि वह प्रकृति से अलग, साक्षी, अकर्ता और अचेतन है, तभी मोक्ष संभव होता है।
Q35. सांख्य दर्शन किस प्रकार का दर्शन है?
A) केवल ईश्वरवादी
B) केवल भौतिकवादी
C) द्वैतवादी
D) अद्वैतवादी
व्याख्या: सांख्य दर्शन "द्वैतवादी" है क्योंकि यह दो मूल तत्वों को मानता है – पुरुष (चेतन) और प्रकृति (अचेतन)। इन दोनों की भिन्नता को स्वीकारते हुए, यह दर्शाता है कि सृष्टि का मूल कारण इन दोनों की उपस्थिति है।
Q36. सांख्य दर्शन में मन की उत्पत्ति किससे मानी जाती है?
A) चित्त से
B) अहंकार से
C) बुद्धि से
D) इंद्रियों से
व्याख्या: सांख्य दर्शन के अनुसार मन की उत्पत्ति "अहंकार" से होती है। अहंकार से उत्पन्न होने वाले तत्त्वों में मन, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और पाँच तन्मात्राएँ शामिल हैं। मन को इन्द्रियों का समन्वयक भी माना गया है।
Q37. सांख्य दर्शन में तन्मात्राएँ कितनी मानी गई हैं?
A) पाँच
B) सात
C) दस
D) तीन
व्याख्या: सांख्य दर्शन में पाँच तन्मात्राओं का उल्लेख है – शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध। इन्हीं तन्मात्राओं से क्रमश: पाँच महाभूत उत्पन्न होते हैं। तन्मात्राएँ सूक्ष्म भौतिक तत्व मानी जाती हैं।
Q38. सांख्य दर्शन के अनुसार मोक्ष क्या है?
A) परमात्मा की प्राप्ति
B) पुनर्जन्म का चक्र
C) पुरुष और प्रकृति का अलगाव
D) अनंत सुख की प्राप्ति
व्याख्या: सांख्य दर्शन के अनुसार मोक्ष तब होता है जब पुरुष प्रकृति से पूर्ण रूप से भिन्नता का अनुभव कर लेता है। इसे "कैवल्य" कहा जाता है – अर्थात पुरुष की स्वतंत्रता, जब वह प्रकृति के कार्यों से स्वयं को अलग कर लेता है।
Q39. सांख्य दर्शन में कितने प्रमुख तत्त्व माने गए हैं?
A) 23
B) 25
C) 26
D) 24
व्याख्या: सांख्य दर्शन में कुल 25 तत्त्वों की मान्यता है – जिनमें 1) प्रकृति, 2) पुरुष और 3) प्रकृति से उत्पन्न 23 विकार शामिल हैं जैसे – बुद्धि, अहंकार, मन, इंद्रियाँ, तन्मात्राएँ और महाभूत।
Q40. सांख्य दर्शन में ज्ञान प्राप्ति का साधन क्या माना गया है?
A) प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द
B) केवल प्रत्यक्ष
C) केवल अनुमान
D) केवल शब्द
व्याख्या: सांख्य दर्शन तीन प्रमाणों को स्वीकार करता है – प्रत्यक्ष (सीधा अनुभव), अनुमान (तर्क से प्राप्त ज्ञान) और शब्द (शास्त्रीय प्रमाण)। इन तीनों के माध्यम से तत्त्वों का यथार्थ ज्ञान प्राप्त होता है।
Q41. सांख्य दर्शन में 'पुरुष' की क्या विशेषता मानी गई है?
A) वह सदा परिवर्तनशील होता है
B) वह त्रिगुणात्मक होता है
C) वह शुद्ध चैतन्य एवं निरपेक्ष साक्षी होता है
D) वह प्रकृति का उत्पाद होता है
व्याख्या: सांख्य दर्शन में 'पुरुष' को शुद्ध चेतन, निर्गुण, निस्संग और साक्षीभाव से युक्त माना गया है। वह प्रकृति से भिन्न, अनादि, अजन्मा और नित्य है। पुरुष स्वयं कुछ नहीं करता, केवल साक्षी रहता है। यही कारण है कि उसे साक्षीचैतन्य कहा गया है।
Q42. सांख्य दर्शन के अनुसार बुद्धि किसका परिणाम है?
A) पुरुष का
B) प्रकृति का
C) अहंकार का
D) मन का
व्याख्या: सांख्य दर्शन के अनुसार, प्रकृति से सबसे पहले 'महत्तत्त्व' उत्पन्न होता है, जिसे बुद्धि कहते हैं। यह प्रकृति का ही प्रत्यक्ष उत्पाद है। फिर बुद्धि से अहंकार और अन्य तत्त्व उत्पन्न होते हैं। अतः बुद्धि प्रकृति का प्रथम उत्पाद है।
Q43. सांख्य दर्शन में मोक्ष की परिभाषा क्या है?
A) परमात्मा में विलय
B) पुरुष और प्रकृति के भेद का साक्षात्कार
C) सुख का अधिकतम अनुभव
D) पुनर्जन्म का आरंभ
व्याख्या: सांख्य दर्शन के अनुसार मोक्ष का अर्थ है - पुरुष और प्रकृति के भेद का यथार्थ साक्षात्कार। जब जीव समझ जाता है कि वह 'पुरुष' है और प्रकृति से भिन्न है, तभी बंधन समाप्त होता है और मुक्ति प्राप्त होती है। इसे ही कैवल्य या मोक्ष कहा जाता है।
Q44. 'अहंकार' किस तत्त्व से उत्पन्न होता है?
A) बुद्धि
B) मन
C) चित्त
D) इन्द्रियाँ
व्याख्या: सांख्य दर्शन के अनुसार प्रकृति से बुद्धि उत्पन्न होती है और फिर बुद्धि से अहंकार का विकास होता है। अहंकार का कार्य 'मैं' और 'मेरा' की भावना उत्पन्न करना होता है, जिससे आत्मबोध में भ्रम होता है।
Q45. सांख्य दर्शन के अनुसार 'गुणत्रय' का क्या कार्य है?
A) आत्मा का निर्माण
B) प्रकृति का विनाश
C) सृष्टि का निर्माण और संचालन
D) पुरुष का बंधन
व्याख्या: सांख्य दर्शन में सत्व, रजस् और तमस् — ये तीन गुण माने गए हैं जिन्हें 'त्रिगुण' कहा जाता है। इन्हीं से सृष्टि की उत्पत्ति, संचालन और विनाश होता है। ये प्रकृति के आधारभूत तत्त्व हैं।
Q46. सांख्य दर्शन में कितने तत्त्व माने गए हैं?
A) 23
B) 26
C) 25
D) 24
व्याख्या: सांख्य दर्शन में कुल 25 तत्त्व माने गए हैं - प्रकृति, बुद्धि, अहंकार, 5 तन्मात्राएँ, 5 महाभूत, 5 ज्ञानेन्द्रियाँ, 5 कर्मेन्द्रियाँ, मन और पुरुष। इनमें पुरुष चेतन है, शेष सभी जड़ हैं।
Q47. सांख्य दर्शन में 'प्रकृति' को क्यों स्वीकारा गया है?
A) यह पुरुष का विकार है
B) यह आत्मा का अंश है
C) यह जगत का मूल कारण है
D) यह माया का स्वरूप है
व्याख्या: सांख्य दर्शन के अनुसार प्रकृति ही समस्त जड़ जगत का मूल कारण है। यह त्रिगुणात्मक है और शाश्वत भी है। प्रकृति के विकारों से ही समस्त तत्त्व उत्पन्न होते हैं।
Q48. सांख्य दर्शन में 'मन' को किस वर्ग में रखा गया है?
A) ज्ञानेन्द्रियाँ
B) महाभूत
C) अन्त:करण
D) तन्मात्रा
व्याख्या: सांख्य दर्शन में मन को अन्त:करण चतुष्टय का एक भाग माना गया है — बुद्धि, अहंकार, चित्त और मन। मन का कार्य है संकलन और निर्णय में सहायता करना। यह इन्द्रियों और बुद्धि के बीच सेतु का कार्य करता है।
Q49. सांख्य दर्शन में 'अविद्या' किसका कारण है?
A) प्रकृति की विकृति
B) पुरुष और प्रकृति के भेद को न समझ पाना
C) इन्द्रियबोध की अधिकता
D) पुनर्जन्म का कारण
व्याख्या: सांख्य दर्शन के अनुसार, जब तक पुरुष प्रकृति को अपना समझता है और उनसे भिन्न नहीं मानता, तब तक वह बंधन में रहता है। यह भ्रांति ही 'अविद्या' कहलाती है। विद्या का अर्थ है - भेद का साक्षात्कार।
Q50. सांख्य दर्शन में 'कैवल्य' क्या है?
A) प्रकृति का लय
B) पुनर्जन्म की समाप्ति
C) पुरुष की प्रकृति से पूर्ण भिन्नता की स्थिति
D) परमात्मा की प्राप्ति
व्याख्या: कैवल्य का अर्थ है 'अकेलापन' या 'वियोग'। जब पुरुष समझ लेता है कि वह प्रकृति से सर्वथा भिन्न है, तब उसे न कोई कर्म बंधन होता है, न पुनर्जन्म। यह स्थिति ही कैवल्य या मोक्ष कही गई है।
Q51. सांख्य दर्शन के अनुसार 'प्रकृति' की क्या विशेषता है?
A) वह त्रिगुणात्मिका और अचेतन होती है
B) वह केवल चेतन होती है
C) उसमें कोई गुण नहीं होते
D) वह केवल पुरुष की रचना है
व्याख्या: सांख्य दर्शन के अनुसार प्रकृति त्रिगुणात्मक (सत्त्व, रज, तम) और अचेतन है। इसका उद्देश्य पुरुष को भौतिक अनुभव प्रदान करना है। प्रकृति स्वयं निष्क्रिय है परन्तु पुरुष के संपर्क में आने पर सृष्टि की उत्पत्ति होती है।
Q52. सांख्य दर्शन में 'मूल प्रकृति' किसे कहा गया है?
A) महत
B) अहंकार
C) अव्यक्त
D) बुद्धि
व्याख्या: सांख्य दर्शन में 'अव्यक्त' को ही 'मूल प्रकृति' कहा गया है। यह वह अवस्था है जहाँ त्रिगुण संतुलित होते हैं और कोई उत्पादक क्रिया नहीं होती। यह प्रकृति की अनादि, अविनाशी और सूक्ष्म अवस्था है।
Q53. सांख्य दर्शन किस प्रकार का दर्शन है?
A) एकेश्वरवादी
B) भक्तिवादी
C) अद्वैतवादी
D) द्वैतवादी
व्याख्या: सांख्य दर्शन एक द्वैतवादी दर्शन है जो 'पुरुष' और 'प्रकृति' को स्वतंत्र तत्व मानता है। पुरुष चेतन, निर्गुण और साक्षी है, जबकि प्रकृति अचेतन और गुणात्मक है। दोनों की पृथक सत्ता को स्वीकार करना ही इसे द्वैतवादी बनाता है।
Q54. महत तत्व की उत्पत्ति किससे होती है?
A) अहंकार
B) प्रकृति
C) मन
D) इंद्रिय
व्याख्या: महत तत्व (बुद्धि) की उत्पत्ति प्रकृति से होती है। यह प्रथम उत्पाद है जब प्रकृति में त्रिगुणों का संतुलन बिगड़ता है। महत ही आगे चलकर अहंकार, मन और इंद्रियों का कारण बनता है।
Q55. सांख्य दर्शन में 'पुरुष' की मुख्य भूमिका क्या है?
A) सृष्टि की रचना करना
B) साक्षी भाव से प्रकृति को देखना
C) गुणों का संयोग करना
D) बंधन में रहना
व्याख्या: पुरुष साक्षी है, वह प्रकृति की क्रियाओं में भाग नहीं लेता। उसकी उपस्थिति मात्र से ही प्रकृति सक्रिय हो जाती है। पुरुष निष्क्रिय, निरपेक्ष और ज्ञानस्वरूप चेतना है।
Q56. किस दर्शन में ईश्वर की सत्ता को स्वीकार नहीं किया गया है?
A) वेदांत दर्शन
B) मीमांसा दर्शन
C) योग दर्शन
D) सांख्य दर्शन
व्याख्या: सांख्य दर्शन एक नास्तिक दर्शन है क्योंकि यह ईश्वर की सत्ता को स्वीकार नहीं करता। इसके अनुसार सृष्टि का कार्य प्रकृति और पुरुष के संयोग से होता है, ईश्वर की आवश्यकता नहीं है।
Q57. सांख्य दर्शन में कितने तत्व माने गए हैं?
A) 20
B) 25
C) 15
D) 30
व्याख्या: सांख्य दर्शन में कुल 25 तत्व माने गए हैं – 1 प्रकृति, 1 पुरुष, 3 महत्तत्त्व, अहंकार, मन, 5 ज्ञानेन्द्रियाँ, 5 कर्मेन्द्रियाँ, 5 तन्मात्राएँ और 5 महाभूत।
Q58. मन किस तत्त्व से उत्पन्न होता है?
A) बुद्धि
B) तन्मात्रा
C) अहंकार
D) पुरुष
व्याख्या: सांख्य दर्शन के अनुसार मन अहंकार से उत्पन्न होता है। अहंकार से ही मन, इंद्रियाँ, और तन्मात्राएँ जन्म लेती हैं। मन एक अंतःकरण तत्त्व है जो जानकारी को एकत्र करता है।
Q59. सांख्य दर्शन में 'मोक्ष' किस स्थिति को कहा गया है?
A) शरीर का नाश
B) पुरुष और प्रकृति का पृथकत्व ज्ञान
C) ईश्वर की प्राप्ति
D) तपस्या द्वारा सिद्धि
व्याख्या: मोक्ष का तात्पर्य पुरुष और प्रकृति के भेद को जानने से है। जब पुरुष यह जान लेता है कि वह प्रकृति से भिन्न है, तब बंधन समाप्त हो जाता है। यही मोक्ष है – शुद्ध चेतना की स्थिति।
Q60. सांख्य दर्शन में 'तन्मात्राएँ' क्या हैं?
A) सूक्ष्म तत्व जो इंद्रियों के विषय हैं
B) स्थूल भूत
C) इंद्रियाँ
D) महत्तत्त्व
व्याख्या: तन्मात्राएँ पांच सूक्ष्म तत्व होते हैं: शब्द, स्पर्श, रूप, रस, और गंध। इन्हीं से पाँच महाभूत (स्थूल तत्व) उत्पन्न होते हैं। ये इंद्रियों के सूक्ष्म विषय हैं।
Q61. सांख्य दर्शन के अनुसार, कितनी मुख्य तत्त्वों की मान्यता है?
A) 20
B) 22
C) 25
D) 28
व्याख्या: सांख्य दर्शन में 25 तत्त्व माने गए हैं: प्रकृति, पुरुष, महत्तत्व, अहंकार, 5 तन्मात्राएँ, 5 ज्ञानेन्द्रियाँ, 5 कर्मेन्द्रियाँ, 5 महाभूत। यह दर्शन सृष्टि की उत्पत्ति और तत्वों की प्रक्रिया को क्रमबद्ध रूप से स्पष्ट करता है।
Q62. सांख्य दर्शन में 'प्रकृति' को किस रूप में स्वीकारा गया है?
A) जगत की मूल कारण
B) माया
C) परमात्मा
D) जीवात्मा
व्याख्या: प्रकृति को सांख्य दर्शन में जगत का मूल कारण माना गया है। यह अव्यक्त, नित्य, अनादि और सर्वशक्तिमान है। इसी से महत्तत्व और अन्य विकार उत्पन्न होते हैं। प्रकृति तीन गुणों - सत्त्व, रजस और तमस से युक्त होती है।
Q63. पुरुष और प्रकृति की भिन्नता को सांख्य दर्शन कैसे सिद्ध करता है?
A) दोनों अनित्य हैं
B) पुरुष चेतन है और प्रकृति अचेतन
C) दोनों सजीव हैं
D) पुरुष ही प्रकृति है
व्याख्या: सांख्य दर्शन में पुरुष को चेतन, निर्गुण और साक्षी माना गया है जबकि प्रकृति को अचेतन, गुणात्मक और सृजनशील माना गया है। इस भिन्नता से ही द्वैतवाद की स्पष्टता मिलती है।
Q64. सांख्य दर्शन के अनुसार, अहंकार की उत्पत्ति किससे होती है?
A) तन्मात्रा
B) प्रकृति
C) महत्तत्व
D) मन
व्याख्या: महत्तत्व (बुद्धि) से ही अहंकार की उत्पत्ति होती है। अहंकार वह तत्त्व है जो "मैं" की भावना उत्पन्न करता है और यही तन्मात्राओं, ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों की उत्पत्ति का कारण बनता है।
Q65. सांख्य दर्शन में ज्ञान प्राप्ति का माध्यम क्या है?
A) प्रत्यक्ष, अनुमान और आप्तवाक्य
B) केवल प्रत्यक्ष
C) केवल अनुमान
D) केवल आप्तवाक्य
व्याख्या: सांख्य दर्शन तीन प्रमाणों को मानता है - प्रत्यक्ष (सीधा अनुभव), अनुमान (तार्किक निष्कर्ष) और आप्तवाक्य (विश्वसनीय साधुओं के कथन)। इनसे सत्य का ज्ञान प्राप्त होता है।
Q66. सांख्य दर्शन में 'मोक्ष' का अर्थ क्या है?
A) स्वर्ग प्राप्ति
B) पुरुष और प्रकृति का पृथक्भाव जानना
C) पुनर्जन्म
D) ब्रह्मलीन होना
व्याख्या: सांख्य दर्शन के अनुसार मोक्ष का तात्पर्य है - पुरुष और प्रकृति के पृथक्स्वरूप को जानकर अविद्या का नाश करना। जब पुरुष स्वयं को प्रकृति से भिन्न जान लेता है, तभी बंधन समाप्त होता है।
Q67. सांख्य दर्शन की प्रमुख कृति कौन-सी है?
A) न्यायसूत्र
B) योगसूत्र
C) मीमांसा सूत्र
D) सांख्यकारिका
व्याख्या: ईश्वरकृष्ण द्वारा रचित "सांख्यकारिका" सांख्य दर्शन की सबसे प्रमुख ग्रंथ है। इसमें सांख्य के मूल सिद्धांतों को सूत्रबद्ध रूप में प्रस्तुत किया गया है।
Q68. सांख्य दर्शन के अनुसार, सृष्टि की उत्पत्ति किस कारण होती है?
A) ईश्वर की इच्छा
B) प्रकृति और पुरुष के संयोग से
C) भाग्य
D) कर्म
व्याख्या: सांख्य दर्शन में सृष्टि की उत्पत्ति को प्रकृति और पुरुष के संयोग से माना गया है। पुरुष की साक्षीता और प्रकृति की सक्रियता से महत्तत्व का निर्माण होता है और आगे क्रमशः सृष्टि का विकास।
Q69. 'त्रिगुण' का सिद्धांत किस दर्शन में प्रमुख रूप से पाया जाता है?
A) सांख्य दर्शन
B) वेदांत दर्शन
C) न्याय दर्शन
D) वैशेषिक दर्शन
व्याख्या: त्रिगुण - सत्त्व, रजस और तमस - सांख्य दर्शन की विशेषता है। यह गुण प्रकृति के स्वभाव का आधार हैं और इनसे ही सभी मनोवृत्तियाँ तथा सृष्टि के विविध रूप उत्पन्न होते हैं।
Q70. सांख्य दर्शन में 'अविद्या' किसे कहा गया है?
A) अंधकार
B) ज्ञान
C) पुरुष और प्रकृति को एक मानना
D) पुनर्जन्म
व्याख्या: जब पुरुष स्वयं को प्रकृति का भाग मानता है, तब यह 'अविद्या' कहलाती है। यही कारण है बंधन का और इसी अविद्या का नाश करके मोक्ष प्राप्त किया जाता है।
Q71. सांख्य दर्शन के अनुसार सृष्टि का कारण क्या है?
A) ब्रह्म
B) प्रकृति और पुरुष
C) ईश्वर
D) आत्मा
व्याख्या: सांख्य दर्शन द्वैतवादी है जो सृष्टि के मूल में दो तत्त्व मानता है — प्रकृति (जड़) और पुरुष (चैतन्य)। इन दोनों की संपर्क से सृष्टि की उत्पत्ति होती है। यह दर्शन ईश्वर को सृष्टि के कारण के रूप में नहीं मानता।
Q72. सांख्य दर्शन में 'अविवेक' का अर्थ क्या है?
A) अज्ञान
B) अहंकार
C) प्रकृति और पुरुष का भेद न जानना
D) मन की चंचलता
व्याख्या: सांख्य दर्शन में 'अविवेक' का अर्थ है प्रकृति और पुरुष का भेद न जानना। इसी अविवेक के कारण बंधन होता है और विवेक ज्ञान के द्वारा मोक्ष प्राप्त होता है।
Q73. सांख्य दर्शन के अनुसार मोक्ष कैसे प्राप्त होता है?
A) भक्ति से
B) तपस्या से
C) विवेक ज्ञान से
D) योग साधना से
व्याख्या: सांख्य में मोक्ष का मार्ग 'विवेक ज्ञान' है। जब व्यक्ति प्रकृति (जड़) और पुरुष (चैतन्य) के भेद को जान जाता है तो वह संसार के बंधनों से मुक्त हो जाता है — यही मोक्ष है।
Q74. सांख्य दर्शन में 'महत्तत्त्व' किसे कहते हैं?
A) बुद्धि
B) प्रथम विकार
C) अहंकार
D) मन
व्याख्या: 'महत्तत्त्व' को सांख्य दर्शन में प्रकृति का प्रथम विकार कहा गया है। यही बाद में बुद्धि, अहंकार और अन्य तत्त्वों का कारण बनता है।
Q75. सांख्य दर्शन में 'पुरुष' की मुख्य विशेषता क्या है?
A) चैतन्य और साक्षी भाव
B) कर्म करनेवाला
C) इच्छाशक्ति
D) प्रकृति का नियंत्रक
व्याख्या: पुरुष को सांख्य दर्शन में चैतन्यस्वरूप और केवल साक्षी भाव रखनेवाला माना गया है। वह स्वयं कोई कर्म नहीं करता, केवल प्रकृति के कार्यों का दर्शक होता है।
Q76. सांख्य दर्शन में 'त्रिगुण' किसे कहते हैं?
A) पुरुष के गुण
B) मन के विकार
C) प्रकृति के गुण
D) ईश्वर के लक्षण
व्याख्या: सांख्य दर्शन में 'त्रिगुण' — सत्त्व, रजस् और तमस् — प्रकृति के मूलभूत गुण माने गए हैं। इन्हीं के संयोग-वियोग से संसार की विविधता उत्पन्न होती है।
Q77. किस ग्रंथ में सांख्य दर्शन की विस्तृत व्याख्या मिलती है?
A) ब्रह्मसूत्र
B) सांख्यकारिका
C) योगसूत्र
D) उपनिषद
व्याख्या: ईश्वरकृष्ण द्वारा रचित 'सांख्यकारिका' ग्रंथ में सांख्य दर्शन का व्यवस्थित और गूढ़ वर्णन किया गया है। यह ग्रंथ सांख्य दर्शन के प्रमुख ग्रंथों में से एक है।
Q78. 'प्रकृति' का अर्थ सांख्य दर्शन में क्या है?
A) प्राकृतिक वस्तुएं
B) अव्यक्त, जड़, मूल कारण
C) भौतिक पदार्थ
D) मन
व्याख्या: सांख्य दर्शन में प्रकृति को मूल कारण (प्रधन) माना गया है। यह अव्यक्त, अचेतन एवं त्रिगुणात्मक होती है, जिससे सृष्टि की सम्पूर्ण विविधता की उत्पत्ति होती है।
Q79. सांख्य दर्शन के अनुसार दुःख का मुख्य कारण क्या है?
A) ईश्वर का न मिलना
B) मन की चंचलता
C) अविवेक
D) वासना
व्याख्या: सांख्य दर्शन में दुःख का कारण 'अविवेक' है — अर्थात प्रकृति और पुरुष का भेद न समझना। इसी भ्रम में व्यक्ति संसार में फँसा रहता है और दुःख का अनुभव करता है।
Q80. सांख्य दर्शन में 'मोक्ष' की स्थिति कैसी होती है?
A) शरीर छोड़ देना
B) स्वर्ग प्राप्ति
C) प्रकृति से पुरुष का पृथक हो जाना
D) तपस्या द्वारा सिद्धि
व्याख्या: सांख्य दर्शन के अनुसार मोक्ष तब होता है जब पुरुष प्रकृति से भिन्न होने का विवेक प्राप्त कर लेता है। यह 'कैवल्य' की अवस्था है जिसमें पुरुष स्वतंत्र हो जाता है।
Q81. सांख्य दर्शन में 'पुरुष' की प्रकृति क्या मानी गई है?
A) सक्रिय
B) निष्क्रिय
C) दोनों
D) न तो सक्रिय न निष्क्रिय
व्याख्या: सांख्य दर्शन में 'पुरुष' को केवल 'द्रष्टा' या 'साक्षी' माना गया है, जो किसी भी प्रकार की गतिविधि में संलग्न नहीं होता। यह निष्क्रिय, शुद्ध चेतना है। क्रिया की सभी प्रवृत्तियाँ प्रकृति में मानी जाती हैं।
Q82. सांख्य के अनुसार 'अविद्या' का मुख्य कारण क्या है?
A) अहंकार
B) रजोगुण
C) पुरुष और प्रकृति का समवय
D) बुद्धि
व्याख्या: सांख्य दर्शन के अनुसार जब पुरुष और प्रकृति के बीच अंतर को न समझा जाए, तब 'अविद्या' उत्पन्न होती है। इस समवय (संयुक्त) की भ्रांति ही बंधन का मूल कारण है।
Q83. प्रकृति के तीन गुणों में 'तमोगुण' का कार्य क्या है?
A) जड़ता और निष्क्रियता
B) रचना और उत्पत्ति
C) स्फूर्ति और गति
D) चेतना और बोध
व्याख्या: तमोगुण का संबंध अंधकार, मोह, जड़ता और निष्क्रियता से है। यह चेतना को ढकता है और आत्मबोध को बाधित करता है।
Q84. सांख्य दर्शन के अनुसार, मुक्ति किस अवस्था में प्राप्त होती है?
A) रजोगुण की प्रधानता में
B) प्रकृति के साथ एकत्व में
C) शरीर छोड़ने पर
D) पुरुष और प्रकृति के भेदज्ञान से
व्याख्या: मुक्ति तभी संभव है जब पुरुष और प्रकृति के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हो। यह विवेक-ख्याति या भेद-ज्ञान कहलाता है।
Q85. सांख्य दर्शन में 'अहंकार' की उत्पत्ति किससे होती है?
A) महत (बुद्धि)
B) मन
C) चित्त
D) प्रकृति
व्याख्या: प्रकृति से महत (बुद्धि) की उत्पत्ति होती है और महत से ही अहंकार उत्पन्न होता है। यह विकास की श्रृंखला में तीसरा तत्व है।
Q86. सांख्य दर्शन की उत्पत्ति किस वेद से मानी जाती है?
A) ऋग्वेद
B) यजुर्वेद
C) श्वेताश्वतर उपनिषद
D) अथर्ववेद
व्याख्या: सांख्य दर्शन की अवधारणाएँ श्वेताश्वतर उपनिषद और भागवत गीता में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत की गई हैं।
Q87. सांख्य दर्शन के अनुसार मनुष्य का अंतिम लक्ष्य क्या है?
A) धर्म पालन
B) भक्ति प्राप्ति
C) ज्ञान वृद्धि
D) मोक्ष प्राप्ति
व्याख्या: सांख्य दर्शन का अंतिम लक्ष्य मोक्ष या कैवल्य है, जो पुरुष और प्रकृति के भेद ज्ञान से प्राप्त होता है।
Q88. सांख्य में 'विकृति' शब्द का क्या अर्थ है?
A) नाश होना
B) दोष
C) विकास रूप
D) मूल तत्व
व्याख्या: सांख्य दर्शन में 'विकृति' का अर्थ है प्रकृति से विकसित हुए तत्व, जैसे बुद्धि, अहंकार, मन, इन्द्रियाँ आदि।
Q89. सांख्य दर्शन के अनुसार 'मन' की गिनती किस वर्ग में होती है?
A) अन्तःकरण
B) स्थूल तत्व
C) ज्ञानेन्द्रिय
D) आत्मा
व्याख्या: मन को अन्तःकरण चतुष्टय में रखा गया है, जिसमें बुद्धि, चित्त और अहंकार भी शामिल हैं।
Q90. सांख्य दर्शन में 'मुक्त पुरुष' की स्थिति क्या होती है?
A) पुनर्जन्म के चक्र में
B) कर्म बंधन में
C) प्रकृति में लीन
D) साक्षी रूप में स्थित
व्याख्या: मुक्त पुरुष पूर्णतः साक्षी भाव में स्थित होता है, वह प्रकृति के किसी क्रिया में सम्मिलित नहीं होता और न ही किसी प्रकार का बंधन उसे छूता है।
Q91. सांख्य दर्शन में आत्मा को क्या कहा गया है?
A) जीव
B) पुरुष
C) ब्रह्म
D) आत्मा
व्याख्या: सांख्य दर्शन के अनुसार 'पुरुष' ही आत्मा है। वह चेतन, शुद्ध, निर्गुण और निष्क्रिय है। प्रकृति के साथ संपर्क के कारण संसार की उत्पत्ति होती है।
Q92. सांख्य दर्शन के अनुसार ज्ञान प्राप्ति का मुख्य साधन क्या है?
A) तर्क
B) श्रवण
C) ध्यान
D) भक्ति
व्याख्या: सांख्य दर्शन में ज्ञान प्राप्ति हेतु प्रमाणीकरण के रूप में प्रत्यक्ष, अनुमान और आप्तवाक्य (शब्द) को स्वीकार किया गया है, परंतु तर्क विशेष स्थान रखता है।
Q93. सांख्य दर्शन किस प्रकार का दर्शन है?
A) द्वैत
B) साकार
C) द्वैतवादी
D) अद्वैत
व्याख्या: सांख्य दर्शन एक द्वैतवादी दर्शन है, क्योंकि इसमें दो अनादि तत्त्व - पुरुष (चेतन) और प्रकृति (जड़) को स्वीकार किया गया है। दोनों अलग-अलग हैं।
Q94. सांख्य के अनुसार प्रकृति की प्रथम विकृति कौन सी है?
A) अहंकार
B) मन
C) इन्द्रियाँ
D) महत (बुद्धि)
व्याख्या: सांख्य दर्शन के अनुसार प्रकृति की प्रथम विकृति महत (या बुद्धि) है। इसके पश्चात अहंकार, मन, इंद्रियाँ आदि उत्पन्न होते हैं।
Q95. सांख्य दर्शन किसको अंतिम मुक्ति मानता है?
A) परमात्मा की प्राप्ति
B) ब्रह्मज्ञान
C) पुरुष और प्रकृति का भेदज्ञान
D) भक्ति
व्याख्या: सांख्य दर्शन के अनुसार जब आत्मा (पुरुष) यह जान लेता है कि वह प्रकृति से अलग है, तब उसे मुक्ति मिलती है। यही भेदज्ञान मुक्ति का मार्ग है।
Q96. सांख्य के अनुसार कितने तत्वों की सृष्टि मानी गई है?
A) 20
B) 24
C) 16
D) 18
व्याख्या: सांख्य दर्शन में 24 तत्त्व माने गए हैं: प्रकृति, महत, अहंकार, मन, पाँच ज्ञानेंद्रियाँ, पाँच कर्मेंद्रियाँ, पाँच तन्मात्राएँ और पाँच महाभूत।
Q97. सांख्य दर्शन में ईश्वर की क्या स्थिति है?
A) ईश्वर का निषेध है
B) ईश्वर सर्वशक्तिमान है
C) ईश्वर साकार है
D) ईश्वर पुरुष का ही रूप है
व्याख्या: सांख्य दर्शन विशेष रूप से ईश्वर को नहीं मानता। यह एक नास्तिक दर्शन की श्रेणी में आता है क्योंकि इसमें ईश्वर की कोई भूमिका नहीं मानी गई।
Q98. सांख्य दर्शन के अनुसार संसार का कारण क्या है?
A) ईश्वर की इच्छा
B) प्रकृति
C) ब्रह्म
D) आत्मा
व्याख्या: सांख्य दर्शन के अनुसार संसार का कारण प्रकृति है। यह जड़ होते हुए भी विभिन्न विकृतियाँ उत्पन्न करती है और जीवों को जन्म, मृत्यु आदि में डालती है।
Q99. सांख्य दर्शन में पुरुष की संख्या कितनी मानी गई है?
A) एक
B) दो
C) सात
D) अनेक
व्याख्या: सांख्य दर्शन मानता है कि पुरुष अनेक हैं। प्रत्येक जीव के भीतर अलग-अलग पुरुष (आत्मा) विद्यमान है, जो स्वतंत्र, चेतन एवं निष्क्रिय होता है।
Q100. सांख्य दर्शन के प्रवर्तक कौन माने जाते हैं?
A) कपिल और पतंजलि
B) पतंजलि
C) बदरायण
D) कपिल मुनि
व्याख्या: सांख्य दर्शन के प्रवर्तक 'कपिल मुनि' माने जाते हैं। इन्होंने प्रथम बार सांख्य तत्त्वज्ञान की संरचना की, जो तर्क और विवेचन पर आधारित थी।
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