योग दर्शन MCQ
Q1. योग दर्शन के प्रणेता कौन माने जाते हैं?
A) गौतम
B) पतंजलि
C) कपिल
D) कणाद
व्याख्या: योग दर्शन के सूत्रों का संकलन महर्षि पतंजलि ने किया, जिन्हें योगसूत्र का रचयिता माना जाता है। पतंजलि ने योग को एक वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक पद्धति के रूप में प्रस्तुत किया। वे शरीर, मन और आत्मा की शुद्धि हेतु अष्टांग मार्ग प्रदान करते हैं, जिससे व्यक्ति मोक्ष प्राप्त कर सके। पतंजलि ने योग को केवल शारीरिक नहीं बल्कि मानसिक अनुशासन की साधना के रूप में परिभाषित किया।
Q2. “योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः” का क्या तात्पर्य है?
A) शरीर की गति को रोकना
B) सांस को नियंत्रित करना
C) चित्त की वृत्तियों को रोकना
D) आत्मा का संयोग
व्याख्या: "योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः" योगसूत्र का पहला और सबसे प्रसिद्ध सूत्र है। इसमें ‘चित्त’ का अर्थ मन है और ‘वृत्ति’ का मतलब है उसकी प्रवृत्तियाँ, जैसे स्मृति, कल्पना, भ्रम आदि। इन वृत्तियों को नियंत्रित कर आत्मा की वास्तविक पहचान होती है। यही योग का उद्देश्य है—चित्त को स्थिर कर आत्म-साक्षात्कार।
Q3. पतंजलि के योग दर्शन में कुल कितने अंग बताए गए हैं?
A) आठ
B) पाँच
C) सात
D) चार
व्याख्या: अष्टांग योग में आठ अंग होते हैं—यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। ये आत्म-शुद्धि और मोक्ष प्राप्ति के क्रमबद्ध सोपान हैं। प्रारंभिक चार अंग व्यक्ति की बाह्य एवं आंतरिक अनुशासन की साधना हैं, जबकि अंतिम चार व्यक्ति को ध्यान और समाधि के माध्यम से ब्रह्म की अनुभूति की ओर ले जाते हैं।
Q4. निम्न में से कौन सा 'नियम' में आता है, न कि 'यम' में?
A) शौच
B) सत्य
C) ब्रह्मचर्य
D) अहिंसा
व्याख्या: पतंजलि ने यम और नियम को योग की आधारशिला माना है। यम में सत्य, अहिंसा, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह आते हैं — जो सामाजिक अनुशासन के नियम हैं। जबकि नियम में शौच (शारीरिक एवं मानसिक स्वच्छता), संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान आते हैं — ये व्यक्तिगत अनुशासन से संबंधित हैं।
Q5. प्रत्याहार का सही अर्थ क्या है?
A) सांस को नियंत्रित करना
B) शरीर की क्रिया को रोकना
C) इंद्रियों को विषयों से हटाना
D) चित्त को शांत करना
व्याख्या: प्रत्याहार अष्टांग योग का पाँचवां अंग है। इसका अर्थ है – इंद्रियों को बाहरी विषयों से हटाकर अंतर्मुख करना। जैसे कछुआ अपने अंगों को समेट लेता है, वैसे ही योगी अपनी इंद्रियों को विषय वासनाओं से हटाकर चित्त की ओर केंद्रित करता है। यह ध्यान और धारणा की तैयारी होती है।
Q6. ध्यान का लक्ष्य क्या होता है?
A) चित्त को एकाग्र करना
B) शरीर को शुद्ध करना
C) इंद्रियों का संयम
D) प्राणायाम करना
व्याख्या: ध्यान यानी ध्यान एक ऐसी अवस्था है जिसमें चित्त एक ही वस्तु पर निरंतर स्थिर रहता है। ध्यान अष्टांग योग का सातवां अंग है, जो अंततः समाधि में बदलता है। इसका उद्देश्य आत्मा और ब्रह्म के बीच की दूरी को समाप्त करना है। चित्त की वृत्तियों का पूर्ण एकाग्र होना ही ध्यान है।
Q7. योग दर्शन के अनुसार 'क्लेश' कितने प्रकार के होते हैं?
A) चार
B) तीन
C) पाँच
D) छह
व्याख्या: योग दर्शन में पांच प्रकार के 'क्लेश' (दुख के कारण) बताए गए हैं — अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, और अभिनिवेश। ये मानसिक विकार हैं जो चित्त को असंतुलित करते हैं और मोक्ष में बाधा उत्पन्न करते हैं। इनका निरोध ही योग की साधना का लक्ष्य है।
Q8. अष्टांग योग का अंतिम और सर्वोच्च अंग कौन सा है?
A) ध्यान
B) समाधि
C) धारणा
D) प्राणायाम
व्याख्या: समाधि अष्टांग योग का अंतिम और सर्वोच्च चरण है। इसमें साधक अपने आत्मा और ब्रह्म के बीच का भेद मिटा देता है। यह पूर्ण आत्मज्ञान और मोक्ष की अवस्था होती है जहाँ चित्त की सारी वृत्तियाँ शांत हो जाती हैं। समाधि के बिना योग की साधना अधूरी मानी जाती है।
Q9. पतंजलि योगसूत्र के अनुसार 'वृत्तियों का निरोध' किसके द्वारा संभव है?
A) यज्ञ द्वारा
B) अभ्यास और वैराग्य द्वारा
C) तपस्या द्वारा
D) भक्ति द्वारा
व्याख्या: पतंजलि कहते हैं कि “अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः” – अर्थात चित्त की वृत्तियों का निरोध अभ्यास (निरंतर साधना) और वैराग्य (आसक्ति रहितता) द्वारा ही संभव है। अभ्यास बिना रुके स्थिरता लाता है और वैराग्य मन की अपेक्षाओं को समाप्त करता है।
Q10. योग दर्शन के अनुसार मुक्ति की प्राप्ति किससे होती है?
A) चित्त वृत्तियों के पूर्ण निरोध से
B) यज्ञ और हवन से
C) दान देने से
D) ज्ञान के प्रचार से
व्याख्या: योग दर्शन में मुक्ति का अर्थ है — आत्मा का प्रकृति से पूर्ण अलगाव और चित्त की समस्त वृत्तियों का निरोध। जब साधक ध्यान और समाधि द्वारा चित्त को शांत करता है, तब आत्मा अपनी शुद्ध अवस्था में स्थित होती है और पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त हो जाती है। इसे 'कैवल्य' कहते हैं।
Q11. योग दर्शन के अनुसार 'क्लेशों' का मूल कारण क्या है?
A) राग
B) द्वेष
C) अविद्या
D) अस्मिता
व्याख्या: योग सूत्र के अनुसार "अविद्या" (अज्ञान) सभी क्लेशों का मूल है। जब व्यक्ति वास्तविकता को नहीं समझता, तो वह अस्मिता (अहंकार), राग (आसक्ति), द्वेष (विरोध), और अभिनिवेश (मृत्यु का भय) जैसे क्लेशों में फंस जाता है। इस अज्ञान का नाश ही योग का मुख्य उद्देश्य है।
Q12. योग में 'अभ्यास' का अर्थ क्या है?
A) लगातार प्रयत्न और साधना
B) वेदपाठ
C) ध्यान की एक अवस्था
D) शरीर साधना
व्याख्या: अभ्यास का तात्पर्य है — चित्त को एक ही वस्तु पर बार-बार स्थिर करने का प्रयास। पतंजलि के अनुसार निरंतर, दीर्घकालीन, श्रद्धापूर्वक साधना को ही अभ्यास कहते हैं। यह मन को स्थिर, नियंत्रित और अंतर्मुखी बनाता है।
Q13. योग दर्शन में 'समाधि' की कितनी अवस्थाएँ मानी गई हैं?
A) दो
B) दो - सविकल्प और निर्विकल्प
C) चार
D) तीन
व्याख्या: योग दर्शन समाधि को दो भागों में विभाजित करता है — सविकल्प (संपर्कयुक्त) और निर्विकल्प (निर्विचार)। सविकल्प समाधि में वस्तु का ज्ञान बना रहता है, जबकि निर्विकल्प समाधि में साधक आत्मा और ब्रह्म में लीन हो जाता है। यह योग का अंतिम लक्ष्य है।
Q14. ‘वैराग्य’ का शाब्दिक अर्थ क्या है?
A) विषयों से आसक्ति का अभाव
B) तपस्या
C) ध्यान
D) आत्मा का ज्ञान
व्याख्या: वैराग्य का अर्थ है — बाह्य और आंतरिक विषयों के प्रति आकर्षण से मुक्त होना। योग में वैराग्य से तात्पर्य है — इंद्रियों के सुखों से मन को विरक्त करना ताकि वह आत्मा की ओर उन्मुख हो सके। अभ्यास और वैराग्य दोनों मिलकर चित्त की वृत्तियों का निरोध करते हैं।
Q15. 'स्वाध्याय' योग के किस अंग में आता है?
A) यम
B) नियम
C) आसन
D) धारणा
व्याख्या: स्वाध्याय का अर्थ है — आत्म-चिंतन और धर्मग्रंथों का अध्ययन। यह 'नियम' का एक अंग है, जो व्यक्ति को आत्मानुशासन और आत्मचिंतन की ओर प्रेरित करता है। स्वाध्याय के माध्यम से व्यक्ति सत्य की ओर अग्रसर होता है।
Q16. अष्टांग योग में 'धारणा' का स्थान कौन-सा है?
A) चौथा
B) छठा
C) सातवाँ
D) पाँचवाँ
व्याख्या: अष्टांग योग में धारणा छठा अंग है। इसका अर्थ है – चित्त को एक विशेष बिंदु या वस्तु पर स्थिर करना। यह ध्यान की तैयारी है। जब धारणा स्थिर होती है, तो वह ध्यान में परिवर्तित हो जाती है।
Q17. योगदर्शन के अनुसार मुक्ति की स्थिति को क्या कहते हैं?
A) निर्विकल्प
B) समाधि
C) कैवल्य
D) आत्मा
व्याख्या: योग दर्शन के अनुसार जब चित्त की वृत्तियाँ पूर्णतः शांत हो जाती हैं और आत्मा प्रकृति से पृथक हो जाती है, तब 'कैवल्य' की अवस्था प्राप्त होती है। यह अंतिम मुक्ति है, जहाँ आत्मा स्वतंत्र और स्वतःप्रकाशित हो जाती है।
Q18. “दुखों का कारण अविद्या है” – यह किस दर्शन का मत है?
A) योग दर्शन
B) न्याय दर्शन
C) वैशेषिक दर्शन
D) वेदांत दर्शन
व्याख्या: योग दर्शन के अनुसार दुखों की जड़ अविद्या है। यह अविद्या व्यक्ति को भ्रम, अहंकार, राग-द्वेष में फंसा देती है। योग का लक्ष्य इसी अविद्या का नाश कर आत्म-ज्ञान की प्राप्ति करना है।
Q19. योगदर्शन में 'कर्म' के प्रभाव को क्या कहा गया है?
A) संस्कार
B) दोष
C) वासना
D) प्रवृत्ति
व्याख्या: योग दर्शन में वासना को कर्मों के प्रभाव के रूप में देखा जाता है। पूर्व जन्मों के संस्कार व्यक्ति के चित्त में वासना के रूप में संचित होते हैं, और यही जन्म-जन्मांतर का कारण बनते हैं। वासना का नाश ही मोक्ष की ओर मार्ग है।
Q20. योग दर्शन में 'कर्माशय' का क्या अर्थ है?
A) इंद्रियों की शक्ति
B) संचित कर्मों का भंडार
C) अहंकार
D) प्राण
व्याख्या: योग सूत्र के अनुसार कर्माशय वह संग्रह है जहाँ हमारे सभी संचित कर्मों के फल एकत्रित होते हैं। यही हमारे भविष्य के अनुभवों और जन्मों का कारण बनते हैं। योग की साधना से इन्हें जलाया जा सकता है, जिससे पुनर्जन्म का चक्र टूटता है।
Q21. योग दर्शन के अनुसार किस अवस्था में 'स्वरूप अवस्थानम्' होता है?
A) प्रत्याहार
B) अभ्यास
C) समाधि
D) चित्तवृत्तियों के निरोध के बाद
व्याख्या: पतंजलि योग सूत्र के अनुसार "तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्" – जब चित्त की वृत्तियाँ रुक जाती हैं, तब आत्मा अपने स्वरूप में स्थित हो जाती है। इसे स्वरूप अवस्थानम् कहते हैं – यह आत्म-प्रकाश की अवस्था है।
Q22. योगदर्शन में ‘द्रष्टा’ किसे कहा गया है?
A) इंद्रियाँ
B) आत्मा
C) चित्त
D) मन
व्याख्या: योग दर्शन में 'द्रष्टा' का अर्थ है – देखने वाला अर्थात आत्मा। यह शुद्ध चैतन्य है, जो चित्त और इंद्रियों द्वारा अनुभव करता है। जब चित्त शुद्ध हो जाता है, तब आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित हो पाती है।
Q23. योग दर्शन के अनुसार 'स्मृति' किस प्रकार की चित्तवृत्ति है?
A) एक ऐसी वृत्ति जिसमें पूर्व अनुभव सुरक्षित रहते हैं
B) वर्तमान का बोध
C) निर्णयात्मक ज्ञान
D) इच्छाशक्ति
व्याख्या: स्मृति चित्त की वह वृत्ति है जिसमें पूर्व के अनुभव, विचार और ज्ञान सुरक्षित रहते हैं। योग दर्शन इसे पाँच प्रमुख वृत्तियों में एक मानता है। स्मृति का शुद्धिकरण आवश्यक है ताकि वह साधक को भ्रमित न करे।
Q24. योगदर्शन में 'विपर्यय' क्या है?
A) वास्तविक ज्ञान
B) ध्यान की उच्च अवस्था
C) मिथ्या ज्ञान
D) इच्छा का नाश
व्याख्या: योग सूत्र में विपर्यय का अर्थ है — गलत या भ्रमपूर्ण ज्ञान। यह वस्तु को उस रूप में न जानकर किसी और रूप में जानना है। जैसे रस्सी को सांप समझना। योग साधना का उद्देश्य ऐसे विपर्ययों से मुक्ति दिलाना है।
Q25. ‘निर्विचार समाधि’ की विशेषता क्या है?
A) विषय पर विचार बना रहता है
B) विषय और विचार दोनों लुप्त हो जाते हैं
C) केवल ध्यान होता है
D) ज्ञान की वृद्धि होती है
व्याख्या: निर्विचार समाधि वह अवस्था है जहाँ न विषय रहता है, न विचार। केवल चैतन्य सत्ता शेष रहती है। यह योग की चरम स्थिति मानी जाती है, जहाँ आत्मा और ब्रह्म में कोई अंतर नहीं रह जाता।
Q26. योग दर्शन किस प्रकार के दर्शन में आता है?
A) चार्वाक दर्शन
B) आस्तिक दर्शन
C) नास्तिक दर्शन
D) शून्यवाद दर्शन
व्याख्या: योग दर्शन वैदिक परंपरा पर आधारित एक आस्तिक दर्शन है। यह ईश्वर, आत्मा, मोक्ष और पुनर्जन्म को स्वीकार करता है। पतंजलि ने इसमें विज्ञान, मनोविज्ञान, और आध्यात्म का समावेश किया है।
Q27. अष्टांग योग का तीसरा अंग क्या है?
A) आसन
B) प्राणायाम
C) यम
D) नियम
व्याख्या: अष्टांग योग का तीसरा अंग 'आसन' है। इसका उद्देश्य शरीर को स्थिर और स्वस्थ बनाना है ताकि साधक ध्यान एवं समाधि में व्यवधान रहित प्रवेश कर सके। पतंजलि ने कहा – "स्थिरसुखमासनम्।"
Q28. योगदर्शन में ‘ईश्वर’ को किस रूप में माना गया है?
A) सृष्टिकर्ता मात्र
B) क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्ट पुरुषविशेष
C) माया
D) मन
व्याख्या: योग दर्शन में ईश्वर को "क्लेश, कर्म, विपाक और आशय से रहित विशेष पुरुष" कहा गया है – अर्थात वह परम आत्मा है जो सदा मुक्त, साक्षी, और सर्वज्ञ है। वह साधक के लिए मार्गदर्शक और गुरु स्वरूप है।
Q29. “तपः स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः” — इसका अर्थ क्या है?
A) समाधि की अवस्था
B) योग की प्रारंभिक साधना
C) प्राणायाम की विधि
D) ध्यान की एक विधि
व्याख्या: योग सूत्र में कहा गया है कि तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्राणिधान – इन तीनों को मिलाकर क्रियायोग कहा जाता है। यह योग की प्रारंभिक साधना है जो चित्त को शुद्ध करने का कार्य करती है।
Q30. योगदर्शन के अनुसार चित्त किससे निर्मित होता है?
A) आत्मा
B) इंद्रियाँ
C) प्रकृति
D) ईश्वर
व्याख्या: योग दर्शन सांख्य के अनुसार प्रकृति से चित्त उत्पन्न होता है। चित्त एक भौतिक तत्व है जो सत्व, रज, तम तीन गुणों से मिलकर बना है। आत्मा केवल साक्षी है, कर्ता नहीं।
Q31. योग दर्शन के अनुसार ‘वैराग्य’ का क्या अर्थ है?
A) सुख की इच्छा
B) क्रोध का विस्फोट
C) इंद्रियों के विषयों में रुचि का अभाव
D) ध्यान में डूबना
व्याख्या: योग दर्शन में ‘वैराग्य’ का अर्थ है — भोगों एवं इंद्रिय विषयों से उत्पन्न आसक्ति को त्याग देना। यह आत्म-संयम और ध्यान की ओर बढ़ने का एक महत्वपूर्ण साधन है। पतंजलि ने इसे अभ्यास के साथ योग प्राप्ति का दूसरा मुख्य स्तंभ बताया है।
Q32. 'संप्रज्ञात समाधि' किस स्थिति को दर्शाती है?
A) केवल निद्रा की अवस्था
B) ध्यान से पहले की स्थिति
C) सांस पर नियंत्रण
D) जब चित्त वस्तु पर केंद्रित हो और उसमें ज्ञान हो
व्याख्या: संपज्ञात समाधि वह स्थिति है जब चित्त किसी विशेष वस्तु पर केंद्रित होता है और उसमें विचार, स्मृति एवं ज्ञान विद्यमान रहते हैं। यह समाधि की प्रारंभिक अवस्था मानी जाती है जहाँ ‘सवितर्क’, ‘निर्विचार’ जैसे स्तर होते हैं।
Q33. योगसूत्र में 'ईश्वर' को कैसे परिभाषित किया गया है?
A) ऐसा पुरुष जो विशेष है, और कर्मों से अतीत है
B) समस्त सृष्टि का स्रष्टा
C) त्रिदेवों का योग
D) ईश्वर का ध्यान व्यर्थ है
व्याख्या: योग दर्शन के अनुसार ईश्वर एक ऐसा पुरुष है जो ‘क्लेश’, ‘कर्म’, ‘विपाक’ और ‘आश्रय’ से रहित है। पतंजलि योगसूत्र (1.24) में उसे “पुरुषविशेष ईश्वरः” कहा गया है।
Q34. योग दर्शन में ‘अविद्या’ किसका कारण मानी गई है?
A) स्मृति
B) दुख और बंधन का
C) समाधि का
D) ज्ञान का
व्याख्या: योग दर्शन में अविद्या को सभी क्लेशों (मानसिक विकारों) की जननी कहा गया है। यह दुख, बंधन, और पुनर्जन्म का मूल कारण है। जब सत्य और असत्य में भ्रम होता है, तो वह अविद्या कहलाती है।
Q35. 'धारणा' और 'ध्यान' में मुख्य अंतर क्या है?
A) दोनों एक जैसे हैं
B) धारणा में एकाग्रता का प्रयास होता है, ध्यान में निरंतर प्रवाह
C) ध्यान पहले आता है
D) ध्यान में विचार नहीं होते, धारणा में होते हैं
व्याख्या: धारणा चित्त को किसी एक बिंदु पर स्थिर करने का प्रयास है, जबकि ध्यान उस बिंदु पर लगातार एकाग्र रहने की प्रक्रिया है। योगदर्शन में धारणा सप्तम और ध्यान अष्टम अंग है।
Q36. 'क्लेशों' की संख्या योग दर्शन में कितनी मानी गई है?
A) चार
B) पाँच
C) छह
D) सात
व्याख्या: योग दर्शन में पाँच क्लेश बताए गए हैं: अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश। ये सभी मन को अशुद्ध करते हैं और बंधन का कारण बनते हैं।
Q37. ‘अभ्यास’ की परिभाषा पतंजलि ने कैसे दी है?
A) एक बार प्रयास करना
B) दीर्घकालिक, बिना बाधा, श्रद्धा से किया गया प्रयास
C) सांस रोकना
D) केवल ध्यान करना
व्याख्या: पतंजलि योगसूत्र (1.14) के अनुसार अभ्यास का अर्थ है — दीर्घकाल तक, निरंतर, श्रद्धा से किया गया प्रयास जिससे चित्त स्थिर होता है।
Q38. योगदर्शन में 'चित्त' के कितने भेद माने गए हैं?
A) दो
B) चार
C) पाँच
D) तीन
व्याख्या: योग दर्शन के अनुसार चित्त की पाँच अवस्थाएँ होती हैं: क्षिप्त, मूढ़, विक्षिप्त, एकाग्र और निरुद्ध। केवल ‘एकाग्र’ और ‘निरुद्ध’ अवस्थाएँ योग की दृष्टि से श्रेष्ठ मानी गई हैं।
Q39. ‘समाधि’ किसका अंतिम रूप है?
A) शरीर का विश्राम
B) ध्यान का चरम रूप
C) इंद्रिय सुख
D) प्राणायाम का फल
व्याख्या: समाधि योग की अंतिम अवस्था है, जहाँ साधक का चित्त पूर्ण रूप से वस्तु में लीन हो जाता है। यह ध्यान की गहराई में जाकर आत्मा के साक्षात्कार की स्थिति होती है।
Q40. योग दर्शन में 'कर्मविपाक' किसे कहते हैं?
A) कर्मों का फल
B) कर्म करने की इच्छा
C) कर्म करने की विधि
D) केवल अच्छे कर्म
व्याख्या: योग दर्शन में 'कर्मविपाक' का अर्थ है – प्रत्येक कर्म के अनुसार मिलने वाला फल। यह जन्म, जीवन की अवस्थाएँ, अनुभव, सुख-दुख आदि में प्रकट होता है। ईश्वर इन कर्मों के फल से परे होता है।
Q41. योग दर्शन के अनुसार, 'क्लेशों' की संख्या कितनी बताई गई है?
A) चार
B) तीन
C) पाँच
D) छह
व्याख्या: पतंजलि ने पाँच क्लेशों का वर्णन किया है: अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश। ये मानसिक अशुद्धियाँ हैं जो चित्त को विक्षिप्त करती हैं और मोक्ष के मार्ग में बाधा बनती हैं।
Q42. योग दर्शन में 'अभिनिवेश' क्लेश का अर्थ क्या है?
A) मोह
B) गुस्सा
C) मृत्यु का भय
D) इंद्रिय लिप्सा
व्याख्या: अभिनिवेश का तात्पर्य है मृत्यु का भय या जीवन के प्रति अत्यधिक मोह। यह क्लेश व्यक्ति को आत्मा के असली स्वरूप से विचलित करता है और पुनर्जन्म के चक्र में बाँधे रखता है।
Q43. योग दर्शन में 'राग' किसका प्रतीक है?
A) क्रोध
B) सुख में आसक्ति
C) मोह
D) दुःख की अभिव्यक्ति
व्याख्या: राग का तात्पर्य है उन सुखों से लगाव जो पहले अनुभव किए गए हैं। यह लगाव व्यक्ति को बार-बार संसार में बांधता है और चित्त की शुद्धि में बाधा उत्पन्न करता है।
Q44. पतंजलि योगसूत्र में 'समाधि' को कितने प्रकारों में विभाजित किया गया है?
A) तीन
B) दो
C) चार
D) एक
व्याख्या: समाधि दो प्रकार की मानी गई है — सविकल्प (संपर्क सहित) और निर्विकल्प (बिना संपर्क)। यह चित्त की सबसे उच्चावस्था है जहाँ आत्मा का पूर्ण साक्षात्कार होता है।
Q45. 'अविद्या' को योग दर्शन में किसका मूल कारण माना गया है?
A) सभी क्लेशों का
B) राग का
C) द्वेष का
D) क्रोध का
व्याख्या: योग दर्शन में कहा गया है कि अविद्या ही अन्य चार क्लेशों की जड़ है। यह आत्मा को शरीर, मन और बुद्धि के साथ भ्रमित कर देती है, जिससे जीवन में अज्ञान और बंधन उत्पन्न होता है।
Q46. 'साधना पाद' योगसूत्र का कौन सा अध्याय है?
A) तीसरा
B) पहला
C) दूसरा
D) चौथा
व्याख्या: योगसूत्र के चार अध्यायों में 'साधना पाद' दूसरा अध्याय है। इसमें अष्टांग योग की संपूर्ण प्रक्रिया का वर्णन किया गया है और अभ्यास के महत्व पर बल दिया गया है।
Q47. योग दर्शन के अनुसार 'कर्माशय' क्या है?
A) योग की स्थिति
B) संस्कारों का भंडार
C) ध्यान की प्रक्रिया
D) समाधि का कारण
व्याख्या: कर्माशय का अर्थ है वह संग्रह जिसमें सभी कर्मों के संस्कार संचित होते हैं। ये भविष्य के जन्म और भोग का कारण बनते हैं। चित्त की शुद्धि से इनसे मुक्ति संभव है।
Q48. योग दर्शन में 'स्वाध्याय' किसका अंग है?
A) नियम
B) यम
C) प्राणायाम
D) प्रत्याहार
व्याख्या: स्वाध्याय यानी आत्म-अध्ययन या वेदादि शास्त्रों का अध्ययन — यह 'नियम' का एक अंग है। यह साधक को आत्मज्ञान की ओर अग्रसर करता है और आत्मबोध में सहायक होता है।
Q49. 'ईश्वर प्रणिधान' का अर्थ क्या है?
A) ज्ञान का अभ्यास
B) ध्यान की प्रक्रिया
C) ईश्वर में पूर्ण समर्पण
D) शारीरिक अभ्यास
व्याख्या: ईश्वर प्रणिधान का अर्थ है अपने संपूर्ण कर्मों को ईश्वर को अर्पित कर देना और उनके आदेश में पूर्ण विश्वास रखना। यह योग में शरणागति भाव का प्रतीक है।
Q50. योग दर्शन के अनुसार 'धारणा' क्या है?
A) सांस की गति पर नियंत्रण
B) ध्यान की चरम अवस्था
C) मन को एक विषय में स्थिर करना
D) चित्त का नाश
व्याख्या: धारणा योग का छठा अंग है, जिसका अर्थ है मन को एक विशिष्ट स्थान या विचार में स्थिर करना। यह ध्यान की प्रारंभिक अवस्था है जो अंततः समाधि की ओर ले जाती है।
Q51. अष्टांग योग में "नियम" का मुख्य उद्देश्य क्या है?
A) बाह्य संसार से विरक्ति
B) आत्मविकास और शुद्ध जीवन शैली
C) केवल शरीर का स्वास्थ्य
D) भोगों की प्राप्ति
व्याख्या: योग दर्शन में "नियम" आंतरिक अनुशासन से संबंधित है, जो आत्मविकास, आत्मशुद्धि, और नियमितता पर बल देता है। इसके अंतर्गत शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान आते हैं, जो साधक को मानसिक व आध्यात्मिक रूप से परिपक्व बनाते हैं।
Q52. 'ध्यान' किसका विकास करता है?
A) चित्त की एकाग्रता
B) शरीर की स्थिरता
C) वाणी की मधुरता
D) इंद्रियों की उत्तेजना
व्याख्या: ध्यान, अष्टांग योग का सातवां अंग है। इसका उद्देश्य चित्त को एकाग्र करना है। यह साधना की वह अवस्था है जहाँ साधक की संपूर्ण चेतना एक विषय पर केंद्रित होती है और बाहरी व्यवधानों से मुक्त रहती है।
Q53. योग के अनुसार 'क्लेशों' की संख्या कितनी होती है?
A) चार
B) छह
C) पाँच
D) सात
व्याख्या: योग दर्शन के अनुसार पांच क्लेश होते हैं: अविद्या (अज्ञान), अस्मिता (अहंकार), राग (आकर्षण), द्वेष (घृणा) और अभिनिवेश (मृत्यु का भय)। ये क्लेश व्यक्ति के चित्त को अशांत करते हैं और दुख का कारण बनते हैं।
Q54. योगसूत्रों में किस शब्द का प्रयोग ‘मन की एकाग्रता की स्थिति’ के लिए किया गया है?
A) प्रत्याहार
B) समाधि
C) अभ्यास
D) धारणा
व्याख्या: धारणा का अर्थ है – मन को किसी एक विषय या बिंदु पर स्थिर करना। यह ध्यान से पूर्व की अवस्था है जहाँ साधक ध्यान की तैयारी करता है। पतंजलि के अनुसार धारणा ही ध्यान की आधारशिला है।
Q55. योगसूत्र में 'क्लेशों' को किसका कारण बताया गया है?
A) शरीर का रोग
B) आय का अभाव
C) अविद्या
D) भोग-विलास
व्याख्या: योग दर्शन में कहा गया है कि अविद्या ही सभी क्लेशों की मूल जड़ है। जब व्यक्ति सच्चे स्वरूप को नहीं पहचानता और माया को ही सत्य मानता है, तब राग, द्वेष, अहंकार और मृत्यु का भय उत्पन्न होता है।
Q56. योग के अनुसार चित्त की तीन अवस्थाएँ क्या होती हैं?
A) जाग्रत, स्वप्न, तुरीय
B) क्षिप्त, मूढ़, एकाग्र
C) स्थूल, सूक्ष्म, कारण
D) मन, बुद्धि, अहंकार
व्याख्या: योग दर्शन के अनुसार चित्त की पांच अवस्थाएँ होती हैं, जिनमें से प्रमुख तीन हैं: क्षिप्त (अशांत), मूढ़ (अज्ञानपूर्ण) और एकाग्र (ध्यानयुक्त)। ये चित्त की स्थिरता और ध्यान की गुणवत्ता को दर्शाती हैं।
Q57. पतंजलि योग दर्शन के अनुसार, 'वैराग्य' का क्या अर्थ है?
A) संसार से पलायन
B) भोजन का त्याग
C) विषयों में अनासक्ति
D) संन्यास धारण करना
व्याख्या: योग में वैराग्य का अर्थ है विषय-वासनाओं और इंद्रियसुखों से अनासक्ति। इसका अर्थ संसार का त्याग नहीं बल्कि भीतर से निर्लिप्त रहना है। यह साधक को अंतर्मुखी बनाता है और ध्यान में सहायता करता है।
Q58. अष्टांग योग में “प्राणायाम” किसके नियंत्रण से संबंधित है?
A) आहार का संतुलन
B) शरीर की गति
C) श्वासों का नियमन
D) इंद्रियों की गति
व्याख्या: प्राणायाम का अर्थ है प्राणों का आयाम — अर्थात श्वास-प्रश्वास की गति का नियंत्रण। इससे जीवन ऊर्जा को नियंत्रित किया जा सकता है और मन शांत रहता है। यह मानसिक नियंत्रण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
Q59. योग में 'संयम' किन तीन अंगों का संयुक्त रूप है?
A) धारणा, ध्यान, समाधि
B) यम, नियम, आसन
C) प्राण, मन, आत्मा
D) तप, स्वाध्याय, ईश्वरप्रणिधान
व्याख्या: योग दर्शन में धारणा, ध्यान और समाधि को 'संयम' कहा गया है। जब साधक इन तीनों पर पूरी तरह नियंत्रण कर लेता है, तब वह अत्यंत सूक्ष्म और गूढ़ ज्ञान को प्राप्त करने में सक्षम हो जाता है।
Q60. योग दर्शन में 'समाधि' की कितनी अवस्थाएं बताई गई हैं?
A) दो
B) चार
C) दो — सविकल्प और निर्विकल्प
D) एक ही अवस्था होती है
व्याख्या: योगसूत्रों में समाधि को दो भागों में विभाजित किया गया है — सविकल्प (सगुण) और निर्विकल्प (निर्गुण)। सविकल्प समाधि में विचार और विषय रहते हैं, जबकि निर्विकल्प समाधि में साधक केवल आत्मा के साक्षात्कार में स्थित रहता है।
Q61. योग दर्शन के अनुसार किस अवस्था में आत्मा की पहचान शुद्ध रूप में होती है?
A) ध्यान
B) समाधि
C) धारणा
D) प्रज्ञा
व्याख्या: योग दर्शन के अनुसार समाधि वह अवस्था है जिसमें चित्त की समस्त वृत्तियाँ शांत हो जाती हैं और आत्मा अपने शुद्ध स्वरूप में प्रकाशित होती है। यह आत्मज्ञान और मोक्ष की अंतिम अवस्था मानी जाती है।
Q62. योगसूत्र में 'अभ्यास' और 'वैराग्य' को किसके लिए आवश्यक माना गया है?
A) चित्तवृत्ति निरोध
B) तप
C) समाधि सिद्धि
D) प्राणायाम
व्याख्या: पतंजलि ने योगसूत्र में बताया है कि चित्तवृत्तियों के निरोध (नियंत्रण) के लिए ‘अभ्यास’ (लगातार प्रयास) और ‘वैराग्य’ (विषयों से विरक्ति) आवश्यक हैं। ये दोनों साथ में साधक को आंतरिक स्थिरता और आत्मसाक्षात्कार की ओर ले जाते हैं।
Q63. अष्टांग योग में ‘नियम’ का कौन-सा अंग 'संतोष' कहलाता है?
A) शौच
B) तप
C) संतोष
D) ईश्वर प्राणिधान
व्याख्या: अष्टांग योग के दूसरे अंग 'नियम' में संतोष प्रमुख गुण है। इसका अर्थ है प्राप्त वस्तु में संतुष्ट रहना और किसी भी परिस्थिति में मानसिक स्थिरता बनाए रखना। संतोष साधना में संतुलन लाता है।
Q64. 'क्लेश' योग दर्शन में किसे कहा गया है?
A) अशुद्ध आहार
B) रोग
C) अज्ञान, अस्मिता आदि दुखदायक संस्कार
D) शारीरिक पीड़ा
व्याख्या: योगसूत्र में 'क्लेश' पाँच प्रकार के बताए गए हैं: अज्ञान, अस्मिता, राग, द्वेष, और अभिनिवेश। ये मानसिक विकार हैं जो आत्मा के ज्ञान को ढक देते हैं और बंधन के कारण बनते हैं।
Q65. योग दर्शन में ‘विभूति’ शब्द का क्या तात्पर्य है?
A) योगाभ्यास से प्राप्त चमत्कारी सिद्धियाँ
B) त्याग
C) कर्मफल
D) मोक्ष
व्याख्या: विभूति योगसूत्र के तृतीय पाद का नाम भी है, जिसमें योगाभ्यास द्वारा प्राप्त सिद्धियों का वर्णन है जैसे—मन की गति जानना, अन्य स्थानों की घटनाएँ देख पाना आदि। परंतु पतंजलि ने चेताया है कि इन विभूतियों में आसक्ति नहीं करनी चाहिए।
Q66. योगदर्शन के अनुसार ‘प्रकाशक योग’ क्या है?
A) स्वप्न योग
B) समाधि योग
C) संकल्प योग
D) शक्ति योग
व्याख्या: पतंजलि के अनुसार समाधि योग वह योग है जो आत्मा को प्रकाशित करता है अर्थात् आत्मज्ञान की अवस्था में ले जाता है। यह विवेक और मोक्ष के मार्ग को प्रकट करता है, इसलिए इसे 'प्रकाशक योग' कहा जाता है।
Q67. योग दर्शन के अनुसार कौन-सा ज्ञान ‘निर्विकल्प समाधि’ में प्राप्त होता है?
A) यथार्थ विषय ज्ञान
B) स्मृति ज्ञान
C) संकल्प ज्ञान
D) आत्मा का स्वरूप ज्ञान
व्याख्या: निर्विकल्प समाधि वह अवस्था है जिसमें कोई विचार, विकल्प या संकल्प नहीं रहता। यह केवल आत्मा के स्वरूप का साक्षात्कार होता है, जिसे कैवल्य ज्ञान या आत्मसाक्षात्कार भी कहा जाता है।
Q68. योग दर्शन में 'धारणा' का अर्थ है?
A) सांस को रोकना
B) मन को एक स्थान पर स्थिर करना
C) शरीर का संयोग
D) इंद्रियों को जागृत करना
व्याख्या: धारणा योग का छठा अंग है जिसमें साधक मन को किसी एक बिंदु या वस्तु पर स्थिर करता है। यह ध्यान और समाधि की पूर्वावस्था है जो मानसिक एकाग्रता को उत्पन्न करती है।
Q69. योग दर्शन में 'ईश्वर' को किस रूप में स्वीकार किया गया है?
A) कर्म का फलदाता
B) विशेष पुरुष
C) साकार रूप
D) सृष्टिकर्ता
व्याख्या: योग दर्शन में ईश्वर को ‘विशेष पुरुष’ कहा गया है जो अव्यभिचारी, सर्वज्ञ और क्लेश-कर्म-विपाकादि से रहित है। वह योग का मार्गदर्शक और आदिगुरु है।
Q70. योगदर्शन के अनुसार 'निर्विचार समाधि' क्या होती है?
A) संकल्प रहित क्रिया
B) बिना विचार की एकाग्र अवस्था
C) स्वप्न स्थिति
D) निद्रा अवस्था
व्याख्या: निर्विचार समाधि में न कोई विचार होता है, न विकल्प। यह एकदम सूक्ष्म चित्त की अवस्था होती है, जहाँ केवल शुद्ध चेतना शेष रहती है। यह आत्मा के साक्षात्कार की गहन अवस्था मानी जाती है।
Q71. योग दर्शन के अनुसार ‘धारणा’ किस अवस्था को कहा जाता है?
A) इंद्रियों का नियंत्रण
B) चित्त को किसी एक स्थान पर स्थिर करना
C) श्वास को नियंत्रित करना
D) आत्मा का ध्यान करना
व्याख्या: धारणा योग का छठा अंग है, जिसका अर्थ है चित्त को एक लक्ष्य या स्थान (जैसे चक्र, ईश्वर, प्रतीक) पर स्थिर करना। यह ध्यान और समाधि की पूर्व अवस्था होती है, जो चित्त की एकाग्रता को सुदृढ़ करती है।
Q72. पतंजलि द्वारा रचित 'योगसूत्र' में कुल कितने सूत्र हैं?
A) 160
B) 185
C) 170
D) 195
व्याख्या: 'योगसूत्र' महर्षि पतंजलि द्वारा रचित ग्रंथ है जिसमें कुल 195 सूत्र हैं। ये सूत्र चार पादों (समाधिपाद, साधनपाद, विभूतिपाद, कैवल्यपाद) में विभाजित हैं, जो योग के सम्पूर्ण सिद्धांत को संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत करते हैं।
Q73. 'ईश्वरप्रणिधान' किस योग अंग में सम्मिलित है?
A) यम
B) आसन
C) नियम
D) प्राणायाम
व्याख्या: नियम योग का दूसरा अंग है, जिसके अंतर्गत पाँच तत्व आते हैं: शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान। 'ईश्वरप्रणिधान' का अर्थ है ईश्वर के प्रति समर्पण, जो आत्मशुद्धि और साधना का मार्ग प्रशस्त करता है।
Q74. 'क्लेश' योग दर्शन में किसे कहा गया है?
A) दुःख को उत्पन्न करने वाले कारण
B) ध्यान की विधि
C) शारीरिक रोग
D) मन की शांति
व्याख्या: पतंजलि के अनुसार 'क्लेश' वे मानसिक विकार हैं जो दुःख का कारण बनते हैं। पाँच प्रमुख क्लेश हैं — अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश। ये चित्त की शुद्धि के मार्ग में बाधा उत्पन्न करते हैं।
Q75. योग दर्शन के अनुसार 'वैराग्य' का वास्तविक अर्थ क्या है?
A) तपस्या करना
B) इंद्रिय सुखों से अनासक्ति
C) शरीर को कष्ट देना
D) संसार त्यागना
व्याख्या: वैराग्य का अर्थ है इंद्रियजन्य सुखों के प्रति राग का त्याग। यह योग में अभ्यास (abhyāsa) के साथ मोक्ष की दिशा में आवश्यक गुण माना गया है। केवल संसार छोड़ना वैराग्य नहीं, बल्कि मन से आसक्ति छोड़ना ही इसका सार है।
Q76. योग में 'कैवल्य' किसे कहते हैं?
A) केवल बैठने की अवस्था
B) एकाग्रता
C) मुक्ति या मोक्ष की अवस्था
D) सांस का अवरोध
व्याख्या: कैवल्य योग दर्शन की अंतिम अवस्था है, जिसमें पुरुष और प्रकृति का संबंध समाप्त हो जाता है। यह पूर्ण स्वतंत्रता और आत्म-साक्षात्कार की स्थिति है, जिसमें आत्मा किसी भी बंधन से मुक्त हो जाती है।
Q77. योगसूत्रों का कौन सा अध्याय 'समाधिपाद' कहलाता है?
A) पहला अध्याय
B) दूसरा अध्याय
C) तीसरा अध्याय
D) चौथा अध्याय
व्याख्या: पतंजलि योगसूत्रों का पहला अध्याय 'समाधिपाद' कहलाता है। इसमें समाधि की परिभाषा, प्रकार, चित्तवृत्तियों का निरोध और समाधि प्राप्ति के उपायों का विस्तृत वर्णन किया गया है।
Q78. 'स्वाध्याय' का अर्थ क्या है?
A) आत्मा का चिंतन
B) स्वयं को मारना
C) ध्यान करना
D) वेदों एवं शास्त्रों का अध्ययन करना
व्याख्या: 'स्वाध्याय' नियमों में आता है और इसका अर्थ होता है — वेदों, उपनिषदों, शास्त्रों, एवं आत्मविकास के ग्रंथों का नियमित अध्ययन। यह आत्मज्ञान की ओर ले जाता है।
Q79. योग के अनुसार ‘अभ्यास’ किसे कहते हैं?
A) तपस्या करना
B) संसार से दूर रहना
C) चित्त को स्थिर रखने का निरंतर प्रयास
D) एक आसन में बैठना
व्याख्या: अभ्यास का अर्थ है चित्त को निरंतर एक स्थिति या लक्ष्य पर स्थिर करने का प्रयास। पतंजलि कहते हैं कि अभ्यास दीर्घकालीन, निरंतर और श्रद्धा से किया गया हो, तभी वह सफल होता है।
Q80. योग दर्शन में 'संयम' का क्या अर्थ है?
A) धारणा, ध्यान और समाधि का समन्वय
B) नियम का पालन
C) प्राण का नियंत्रण
D) योगासन करना
व्याख्या: संयम योग का उच्चतम अभ्यास है, जिसमें धारणा, ध्यान और समाधि – तीनों एकत्र होकर कार्य करते हैं। पतंजलि के अनुसार यह मानसिक शक्तियों को जाग्रत करता है और आत्म साक्षात्कार की ओर ले जाता है।
Q81. योग दर्शन में 'अविद्या' किसका कारण मानी गई है?
A) मोक्ष
B) क्लेशों का मूल
C) समाधि का परिणाम
D) ज्ञान का कारण
व्याख्या: पतंजलि के अनुसार 'अविद्या' सभी क्लेशों का मूल है। यह वास्तविकता के विपरीत ज्ञान है, जिसके कारण आत्मा और प्रकृति में भेद नहीं समझा जाता। यह मोक्ष में बाधा डालती है।
Q82. अष्टांग योग में 'धारणा' का मुख्य उद्देश्य क्या है?
A) चित्त को एक बिंदु पर स्थिर करना
B) शरीर की सफाई
C) प्राणों का संतुलन
D) इंद्रियों का संयम
व्याख्या: 'धारणा' अष्टांग योग का छठा अंग है। इसका उद्देश्य चित्त को एकाग्र करके किसी एक बिंदु या वस्तु पर स्थिर करना है, जो ध्यान और अंततः समाधि की तैयारी है।
Q83. योग दर्शन में 'पुरुष' और 'प्रकृति' की भिन्नता किसके लिए आवश्यक है?
A) यम पालन के लिए
B) ज्ञान प्राप्ति के लिए
C) शरीर सुधार के लिए
D) मोक्ष के लिए
व्याख्या: योग दर्शन में मोक्ष तभी संभव है जब 'पुरुष' (आत्मा) और 'प्रकृति' (भौतिक जगत) का स्पष्ट विवेक उत्पन्न हो। यह विवेकजन्य ज्ञान ही बंधन से मुक्ति दिलाता है।
Q84. योग दर्शन के अनुसार चित्त की कितनी अवस्थाएं होती हैं?
A) दो
B) चार
C) पाँच
D) छह
व्याख्या: योग दर्शन में चित्त की पाँच अवस्थाएँ मानी गई हैं: क्षिप्त, मूढ़, विक्षिप्त, एकाग्र और निरुद्ध। केवल 'एकाग्र' और 'निरुद्ध' अवस्थाएँ योग के लिए अनुकूल होती हैं।
Q85. योग दर्शन में 'साधनपाद' का मुख्य विषय क्या है?
A) अष्टांग योग
B) समाधि के प्रकार
C) क्लेशों का स्वरूप
D) कैवल्य की प्राप्ति
व्याख्या: योग सूत्र का दूसरा अध्याय 'साधनपाद' कहलाता है, जिसमें साधना के माध्यम से अष्टांग योग का विस्तार से वर्णन किया गया है। यह व्यावहारिक योग का मूल भाग है।
Q86. योग दर्शन के अनुसार 'क्लेश' का निवारण किससे होता है?
A) आसन अभ्यास
B) विवेक ख्याति से
C) तप से
D) प्रार्थना से
व्याख्या: पतंजलि ने बताया है कि 'विवेकख्याति' यानी आत्मा और प्रकृति का स्पष्ट ज्ञान ही क्लेशों का नाश कर सकता है। यह मोक्ष की ओर ले जाता है।
Q87. योग दर्शन में 'संस्कार' किसे कहा गया है?
A) तपस्या की प्रक्रिया
B) बाह्य अभ्यास
C) चित्त पर पड़ी हुई प्रवृत्तियों की छाप
D) संयम का नाम
व्याख्या: 'संस्कार' वे गहरी छापें हैं जो चित्त में हमारे पिछले अनुभवों या क्रियाओं के कारण अंकित होती हैं। ये भावी जीवन में भी हमारे व्यवहार को प्रभावित करती हैं।
Q88. 'प्रकाश, क्रिया और स्थिति' योग दर्शन में किसके गुण हैं?
A) पुरुष
B) चित्त
C) आत्मा
D) प्रकृति
व्याख्या: प्रकृति के तीन गुण – सत्त्व (प्रकाश), रजस् (क्रिया), और तमस् (स्थिति/जड़ता) माने गए हैं। यही त्रिगुण प्रकृति के विविध रूपों और परिवर्तनों का कारण बनते हैं।
Q89. योग सूत्र में 'ईश्वर' को किस रूप में वर्णित किया गया है?
A) सृष्टि का रचयिता
B) विशेष पुरुष
C) ब्रह्म
D) गुरु
व्याख्या: पतंजलि ने 'ईश्वर' को 'पुरुषविशेष' कहा है, जो सर्वज्ञ, सदा मुक्त और क्लेशों से रहित है। वह आदिगुरु भी है और उसके ध्यान से चित्त की शुद्धि होती है।
Q90. योग दर्शन के अनुसार 'कैवल्य' का क्या अर्थ है?
A) आत्मा की स्वतंत्रता
B) ध्यान की सिद्धि
C) शरीर की शक्ति
D) ज्ञान प्राप्ति
व्याख्या: 'कैवल्य' योग दर्शन में मोक्ष की अंतिम अवस्था है, जहाँ आत्मा प्रकृति से पूर्णत: भिन्न होकर अपनी स्वतंत्र सत्ता में स्थित हो जाती है। यह चित्तवृत्तियों का निरोध और पूर्ण विवेक का परिणाम होता है।
Q91. योग दर्शन के अनुसार चित्त के कितने प्रकार होते हैं?
A) दो
B) सात
C) पाँच
D) दस
व्याख्या: पतंजलि ने चित्त की पाँच वृत्तियों का वर्णन किया है: प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा, स्मृति। ये चित्त की स्थितियाँ हैं जो आत्मा के अनुभव को प्रभावित करती हैं। योग का उद्देश्य इन वृत्तियों को नियंत्रित करना है।
Q92. योग के अनुसार 'धारणा' का उद्देश्य क्या है?
A) मन को एक स्थान पर स्थिर करना
B) इंद्रियों को बाहर की ओर ले जाना
C) प्राण को उर्जित करना
D) शरीर को स्वस्थ बनाना
व्याख्या: धारणा का अर्थ है मन को किसी एक बिंदु पर स्थिर रखना। यह अष्टांग योग का छठा अंग है जो ध्यान की पूर्व तैयारी है। यह मानसिक एकाग्रता और नियंत्रण की प्रक्रिया है।
Q93. अष्टांग योग का अंतिम अंग क्या है?
A) ध्यान
B) समाधि
C) प्रत्याहार
D) धारणा
व्याख्या: समाधि अष्टांग योग का आठवाँ और अंतिम अंग है। इसमें साधक आत्मा के साथ पूर्णतः एक हो जाता है और सभी भौतिक, मानसिक सीमाओं का अतिक्रमण कर लेता है।
Q94. पतंजलि के अनुसार 'अविद्या' का क्या अर्थ है?
A) वास्तविकता की गलत धारणा
B) ज्ञान की अधिकता
C) ध्यान का दोष
D) प्राण का विस्फोट
व्याख्या: योग दर्शन में 'अविद्या' को सभी क्लेशों की जड़ माना गया है। यह 'अनित्य को नित्य', 'अशुद्ध को शुद्ध' और 'अनात्मा को आत्मा' मानने की भूल है। यही अज्ञान बंधन का कारण है।
Q95. योग दर्शन में 'ईश्वर' को किस रूप में माना गया है?
A) ब्रह्मा के रूप में
B) साकार शक्ति के रूप में
C) विशेष पुरुष
D) प्रकृति के रूप में
व्याख्या: पतंजलि के योग दर्शन में ईश्वर को 'क्लेश-कर्म-विपाक-आशयैः अपरामृष्टः पुरुष विशेषः' कहा गया है। अर्थात् ईश्वर ऐसा विशेष पुरुष है जो किसी भी क्लेश और कर्म से अछूता है।
Q96. योग में 'प्रणव' (ॐ) का महत्व क्या है?
A) ईश्वर का प्रतीक
B) पृथ्वी का प्रतीक
C) प्राण का स्रोत
D) केवल मंत्र
व्याख्या: योग दर्शन में प्रणव (ॐ) को ईश्वर का प्रतीक माना गया है। इसका जप और ध्यान करने से चित्त शुद्ध होता है और ईश्वर से संपर्क स्थापित होता है।
Q97. अष्टांग योग में ‘नियम’ का क्या उद्देश्य है?
A) बाह्य संयम
B) आंतरिक शुद्धि और अनुशासन
C) शक्ति प्राप्ति
D) ध्यान के लाभ
व्याख्या: नियम अष्टांग योग का दूसरा अंग है। यह आंतरिक अनुशासन, स्वच्छता, संतोष, तप, स्वाध्याय, और ईश्वर प्राणिधान की भावना पर आधारित होता है, जो साधक को भीतर से शुद्ध करता है।
Q98. योग दर्शन किस प्रकार का दर्शन है?
A) द्वैताद्वैत
B) द्वैत
C) अद्वैत
D) विशिष्टाद्वैत
व्याख्या: योग दर्शन एक द्वैतवादी दर्शन है, जो पुरुष और प्रकृति को अलग मानता है। आत्मा (पुरुष) और प्रकृति के अलग अस्तित्व को मानते हुए, मुक्ति को उनकी विवेकपूर्वक पहचान में देखता है।
Q99. पतंजलि के अनुसार योग किस उद्देश्य से किया जाता है?
A) स्वास्थ्य लाभ के लिए
B) मोक्ष प्राप्ति हेतु
C) चमत्कार दिखाने के लिए
D) मन को प्रसन्न करने के लिए
व्याख्या: योग का मुख्य उद्देश्य मोक्ष की प्राप्ति है – यानी आत्मा की प्रकृति से भिन्नता को समझना और जन्म-मरण के बंधन से मुक्त होना।
Q100. योग दर्शन में 'क्लेश' किसे कहा गया है?
A) शरीर की पीड़ा
B) तपस्या
C) मानसिक विकार
D) समाधि का भंग
व्याख्या: योग दर्शन में 'क्लेश' का अर्थ है वे मानसिक विकार जो मोक्ष में बाधक हैं। ये पाँच हैं – अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश। योग का अभ्यास इन्हें हटाने के लिए किया जाता है।
Q1. योग की विधिवत दर्शनशास्त्रीय स्थापना किस ऋषि द्वारा की गई?
A) महर्षि पतंजलि
B) कपिल मुनि
C) याज्ञवल्क्य
D) व्यास
व्याख्या: योग की विधिवत और दार्शनिक रूप से स्थापना महर्षि पतंजलि द्वारा की गई। उन्होंने 'योगसूत्र' नामक ग्रंथ की रचना की, जिसमें योग के सिद्धांत, अभ्यास और साधना के मार्ग को सूत्रबद्ध किया गया है। यद्यपि योग की परंपरा वैदिक काल से चली आ रही थी, परंतु पतंजलि ने उसे एक संगठित दर्शन का रूप दिया।
Q2. 'योगसूत्र' में योग को किस रूप में परिभाषित किया गया है?
A) चित्तवृत्तियों का निरोध
B) आत्मा का अनुभव
C) सांसों का नियंत्रण
D) शरीर का शुद्धिकरण
व्याख्या: योगसूत्र (1.2) में योग की परिभाषा दी गई है — "योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः", जिसका अर्थ है: चित्त की वृत्तियों (विकारों, इच्छाओं, चंचलता) का पूर्ण निरोध ही योग है। जब मन शांत और एकाग्र होता है, तब आत्मा अपने शुद्ध स्वरूप को प्रकट करती है।
Q3. पतंजलि के योगसूत्रों की कुल संख्या कितनी है?
A) 195
B) 108
C) 200
D) 196
व्याख्या: पतंजलि के योगसूत्रों की कुल संख्या 195 है। ये चार पादों (भागों) में विभाजित हैं — समाधि पाद, साधन पाद, विभूति पाद और कैवल्य पाद। इन सूत्रों में योग के सभी पहलुओं — अभ्यास, सिद्धि, नियंत्रण, और मोक्ष — को संक्षेप में लेकिन गहराई से बताया गया है।
Q4. योग दर्शन किस दर्शन के विचारों को आधार बनाता है?
A) सांख्य दर्शन
B) न्याय दर्शन
C) वेदांत दर्शन
D) वैशेषिक दर्शन
व्याख्या: योग दर्शन का दार्शनिक आधार सांख्य दर्शन है। जहाँ सांख्य दर्शन आत्मा और प्रकृति को अलग मानता है, वहीं योग दर्शन में इन्हें साधना द्वारा अलग करने की प्रक्रिया बताई गई है। अंतर यह है कि योग दर्शन ईश्वर को भी मानता है, जबकि सांख्य दर्शन ईश्वर को नहीं मानता।
Q5. योग दर्शन के अनुसार ईश्वर को किस रूप में स्वीकार किया गया है?
A) विशेष पुरुष
B) आत्मा का प्रतिबिंब
C) प्रकृति का रूप
D) मन का रूप
व्याख्या: योग दर्शन ईश्वर को 'पुरुषविशेष' मानता है — एक ऐसा विशुद्ध चेतन तत्व जो कभी भी कर्म, क्लेश और संस्कारों से प्रभावित नहीं होता। वह सर्वज्ञ, अनादि और मुक्त है। यह ईश्वर योग साधना में 'ईश्वर प्रणिधान' द्वारा आराध्य रूप में ग्रहण किया जाता है।
Q6. अष्टांग योग की संकल्पना किस ग्रंथ में दी गई है?
A) योगसूत्र
B) भगवद्गीता
C) उपनिषद
D) स्मृति ग्रंथ
व्याख्या: अष्टांग योग (योग के आठ अंगों) की संकल्पना महर्षि पतंजलि द्वारा योगसूत्र में दी गई है। यह आठ चरणों की साधना पद्धति है जो साधक को मोक्ष या कैवल्य की ओर ले जाती है। अष्टांग योग — यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि — इनका क्रमिक अभ्यास आत्मशुद्धि और आत्मसाक्षात्कार के लिए अनिवार्य है।
Q7. अष्टांग योग का प्रथम अंग 'यम' किससे संबंधित है?
A) सामाजिक आचरण
B) शारीरिक व्यायाम
C) सांसों का नियंत्रण
D) ध्यान
व्याख्या: यम योग का पहला अंग है और यह साधक के सामाजिक और नैतिक आचरण को नियंत्रित करता है। यम के पाँच प्रकार हैं — अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह। ये सभी बाह्य अनुशासन हैं, जिनके बिना योग की आंतरिक साधना संभव नहीं होती।
Q8. अष्टांग योग का दूसरा अंग 'नियम' किस प्रकार का अनुशासन है?
A) व्यक्तिगत अनुशासन
B) शारीरिक अनुशासन
C) सामाजिक अनुशासन
D) मानसिक अनुशासन
व्याख्या: 'नियम' योग का दूसरा अंग है और यह व्यक्ति के आत्मानुशासन या आंतरिक शुद्धि से संबंधित होता है। इसके पाँच प्रकार हैं — शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान। यह आत्मा को शुद्ध बनाकर साधना के लिए तैयार करता है।
Q9. योगसूत्र में ‘समाधि’ को किस रूप में परिभाषित किया गया है?
A) जब चित्त केवल ध्येय रूप में स्थित हो
B) जब मन भटकता हो
C) जब शरीर स्थिर हो
D) जब श्वास रुक जाए
व्याख्या: समाधि वह अवस्था है जब साधक का चित्त पूर्ण रूप से ध्येय (जिस पर ध्यान कर रहा है) में ही लीन हो जाता है। यह चित्त की सर्वोच्च अवस्था है, जिसमें स्व और पर के भेद का अंत हो जाता है। समाधि में चित्त स्थिर, निर्विकल्प और पूर्णत: शांत होता है।
Q10. योग दर्शन के अनुसार कैवल्य का अर्थ क्या है?
A) आत्मा की स्वतंत्र अवस्था
B) ध्यान की अवस्था
C) प्राणायाम की सिद्धि
D) शरीर का संयम
व्याख्या: 'कैवल्य' योग दर्शन की अंतिम और परम अवस्था है। इसका अर्थ है आत्मा का पूर्ण रूप से प्रकृति और उसके सभी बंधनों से मुक्त होकर स्वयं में स्थित हो जाना। इस अवस्था में साधक जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है और यह मोक्ष का ही रूप है।
Q11. योग दर्शन के अनुसार 'अहिंसा' किस यम का अंग है?
A) पहला
B) दूसरा
C) तीसरा
D) पाँचवाँ
व्याख्या: यम के पाँच उपवर्गों में 'अहिंसा' को सबसे पहले स्थान दिया गया है। इसका अर्थ है – किसी भी जीव को मन, वाणी या कर्म से पीड़ा न पहुँचाना। यह केवल शारीरिक हिंसा से बचाव नहीं, बल्कि भावनात्मक और मानसिक करुणा का भाव है। अहिंसा योग का मूलभूत नैतिक स्तंभ है।
Q12. योग दर्शन के अनुसार 'शौच' का संबंध किससे है?
A) शारीरिक और मानसिक शुद्धता से
B) ध्यान से
C) वाणी पर संयम से
D) सांसों के नियंत्रण से
व्याख्या: 'शौच' नियमों का पहला अंग है, जिसका तात्पर्य है — बाह्य और आंतरिक शुद्धता। बाह्य शौच शरीर की स्वच्छता है, जबकि आंतरिक शौच में मन, बुद्धि, और भावनाओं की शुद्धि आती है। शुद्ध चित्त ही ध्यान और समाधि के योग्य बनता है।
Q13. प्राणायाम का शाब्दिक अर्थ क्या है?
A) प्राण का आयाम या विस्तार
B) प्राण का अंत
C) सांसों की गिनती
D) वायु को रोकना
व्याख्या: 'प्राणायाम' दो शब्दों से मिलकर बना है – प्राण (जीवन शक्ति) + आयाम (विस्तार)। यह योग का चौथा अंग है और इसका उद्देश्य है – श्वास को नियंत्रित कर ऊर्जा का सही प्रवाह करना। प्राणायाम से न केवल शारीरिक स्वास्थ्य सुधरता है, बल्कि मन भी शांत होता है।
Q14. 'धारणा' किस योगांग का स्थान है?
A) छठा
B) पाँचवाँ
C) सातवाँ
D) आठवाँ
व्याख्या: 'धारणा' अष्टांग योग का छठा अंग है। इसका अर्थ है — चित्त को एक स्थान या विषय पर स्थिर करना। यह ध्यान की पूर्व अवस्था है, जिसमें साधक अभ्यास करता है कि उसका मन बार-बार भटकने की बजाय एक ही बिंदु पर टिका रहे।
Q15. योग दर्शन के अनुसार 'ध्यान' किसका विकास है?
A) धारणा का
B) प्राणायाम का
C) यम का
D) नियम का
व्याख्या: 'ध्यान' अर्थात ध्यान केंद्रित करना — यह 'धारणा' की प्रगाढ़ अवस्था है। जहाँ धारणा में चित्त को एक बार किसी बिंदु पर टिकाया जाता है, वहीं ध्यान में वह निरंतर वहीं स्थिर रहता है। ध्यान से ही समाधि की ओर बढ़ा जाता है।
Q16. योग के अनुसार किस अंग में इन्द्रियों को उनके विषयों से हटाया जाता है?
A) प्रत्याहार
B) धारणा
C) ध्यान
D) आसन
व्याख्या: 'प्रत्याहार' योग का पाँचवाँ अंग है। इसका अर्थ है – इन्द्रियों को उनके विषयों से हटाकर मन के अधीन करना। जैसे कछुआ अपने अंगों को समेट लेता है, वैसे ही साधक अपनी इन्द्रियों को भीतर की ओर मोड़ लेता है। यह अंतर्मुखता की शुरुआत है।
Q17. योग दर्शन में 'ब्रह्मचर्य' का क्या अभिप्राय है?
A) इन्द्रिय संयम
B) ईश्वर भक्ति
C) वेदों का अध्ययन
D) सांसों का नियंत्रण
व्याख्या: 'ब्रह्मचर्य' यम का चौथा अंग है। इसका अर्थ है — इन्द्रिय संयम, विशेषतः कामेंद्रियों पर नियंत्रण। यह ऊर्जा को संभाल कर रखने और उसे उच्च साधनाओं की ओर प्रवाहित करने का उपाय है। ब्रह्मचर्य का पालन मानसिक और शारीरिक शुद्धि के लिए आवश्यक है।
Q18. योग में 'तप' का क्या तात्पर्य है?
A) कठिन साधना और आत्मानुशासन
B) शरीर को कष्ट देना
C) यज्ञ करना
D) मंत्रों का जप
व्याख्या: 'तप' नियम का तीसरा अंग है। इसका अर्थ है – आत्मनियंत्रण, सहनशीलता और साधना में दृढ़ता। यह बाह्य तपस्या नहीं, बल्कि भीतर की अनुशासित साधना है जो चित्त को संकल्पबद्ध बनाती है। तप से मनोबल, धैर्य और आत्मिक उन्नति होती है।
Q19. योगसूत्र के अनुसार समाधि की कितनी अवस्थाएँ होती हैं?
A) दो
B) एक
C) तीन
D) चार
व्याख्या: योग दर्शन में समाधि की दो अवस्थाएँ बताई गई हैं: संप्रज्ञात समाधि और असंप्रज्ञात समाधि। संप्रज्ञात में विचार और अनुभव रहता है, जबकि असंप्रज्ञात समाधि निर्विकल्प और पूर्ण निर्विचार अवस्था होती है — यही मोक्ष की स्थिति है।
Q20. योग के अनुसार साधक की अंतिम उपलब्धि क्या मानी गई है?
A) कैवल्य
B) समाधि
C) ध्यान
D) प्राणायाम
व्याख्या: योग दर्शन में साधक की परम उपलब्धि 'कैवल्य' मानी गई है। यह आत्मा की वह अवस्था है जब वह प्रकृति और उसके सभी बंधनों से मुक्त होकर अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित हो जाती है। यह मोक्ष की अंतिम अवस्था है, जहाँ जन्म-मरण का चक्र समाप्त हो जाता है।
Q21. योगसूत्र में 'स्वाध्याय' का अर्थ क्या है?
A) वेदों और आत्मा का अध्ययन
B) सांसों का अभ्यास
C) आसनों का अभ्यास
D) शरीर की सफाई
व्याख्या: 'स्वाध्याय' नियमों का चौथा अंग है। इसका अर्थ है – स्व का अध्ययन, जिसमें धार्मिक ग्रंथों (जैसे वेद, उपनिषद, गीता आदि) का अध्ययन और मंत्रों का जप शामिल है। इससे आत्मचिंतन की प्रवृत्ति विकसित होती है और चित्त शुद्ध होता है।
Q22. 'ईश्वर प्रणिधान' योग के किस अंग से संबंधित है?
A) नियम
B) यम
C) ध्यान
D) समाधि
व्याख्या: 'ईश्वर प्रणिधान' नियमों का पाँचवाँ अंग है, जिसका अर्थ है – अपने सभी कार्यों और साधना को ईश्वर के प्रति समर्पित करना। यह अहंकार का क्षय करता है और आत्मा को आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर करता है।
Q23. योग दर्शन में 'अस्थेय' का अर्थ है:
A) चोरी न करना
B) हिंसा न करना
C) असत्य न बोलना
D) भोग से बचना
व्याख्या: 'अस्थेय' यम का तीसरा उपवर्ग है। इसका अर्थ है — किसी वस्तु को बिना अनुमति के ग्रहण न करना, अर्थात चोरी न करना। यह नैतिक और सामाजिक मर्यादाओं की रक्षा करता है तथा लालच और लोभ को नियंत्रित करता है।
Q24. योग के किस अंग में शरीर को स्थिर और सुखद अवस्था में रखने की बात कही गई है?
A) आसन
B) प्राणायाम
C) यम
D) धारणा
व्याख्या: 'आसन' योग का तीसरा अंग है। पतंजलि के अनुसार – “स्थिरं सुखं आसनम्” अर्थात शरीर को स्थिर और सुखद रूप से रखने की स्थिति को आसन कहा गया है। यह ध्यान और प्राणायाम की तैयारी के लिए आवश्यक है।
Q25. योग दर्शन के अनुसार प्राणायाम के कितने चरण होते हैं?
A) तीन
B) चार
C) दो
D) पाँच
व्याख्या: प्राणायाम के तीन चरण होते हैं: पूरक (श्वास लेना), कुम्भक (श्वास रोकना), और रेचक (श्वास छोड़ना)। ये अभ्यास चित्त को स्थिर करने में सहायक होते हैं और ध्यान की अवस्था की ओर ले जाते हैं।
Q26. 'धारणा' और 'ध्यान' के बीच मुख्य अंतर क्या है?
A) एक क्षणिक है, दूसरा निरंतर
B) एक शारीरिक है, दूसरा मानसिक
C) दोनों समान हैं
D) एक सांस पर आधारित है
व्याख्या: 'धारणा' में साधक प्रयास करता है कि चित्त एक विषय पर ठहर जाए, यह प्रारंभिक अभ्यास है। जबकि 'ध्यान' वह अवस्था है जहाँ चित्त निरंतर उसी विषय में स्थिर हो जाता है। इसलिए धारणा क्षणिक है और ध्यान निरंतरता की अवस्था।
Q27. योग दर्शन में 'अपरिग्रह' का क्या अर्थ है?
A) संग्रह न करना
B) असत्य बोलना
C) ध्यान करना
D) सांस रोकना
व्याख्या: 'अपरिग्रह' यम का पाँचवाँ उपवर्ग है, जिसका अर्थ है – अनावश्यक संग्रह न करना, वस्तुओं या भोग की इच्छा न रखना। यह साधक को वैराग्य और संतोष की ओर प्रेरित करता है, जिससे साधना में सफलता मिलती है।
Q28. योग में 'कैवल्य' की प्राप्ति किससे होती है?
A) अभ्यास और वैराग्य से
B) केवल ध्यान से
C) यज्ञ और हवन से
D) मंत्र जप से
व्याख्या: पतंजलि ने योगसूत्र में स्पष्ट किया है कि चित्तवृत्तियों का निरोध अभ्यास (अभ्यासः) और वैराग्य (वैराग्यम्) से संभव है। यही मार्ग कैवल्य की प्राप्ति कराता है। अभ्यास से चित्त का स्थिरीकरण होता है और वैराग्य से मोह का क्षय।
Q29. योगसूत्र में 'क्लेश' किसे कहा गया है?
A) अज्ञान, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश
B) क्रोध, लोभ और मोह
C) सांसों का कष्ट
D) तपस्या
व्याख्या: योग दर्शन के अनुसार पाँच क्लेश हैं – अविद्या (अज्ञान), अस्मिता (अहंकार), राग (आकर्षण), द्वेष (घृणा), और अभिनिवेश (मृत्यु का भय)। ये चित्त को अशुद्ध करते हैं और बंधन का कारण बनते हैं। योग का उद्देश्य इन क्लेशों का क्षय करना है।
Q30. योगसूत्र के अनुसार 'चित्त' के कितने प्रमुख विकार (वृत्तियाँ) माने गए हैं?
A) पाँच
B) चार
C) तीन
D) दो
व्याख्या: योग दर्शन में चित्त की पाँच वृत्तियाँ (स्थितियाँ) बताई गई हैं – प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति। इनमें से कुछ सत्वगुण प्रधान (शुद्ध) होती हैं और कुछ रजस-तमस प्रधान (अशुद्ध)। योग का उद्देश्य अशुद्ध वृत्तियों का निरोध करना है।
Q31. योग दर्शन के अनुसार 'चित्त' किन तत्वों से मिलकर बना होता है?
A) मन, बुद्धि और अहंकार
B) आत्मा और शरीर
C) प्राण और इन्द्रियाँ
D) ज्ञान और कर्म
व्याख्या: योग दर्शन में चित्त को एक आंतरिक उपकरण माना गया है, जो तीन तत्त्वों — मन (मनस्), बुद्धि (बुद्धि) और अहंकार (अहंकार) — से मिलकर बना होता है। ये तीनों प्रकृति के सत्त्व, रज और तम गुणों से संचालित होते हैं। चित्त ही बंधन और मोक्ष का साधन है।
Q32. योगसूत्र के अनुसार ‘प्रमाण’ किस प्रकार की वृत्ति है?
A) सत्वगुण प्रधान
B) रजोगुण प्रधान
C) तमोगुण प्रधान
D) विकृति
व्याख्या: 'प्रमाण' योगसूत्र में बताई गई चित्त की पाँच वृत्तियों में से एक है और यह सत्वगुण प्रधान होती है। इसका अर्थ है — सत्य और यथार्थ ज्ञान। प्रमाण तीन प्रकार के होते हैं: प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम। ये ज्ञान की शुद्ध विधियाँ मानी गई हैं।
Q33. योग दर्शन में 'विपर्यय' का क्या तात्पर्य है?
A) असत्य या मिथ्या ज्ञान
B) स्मृति का लोप
C) ध्यान की अवस्था
D) स्वप्न अवस्था
व्याख्या: 'विपर्यय' योग में चित्त की दूसरी वृत्ति है, जिसका अर्थ है — असत्य या भ्रमित ज्ञान। जैसे रस्सी को साँप समझ लेना। यह तमोगुण प्रधान होती है और अज्ञान का प्रतीक मानी जाती है। इसका निरोध ध्यान व विवेक से संभव है।
Q34. योग दर्शन में 'विकल्प' किस प्रकार की वृत्ति है?
A) शब्दज्ञान पर आधारित, वस्तुहीन ज्ञान
B) स्मृति रहित ज्ञान
C) पूर्व अनुभव पर आधारित
D) सम्यक ज्ञान
व्याख्या: 'विकल्प' तीसरी वृत्ति है — इसका अर्थ है केवल शब्दों पर आधारित ऐसा ज्ञान जिसमें वास्तविक वस्तु का अस्तित्व नहीं होता। जैसे – "आकाश में फूल"। यह कल्पना और भ्रांतियों का आधार है, जो चित्त को भटकाता है।
Q35. योग दर्शन में 'निद्रा' को भी एक वृत्ति क्यों माना गया है?
A) क्योंकि उसमें भी स्मृति का आधार होता है
B) क्योंकि वह ध्यान है
C) क्योंकि वह समाधि है
D) क्योंकि वह चेतना है
व्याख्या: 'निद्रा' योग में चित्त की एक वृत्ति है क्योंकि उसमें 'अभाव' का स्मरण होता है। जब नींद से उठते हैं, तो स्मृति होती है कि हम सो रहे थे। अतः यह भी चित्त की एक क्रिया है, भले ही उसमें ज्ञान न हो।
Q36. योग दर्शन में 'स्मृति' किस वृत्ति को कहते हैं?
A) पूर्व अनुभव का पुनः उभरना
B) असत्य ज्ञान
C) आत्मा का अनुभव
D) केवल चेतना
व्याख्या: 'स्मृति' योग में पाँचवीं वृत्ति है, जो पूर्व अनुभवों, देखे-सुने या भोगे गए ज्ञान को पुनः चित्त में जाग्रत करती है। यह मन का स्वाभाविक गुण है और अभ्यास द्वारा इसे शुद्ध या नियंत्रित किया जा सकता है।
Q37. योग के अनुसार 'अभ्यास' क्या है?
A) चित्त को बार-बार एक ही विषय में स्थिर करना
B) शारीरिक व्यायाम
C) मंत्र जप
D) यज्ञ करना
व्याख्या: योगसूत्र में कहा गया है — "तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यासः" अर्थात — चित्त को किसी एक स्थिति (ध्यान या संयम) में स्थिर रखने का निरंतर प्रयास ही अभ्यास है। यह वैराग्य के साथ मिलकर चित्तवृत्तियों का निरोध करता है।
Q38. योग दर्शन के अनुसार 'वैराग्य' का अर्थ क्या है?
A) विषयों से राग का अभाव
B) ध्यान लगाना
C) संन्यास लेना
D) क्रिया योग
व्याख्या: वैराग्य का अर्थ है – इन्द्रिय विषयों के प्रति राग (आकर्षण) का अभाव। यह दो प्रकार का होता है – अपरा वैराग्य (स्थूल विषयों से विरक्ति) और परा वैराग्य (सूक्ष्म गुणों से भी विरक्ति)। योग में वैराग्य से ही साधक आत्मा की ओर बढ़ता है।
Q39. योग दर्शन के अनुसार चित्तवृत्तियों के निरोध के लिए किन दो साधनों की आवश्यकता होती है?
A) अभ्यास और वैराग्य
B) ध्यान और तप
C) यज्ञ और स्वाध्याय
D) आसन और प्राणायाम
व्याख्या: योगसूत्र (1.12) में कहा गया है — "अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः", अर्थात चित्तवृत्तियों का निरोध अभ्यास और वैराग्य से होता है। अभ्यास से चित्त को साध्य में स्थिर किया जाता है और वैराग्य से विषयों से विमुख किया जाता है।
Q40. योग दर्शन के अनुसार 'क्लेशों' का कारण कौन-सा प्रमुख तत्व है?
A) अविद्या
B) राग
C) द्वेष
D) अहंकार
व्याख्या: योगसूत्र (2.4) में कहा गया है कि सभी क्लेशों की जड़ 'अविद्या' है। अविद्या यानी अज्ञान — जब आत्मा को शरीर, मन या बुद्धि मान लिया जाता है। इसी भ्रम से अहंकार, राग, द्वेष और मृत्यु का भय उत्पन्न होते हैं। अतः अविद्या ही सभी दुखों की मूल है।
Q41. योग दर्शन के अनुसार 'ईश्वर' किस रूप में माने गए हैं?
A) पुरुषविशेष
B) प्रकृति
C) चित्त
D) आत्मा और मन का योग
व्याख्या: योग दर्शन में ईश्वर को ‘पुरुषविशेष’ कहा गया है — अर्थात ऐसा विशुद्ध पुरुष जो समस्त क्लेश, कर्मफल और संस्कारों से रहित है। ईश्वर सदा मुक्त, सर्वज्ञ और अनादि है। यह एक विशिष्ट दार्शनिक अवधारणा है जो योग को भक्ति से जोड़ती है।
Q42. पतंजलि योगदर्शन के अनुसार ईश्वर का प्रतीक कौन-सा मंत्र है?
A) ओं (ॐ)
B) नमः शिवाय
C) श्रीराम
D) जय श्रीकृष्ण
व्याख्या: योगसूत्र में कहा गया है — "तस्य वाचकः प्रणवः" अर्थात ईश्वर का प्रतीक 'ॐ' (प्रणव) है। इसका जप और ध्यान ईश्वर के प्रति समर्पण की भावना जाग्रत करता है तथा साधक के चित्त को शुद्ध करता है।
Q43. योग दर्शन में ‘ईश्वर प्रणिधान’ का क्या उद्देश्य है?
A) चित्तवृत्तियों का शुद्धिकरण
B) केवल भक्ति का प्रदर्शन
C) शरीर को स्वस्थ रखना
D) शास्त्रों का अध्ययन
व्याख्या: योग दर्शन में ईश्वर प्रणिधान का तात्पर्य है — अपने समस्त कर्मों और फल की अपेक्षा को ईश्वर को समर्पित कर देना। इससे साधक के अहंकार का क्षय होता है और चित्त निर्मल बनता है, जो ध्यान और समाधि में सहायक होता है।
Q44. योगसूत्र के अनुसार ‘क्लेशों’ की निवृत्ति से किसकी प्राप्ति होती है?
A) कैवल्य
B) मोक्ष
C) सिद्धि
D) आनंद
व्याख्या: योग दर्शन के अनुसार क्लेशों (अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश) की समाप्ति से चित्त शुद्ध हो जाता है और साधक कैवल्य की स्थिति को प्राप्त करता है, जो अंतिम स्वतंत्रता या मोक्ष है।
Q45. योग के अनुसार 'सिद्धियाँ' किससे प्राप्त होती हैं?
A) तप, मंत्र, औषधि, जन्म या समाधि से
B) केवल ध्यान से
C) यज्ञ करने से
D) व्रत रखने से
व्याख्या: योग दर्शन में कहा गया है कि सिद्धियाँ (अलौकिक शक्तियाँ) पाँच साधनों से प्राप्त हो सकती हैं: जन्म, औषधि, मंत्र, तप और समाधि। परंतु योग दर्शन साधक को चेतावनी देता है कि इन सिद्धियों में अटक जाना साधना में बाधा बन सकता है।
Q46. योगदर्शन के अनुसार साधक का मुख्य लक्ष्य क्या है?
A) चित्तवृत्तियों का निरोध
B) इन्द्रियों की सिद्धि
C) शारीरिक बल
D) यज्ञ करना
व्याख्या: योगसूत्र (1.2) में योग को परिभाषित किया गया है — “योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः” अर्थात चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है। साधक का मुख्य लक्ष्य यही है कि उसका चित्त पूर्णतः शांत, स्थिर और नियंत्रित हो जाए।
Q47. पतंजलि योगदर्शन में कुल कितने सूत्र हैं?
A) 195
B) 108
C) 200
D) 180
व्याख्या: महर्षि पतंजलि द्वारा रचित योगसूत्रों की कुल संख्या 195 है। ये चार पादों (अध्यायों) में विभाजित हैं: समाधिपाद, साधनपाद, विभूतिपाद और कैवल्यपाद। ये सूत्र योगदर्शन का मूल आधार हैं।
Q48. योगसूत्र का ‘साधनपाद’ किस विषय से संबंधित है?
A) साधना के उपाय
B) ध्यान की सिद्धि
C) समाधि का स्वरूप
D) कैवल्य की स्थिति
व्याख्या: योगसूत्र का दूसरा अध्याय ‘साधनपाद’ कहलाता है। इसमें अष्टांग योग, क्लेशों का शमन, अभ्यास और वैराग्य जैसे विषयों पर प्रकाश डाला गया है। यह योग साधना की व्यावहारिक दिशा बताता है।
Q49. 'विभूतिपाद' योगसूत्र के किस पक्ष पर केंद्रित है?
A) योग से प्राप्त होने वाली सिद्धियाँ
B) चित्तवृत्ति
C) समाधि की बाधाएँ
D) आसनों का अभ्यास
व्याख्या: योगसूत्र का तीसरा अध्याय ‘विभूतिपाद’ है, जो योग द्वारा प्राप्त होने वाली अलौकिक शक्तियों (सिद्धियाँ) पर केंद्रित है। हालांकि, इसमें यह भी स्पष्ट किया गया है कि इन सिद्धियों में फँसना साधक को मोक्ष से भटका सकता है।
Q50. योगसूत्र का अंतिम अध्याय ‘कैवल्यपाद’ किस विषय पर केंद्रित है?
A) आत्मा की स्वतंत्रता
B) ध्यान का अभ्यास
C) यम-नियम
D) समाधि के प्रकार
व्याख्या: ‘कैवल्यपाद’ योगसूत्र का चौथा और अंतिम अध्याय है। इसमें आत्मा की पूर्ण स्वतंत्रता यानी कैवल्य की अवस्था का वर्णन किया गया है। यह अवस्था चित्त की पूर्ण निवृत्ति और पुरुष की प्रकृति से पूर्ण भिन्नता की स्थिति है।
Q51. पतंजलि के अनुसार 'क्रियायोग' के तीन मुख्य अंग कौन-से हैं?
A) तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान
B) यम, नियम और आसन
C) ध्यान, समाधि और प्राणायाम
D) सेवा, त्याग और तपस्या
व्याख्या: पतंजलि योगसूत्र (2.1) में 'क्रियायोग' को तीन अंगों में विभाजित किया गया है — तप (आत्मसंयम), स्वाध्याय (शास्त्रों एवं मंत्रों का अध्ययन) और ईश्वर प्रणिधान (ईश्वर के प्रति समर्पण)। ये तीनों मिलकर साधक की चित्तशुद्धि और आत्म-साक्षात्कार में सहायक होते हैं।
Q52. योग दर्शन के अनुसार 'क्लेशों' का क्षय किससे होता है?
A) ध्यान और विवेकख्याति से
B) दान और सेवा से
C) शरीर-शुद्धि से
D) सिद्धियों से
व्याख्या: पतंजलि के अनुसार क्लेशों का नाश 'ध्यान' और 'विवेकख्याति' से होता है। विवेकख्याति का अर्थ है – आत्मा और प्रकृति के बीच अंतर को जानने की योग्यता। यह ज्ञान होने पर अज्ञान और क्लेश समाप्त हो जाते हैं।
Q53. योग दर्शन में 'साक्षात्कार' किसकी प्राप्ति को कहा गया है?
A) आत्मा का अनुभव
B) इन्द्रिय सिद्धि
C) मंत्र सिद्धि
D) ध्यान की अवस्था
व्याख्या: योग दर्शन में 'साक्षात्कार' का अर्थ है – आत्मा के साक्षात अनुभव की स्थिति, जब साधक प्रकृति से पूर्णतः अलग होकर अपने वास्तविक स्वरूप को जान लेता है। यह कैवल्य की ओर अग्रसर करने वाला अंतिम ज्ञान होता है।
Q54. योगसूत्र में 'संप्रज्ञात समाधि' किस अवस्था को कहते हैं?
A) जब समाधि में विषय और ज्ञान दोनों विद्यमान हों
B) जब मन शून्य हो
C) केवल निद्रा की अवस्था
D) मंत्रजप की स्थिति
व्याख्या: 'संप्रज्ञात समाधि' वह अवस्था है जिसमें विषय, ज्ञान और ज्ञाता — तीनों का अस्तित्व रहता है। इसमें चित्त की वृत्तियाँ एक विशेष विषय में स्थिर होती हैं, जिससे ज्ञान की उत्पत्ति होती है। यह समाधि का आरंभिक स्तर है।
Q55. 'असंप्रज्ञात समाधि' में क्या विशेषता होती है?
A) चित्त वृत्तियों का पूर्ण निरोध
B) विषय ज्ञान बना रहता है
C) ध्यान की अस्थिरता
D) नींद जैसी अवस्था
व्याख्या: 'असंप्रज्ञात समाधि' वह अवस्था है जहाँ चित्त की सभी वृत्तियाँ पूर्णतः रुक जाती हैं और साधक केवल आत्मा में स्थित होता है। इसमें विषय या विचार नहीं रहते, यह समाधि का सर्वोच्च स्तर है जो कैवल्य की ओर ले जाती है।
Q56. योग दर्शन में 'प्रत्याहार' का क्या अर्थ है?
A) इन्द्रियों को विषयों से हटाकर चित्त में लगाना
B) सांस की गति को रोकना
C) शरीर की सफाई करना
D) ध्यान से उठ जाना
व्याख्या: 'प्रत्याहार' योग का पाँचवाँ अंग है। इसका अर्थ है – इन्द्रियों को बाह्य विषयों से हटाकर भीतर (चित्त) की ओर मोड़ना। यह ध्यान और धारणा की तैयारी में सहायक होता है और चित्त को एकाग्र करता है।
Q57. योगदर्शन के अनुसार 'ध्यान' किसका निरंतर प्रवाह है?
A) एक ही विषय पर चित्त की अविचल धारा
B) अनेक विषयों का चिंतन
C) केवल सांस पर ध्यान
D) निद्रा का अभ्यास
व्याख्या: योग में 'ध्यान' वह अवस्था है जब धारणा की स्थिति निरंतर बनी रहती है — यानी चित्त एक ही विषय पर लगातार स्थिर रहता है। यह चित्त की एकाग्रता की उन्नत अवस्था है जो समाधि की ओर ले जाती है।
Q58. योग में 'धारणा' किसे कहा गया है?
A) किसी विषय पर चित्त को टिकाने का प्रयास
B) मन की चंचलता
C) योग सिद्धि
D) शरीर की थकान
व्याख्या: 'धारणा' योग का छठा अंग है। इसका अर्थ है – चित्त को किसी एक विषय, स्थल या प्रतीक पर एकाग्र करने का प्रयास। यह ध्यान की तैयारी है, जिसमें चित्त को बार-बार उसी विषय में टिकाया जाता है।
Q59. योगदर्शन में 'कैवल्य' का अर्थ क्या है?
A) आत्मा की स्वतंत्रता या मुक्ति
B) इन्द्रिय विषयों का सुख
C) समाधि की शुरुआत
D) मंत्र सिद्धि
व्याख्या: 'कैवल्य' योग दर्शन का अंतिम लक्ष्य है — इसका अर्थ है जब आत्मा प्रकृति से पूरी तरह अलग हो जाती है और स्वतंत्र अवस्था में स्थित होती है। यह मोक्ष की स्थिति है जहाँ न पुनर्जन्म होता है न कोई बंधन।
Q60. योग दर्शन में 'सत्व' गुण का प्रमुख कार्य क्या है?
A) प्रकाश, ज्ञान और शुद्धता देना
B) क्रिया और उत्साह देना
C) जड़ता और आलस्य बढ़ाना
D) विकार पैदा करना
व्याख्या: प्रकृति के तीन गुणों में 'सत्त्व' गुण प्रकाश, विवेक, शांति और पवित्रता का प्रतीक है। योग में सत्त्व का विकास साधक को ज्ञान और आत्मानुभूति की ओर ले जाता है। यह मुक्ति के लिए आवश्यक गुण है।
Q61. योग दर्शन में 'गुणों का वैषम्य' किस कारण बंधन का कारण बनता है?
A) क्योंकि यह चित्त को असंतुलित करता है
B) क्योंकि यह शरीर को दुर्बल करता है
C) क्योंकि इससे ईश्वर क्रोधित होता है
D) क्योंकि इससे ध्यान नहीं हो सकता
व्याख्या: योग दर्शन के अनुसार प्रकृति के तीन गुण — सत्त्व, रज और तम — जब संतुलित होते हैं, तभी चित्त स्थिर रहता है। परंतु जब इनमें असंतुलन (वैषम्य) होता है, तब चित्त विकृत होता है और आत्मा का साक्षात्कार बाधित होता है। यही बंधन का कारण है।
Q62. योग दर्शन में ‘निर्बीज समाधि’ किसे कहा गया है?
A) वह समाधि जिसमें कोई विषय या संस्कार न हो
B) वह समाधि जिसमें मंत्रों का जप होता हो
C) वह अवस्था जो निद्रा जैसी हो
D) वह अवस्था जो सिद्धि देती हो
व्याख्या: ‘निर्बीज समाधि’ का अर्थ है — बीज रहित समाधि, यानी ऐसी अवस्था जिसमें चित्त की कोई भी वृत्ति, संस्कार या विषय नहीं रहता। यह समाधि आत्मा के शुद्ध रूप में स्थित होने की अवस्था है और कैवल्य प्राप्ति का द्वार है।
Q63. योगदर्शन में 'संस्कार' क्या हैं?
A) पूर्ववृत्तियों के कारण चित्त में बने प्रभाव
B) पूजा की विधियाँ
C) धार्मिक परंपराएँ
D) यज्ञ कर्म
व्याख्या: योग दर्शन में ‘संस्कार’ का अर्थ है — चित्त पर पूर्ववृत्तियों से उत्पन्न प्रभाव या छापें। ये संस्कार ही भविष्य की वृत्तियों और प्रवृत्तियों का कारण बनते हैं। समाधि और वैराग्य के अभ्यास से इनका क्षय किया जा सकता है।
Q64. योगदर्शन के अनुसार 'प्रकृति' में कौन-कौन से तत्व सम्मिलित हैं?
A) महत्तत्त्व, अहंकार, तन्मात्राएँ, इन्द्रियाँ आदि
B) केवल पंचमहाभूत
C) केवल शरीर और मन
D) आत्मा और ईश्वर
व्याख्या: योग दर्शन सांख्य के समान प्रकृति को 24 तत्त्वों में विभाजित करता है — महत्तत्त्व (बुद्धि), अहंकार, मन, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच तन्मात्राएँ, पाँच महाभूत आदि। ये सभी जड़ हैं और पुरुष के लिए अनुभव का क्षेत्र बनाते हैं।
Q65. योगदर्शन के अनुसार 'पुरुष' का मुख्य लक्षण क्या है?
A) चैतन्य और साक्षी स्वरूप
B) रचनात्मकता
C) भोग की प्रवृत्ति
D) शक्ति और बल
व्याख्या: योग दर्शन के अनुसार ‘पुरुष’ शुद्ध चैतन्य, निर्गुण और साक्षी है। वह केवल साक्षी रूप से सब कुछ देखता है, परन्तु स्वयं किसी क्रिया में लिप्त नहीं होता। प्रकृति की गतिविधियाँ उसी की उपस्थिति में घटित होती हैं।
Q66. योग दर्शन में 'विवेक ख्याति' का क्या तात्पर्य है?
A) पुरुष और प्रकृति के भेद को जानना
B) चित्त की चंचलता को जानना
C) ध्यान की परिपक्वता
D) आत्मा का दर्शन करना
व्याख्या: ‘विवेक ख्याति’ योग दर्शन की वह ज्ञान अवस्था है जिसमें साधक पुरुष (आत्मा) और प्रकृति के भेद को स्पष्ट रूप से जान लेता है। यही ज्ञान कैवल्य की प्राप्ति का मार्ग है और अज्ञान के अंत का कारण बनता है।
Q67. पतंजलि योगसूत्र में ‘दु:ख’ के कितने प्रकार बताए गए हैं?
A) तीन
B) चार
C) दो
D) पाँच
व्याख्या: योग दर्शन में दुःख को तीन प्रकारों में बाँटा गया है — आध्यात्मिक (शरीर/मन से), आधिभौतिक (अन्य प्राणियों से), और आधिदैविक (प्राकृतिक आपदाओं से)। योग का अभ्यास इन तीनों दुःखों से मुक्ति दिलाता है।
Q68. योग दर्शन के अनुसार 'समाधि' में कितने प्रकार होते हैं?
A) दो – संप्रज्ञात और असंप्रज्ञात
B) एक – केवल ध्यान
C) चार – निद्रा, ध्यान, समाधि, समाधि
D) पाँच – ध्यान, धारणा, समाधि, कैवल्य, सिद्धि
व्याख्या: पतंजलि योग दर्शन में समाधि को दो भागों में विभाजित किया गया है — संप्रज्ञात (विषय सहित समाधि) और असंप्रज्ञात (विषय रहित, निर्वृत्तियों की स्थिति)। ये दोनों ध्यान की उन्नत अवस्थाएँ हैं।
Q69. योगसूत्र में 'नियम' कितने बताए गए हैं?
A) पाँच
B) सात
C) चार
D) आठ
व्याख्या: अष्टांग योग में ‘नियम’ पाँच होते हैं – शौच (शुद्धि), संतोष (संतोष), तप (अनुशासन), स्वाध्याय (शास्त्र-अध्ययन) और ईश्वर प्रणिधान (ईश्वर समर्पण)। ये आत्मविकास और साधना की नींव होते हैं।
Q70. योगदर्शन के अनुसार 'यम' का उद्देश्य क्या है?
A) सामाजिक और नैतिक अनुशासन
B) शरीर को बलवान बनाना
C) ध्यान में प्रवेश
D) सांस का नियंत्रण
व्याख्या: ‘यम’ योग का पहला अंग है और इसका उद्देश्य है – व्यक्ति का सामाजिक और नैतिक अनुशासन विकसित करना। इसके पाँच नियम हैं – अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, और अपरिग्रह। ये योग की शुरुआत में आवश्यक होते हैं।
Q71. पतंजलि योगदर्शन के अनुसार 'चित्त' के मुख्य अंग कौन से हैं?
A) मन, बुद्धि और अहंकार
B) आत्मा, इन्द्रियाँ और शरीर
C) शरीर, प्राण और आत्मा
D) मन, आत्मा और सांस
व्याख्या: योग दर्शन के अनुसार ‘चित्त’ का निर्माण तीन तत्वों से होता है – मन (मनस), बुद्धि (महत्तत्त्व) और अहंकार (अहंता)। ये सभी प्रकृति के विकार हैं और चित्त की वृत्तियाँ इन्हीं के माध्यम से उत्पन्न होती हैं।
Q72. योग दर्शन में 'वैराग्य' का क्या अर्थ है?
A) विषयों की तृष्णा से मुक्त होना
B) संसार को छोड़ना
C) कठिन तप करना
D) मौन व्रत धारण करना
व्याख्या: योग दर्शन में ‘वैराग्य’ का अर्थ है – इन्द्रिय विषयों के प्रति आसक्ति का त्याग। यह केवल त्याग नहीं, बल्कि भीतर से उन विषयों में रुचि समाप्त हो जाना है। यही योगी को स्थिरता और ध्यान में सहायक बनाता है।
Q73. योग दर्शन के अनुसार चित्तवृत्तियों की संख्या कितनी होती है?
A) पाँच
B) चार
C) सात
D) तीन
व्याख्या: योग सूत्र में चित्तवृत्तियों को पाँच प्रकार का बताया गया है – प्रमाण (सत्य ज्ञान), विपर्यय (मिथ्या ज्ञान), विकल्प (कल्पना), निद्रा (नींद) और स्मृति (स्मरण)। इन वृत्तियों का निरोध ही योग का लक्ष्य है।
Q74. योग दर्शन में 'प्रमाण' चित्तवृत्ति के कौन-कौन से प्रकार बताए गए हैं?
A) प्रत्यक्ष, अनुमान, आगम
B) श्रद्धा, भक्ति, ज्ञान
C) योग, ध्यान, समाधि
D) तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान
व्याख्या: 'प्रमाण' चित्तवृत्ति का पहला प्रकार है, जो सत्य ज्ञान से संबंधित है। इसके तीन स्रोत हैं — प्रत्यक्ष (इन्द्रियों से ज्ञात), अनुमान (तर्क आधारित) और आगम (शास्त्रों व गुरु वचन से प्राप्त ज्ञान)।
Q75. 'विपर्यय' किस प्रकार की चित्तवृत्ति है?
A) असत्य या मिथ्या ज्ञान
B) स्वप्न
C) इच्छा
D) दिव्य दृष्टि
व्याख्या: योगदर्शन में 'विपर्यय' का अर्थ है — किसी वस्तु के संबंध में मिथ्या या विपरीत ज्ञान होना, जैसे रस्सी को साँप समझ लेना। यह चित्त की एक विकृत अवस्था है जो अज्ञान से उत्पन्न होती है।
Q76. विकल्प चित्तवृत्ति किससे संबंधित होती है?
A) शब्दज्ञान पर आधारित कल्पना
B) सच्चा ज्ञान
C) नींद
D) ध्यान
व्याख्या: विकल्प एक ऐसी चित्तवृत्ति है जो केवल शब्द और भाषा के आधार पर कल्पना बनाती है, जिसमें वास्तविक वस्तु का कोई अस्तित्व नहीं होता। जैसे – 'स्वर्णपर्वत' शब्द से पहाड़ की कल्पना करना, जबकि वह यथार्थ में नहीं है।
Q77. योगदर्शन में 'निद्रा' किस रूप में मानी गई है?
A) एक चित्तवृत्ति
B) चित्त का विश्राम
C) प्राणायाम की अवस्था
D) ध्यान की गहराई
व्याख्या: योग सूत्र के अनुसार 'निद्रा' भी एक चित्तवृत्ति है। यह तब उत्पन्न होती है जब मन किसी बाहरी या आंतरिक विषय का अनुभव नहीं करता। यह अज्ञान रूप है, जो चित्त में संस्कार छोड़ता है।
Q78. योगदर्शन में 'स्मृति' किसे कहा गया है?
A) पूर्वानुभवों का पुनरुद्धार
B) ध्यान में ध्यानस्थ होना
C) गहरी निद्रा
D) वर्तमान विचार
व्याख्या: 'स्मृति' वह चित्तवृत्ति है जिसमें पूर्व में किए गए अनुभव, क्रियाएँ या ज्ञान पुनः चित्त में प्रकट होते हैं। यह भी चित्त की गति का एक रूप है, जिसे योग के अभ्यास से नियंत्रित किया जाता है।
Q79. 'चित्तवृत्तिनिरोध' किसका साधन है?
A) योग
B) ध्यान
C) प्राणायाम
D) वैराग्य
व्याख्या: योगसूत्र में योग की परिभाषा है — "योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः" अर्थात चित्त की वृत्तियों का निरोध (रोक) ही योग है। चित्तवृत्तियों के रुकने पर आत्मा का साक्षात्कार होता है।
Q80. पतंजलि योगदर्शन में योग का उद्देश्य क्या बताया गया है?
A) पुरुष और प्रकृति का भेद जानकर कैवल्य प्राप्त करना
B) शरीर को बलवान बनाना
C) समाज सेवा करना
D) भोग भोगना
व्याख्या: पतंजलि योगदर्शन का अंतिम उद्देश्य है – आत्मा (पुरुष) और प्रकृति का स्पष्ट भेद जानकर आत्मा को प्रकृति के प्रभाव से मुक्त करना। इस स्थिति को ही ‘कैवल्य’ कहा गया है, जो मोक्ष की अवस्था है।
Q81. पतंजलि योगदर्शन में 'अविद्या' को किस रूप में परिभाषित किया गया है?
A) शाश्वत में अशाश्वत का बोध
B) किसी बात को जानना
C) ईश्वर में विश्वास न होना
D) मन का शांत होना
व्याख्या: योगदर्शन में ‘अविद्या’ को मूल क्लेश कहा गया है। यह वह अज्ञान है जिसमें नश्वर को शाश्वत, अशुद्ध को शुद्ध, दुःख को सुख और अनात्मा को आत्मा मान लिया जाता है। यही कारण है कि आत्मा प्रकृति से बंधी रहती है।
Q82. योगदर्शन के अनुसार 'अस्मिता' क्या है?
A) बुद्धि को आत्मा मान लेना
B) आत्मा का ज्ञान होना
C) शारीरिक बल
D) ध्यान की सिद्धि
व्याख्या: 'अस्मिता' क्लेशों में दूसरा है, जिसका अर्थ है – अहंकार या चित्त की बुद्धि को ही आत्मा मान लेना। यह भ्रम चित्त और आत्मा के भेद न जानने से होता है। इसका निरोध आत्मसाक्षात्कार द्वारा होता है।
Q83. योगदर्शन के अनुसार 'राग' और 'द्वेष' किससे उत्पन्न होते हैं?
A) सुख और दुःख के अनुभवों से
B) तपस्या से
C) संस्कारों से
D) विवेकज्ञान से
व्याख्या: योगदर्शन में बताया गया है कि 'राग' सुख के अनुभव से और 'द्वेष' दुःख के अनुभव से उत्पन्न होता है। ये दोनों क्लेश हैं, जो चित्त को बांधते हैं और ध्यान में बाधा बनते हैं।
Q84. योगदर्शन में 'अभिनिवेश' किसे कहा गया है?
A) मृत्यु के प्रति गहरी आसक्ति
B) जीवन में रुचि
C) सांसारिक वस्तुओं से प्रेम
D) ध्यान का अभ्यास
व्याख्या: 'अभिनिवेश' क्लेशों में पाँचवां है, जिसका अर्थ है – मृत्यु से भय या उससे गहरी आसक्ति। यह आत्मा को शरीर से एकाकार मानने से होता है। योग साधना से इसका निराकरण होता है।
Q85. पतंजलि के अनुसार 'क्लेशों' के कारण क्या होता है?
A) कर्म और जन्म
B) बुद्धि और बल
C) योग और मोक्ष
D) प्राण और मन
व्याख्या: योगदर्शन में कहा गया है कि क्लेश ही कर्मों को जन्म देते हैं और कर्म से पुनर्जन्म होता है। जब तक क्लेश रहते हैं, आत्मा प्रकृति के चक्र में घूमती रहती है।
Q86. योग दर्शन के अनुसार 'कर्माशय' क्या है?
A) चित्त में संचित कर्मों का भंडार
B) शरीर का कोई स्थान
C) ध्यान की अवस्था
D) ईश्वर की कृपा
व्याख्या: ‘कर्माशय’ वह सूक्ष्म भंडार है जिसमें पिछले जन्मों और वर्तमान जन्म के सभी कर्म संचित होते हैं। इन्हीं के अनुसार भविष्य में जन्म और भोग तय होते हैं। समाधि और विवेकख्याति से यह नष्ट होता है।
Q87. पतंजलि के अनुसार 'ध्यान' किस अवस्था के बाद आता है?
A) धारणा
B) प्राणायाम
C) यम
D) नियम
व्याख्या: अष्टांग योग में ‘धारणा’ के बाद ‘ध्यान’ आता है। धारणा में चित्त एक विषय पर टिकता है और जब वह एकाग्रता स्थिर हो जाती है, तो उसे ध्यान कहते हैं। यह समाधि की तैयारी है।
Q88. योग दर्शन में 'ईश्वर' को कैसे परिभाषित किया गया है?
A) क्लेश-कर्म-विपाकाशय से रहित पुरुष
B) सृष्टिकर्ता और संहारकर्ता
C) सगुण ब्रह्म
D) तपस्वियों का स्वामी
व्याख्या: पतंजलि योगदर्शन में ईश्वर को 'क्लेश, कर्म, विपाक और कर्माशय से रहित विशेष पुरुष' कहा गया है। वह सदा मुक्त है और उसका ज्ञान शाश्वत होता है।
Q89. योगदर्शन में 'ओंकार' का प्रयोग किसलिए किया जाता है?
A) ईश्वर के ध्यान और जप के लिए
B) शक्ति प्राप्त करने के लिए
C) वाणी को सुंदर बनाने के लिए
D) योगासन के पहले
व्याख्या: योग सूत्र (1.27–1.28) के अनुसार 'ओं' ईश्वर का वाचक है। इसका जप और ध्यान करने से चित्त में स्थिरता आती है और ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है। यह ध्यान की उत्कृष्ट विधि है।
Q90. पतंजलि योगदर्शन के अनुसार 'कैवल्य' की प्राप्ति किससे होती है?
A) विवेक ख्याति से
B) ध्यान से
C) तपस्या से
D) ओंकार जप से
व्याख्या: योगदर्शन के अनुसार जब साधक ‘विवेक ख्याति’ को प्राप्त कर लेता है, अर्थात आत्मा और प्रकृति के भेद को साक्षात जान लेता है, तब ‘कैवल्य’ (मुक्ति) की प्राप्ति होती है।
Q91. योगदर्शन के अनुसार 'धारणा' किसे कहते हैं?
A) चित्त को किसी एक देश (स्थान) पर स्थिर करना
B) चित्त को सभी विषयों में फैलाना
C) निद्रा की अवस्था
D) शारीरिक व्यायाम
व्याख्या: योगदर्शन के अनुसार धारणा वह अवस्था है जिसमें चित्त को किसी एक विषय या स्थान पर एकाग्र किया जाता है। यह ध्यान और समाधि का प्रथम चरण है।
Q92. योगदर्शन में 'विरामप्रत्यय' समाधि किसे कहते हैं?
A) संस्कार मात्र से उत्पन्न चित्त की शांति की अवस्था
B) कर्मों की अवस्था
C) निद्रा का गहरा रूप
D) ईश्वर प्राप्ति का क्षण
व्याख्या: विरामप्रत्यय समाधि वह अवस्था है जिसमें चित्त में कोई नई वृत्ति नहीं उठती, केवल संस्कार शेष रहते हैं। यह असंप्रज्ञात समाधि की ओर बढ़ने की अवस्था है।
Q93. योगदर्शन में 'संप्रज्ञात समाधि' के कितने प्रकार बताए गए हैं?
A) चार
B) दो
C) एक
D) आठ
व्याख्या: संप्रज्ञात समाधि के चार प्रकार हैं – वितर्क (विचार सहित), विचार (सूक्ष्म विषयों पर), आनन्द (आनंद की अनुभूति), और अस्मिता (केवल अहंभाव)। ये सभी चित्त की वृत्तियों सहित समाधियाँ हैं।
Q94. पतंजलि योगदर्शन में 'कैवल्य' की परिभाषा क्या है?
A) चित्त के गुणों का पूर्ण विलय और आत्मा का स्वतंत्र रूप में स्थित होना
B) शरीर का बलवान होना
C) तपस्या से प्राप्त शक्ति
D) भक्ति की अवस्था
व्याख्या: योग सूत्र के अंतिम सूत्रों में 'कैवल्य' को चित्त की सभी वृत्तियों के लय और आत्मा की पूर्ण स्वतंत्र स्थिति के रूप में बताया गया है। यही मोक्ष या मुक्ति की अवस्था है।
Q95. योगदर्शन के अनुसार 'विवेक ख्याति' की पूर्णता का परिणाम क्या होता है?
A) कैवल्य की प्राप्ति
B) चमत्कार की प्राप्ति
C) शरीर का बल
D) सांसारिक सुख
व्याख्या: जब साधक को निरंतर 'विवेक ख्याति' (पुरुष और प्रकृति के भेद का स्थिर ज्ञान) हो जाता है, तो वह पुनर्जन्म और क्लेशों से मुक्त होकर 'कैवल्य' प्राप्त करता है।
Q96. पतंजलि के योगदर्शन में 'क्लेशों' की निवृत्ति कैसे संभव है?
A) ध्यान और विवेक ख्याति से
B) तीर्थयात्रा से
C) जप और हवन से
D) दान से
व्याख्या: योगदर्शन में कहा गया है कि क्लेशों का क्षय केवल अभ्यास (अभ्यास और वैराग्य) और विवेक ख्याति द्वारा संभव है। यह ध्यान और समाधि के द्वारा ही साधक को प्राप्त होती है।
Q97. पतंजलि के अनुसार 'ईश्वर' की प्राप्ति का साधन क्या है?
A) प्रणव (ॐ) का जप और ध्यान
B) बल और तपस्या
C) यज्ञ और कर्मकांड
D) गुरु की आज्ञा
व्याख्या: पतंजलि योगसूत्र में कहा गया है कि ईश्वर की प्राप्ति 'प्रणव' (ॐ) के निरंतर जप और ध्यान से होती है। इससे चित्त शुद्ध होता है और ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है।
Q98. 'प्रत्याहार' योग का कौन सा अंग है?
A) पाँचवाँ
B) तीसरा
C) पहला
D) आठवाँ
व्याख्या: अष्टांग योग का पाँचवाँ अंग 'प्रत्याहार' है, जिसका अर्थ है — इन्द्रियों को विषयों से हटाकर अंतर्मुखी करना। यह ध्यान में प्रवेश का प्रवेश द्वार है।
Q99. योगदर्शन में 'संस्कार' और 'वृत्ति' के संबंध को कैसे समझाया गया है?
A) वृत्ति संस्कार उत्पन्न करती है और संस्कार नई वृत्ति
B) दोनों एक ही हैं
C) वृत्ति संस्कार को नष्ट कर देती है
D) संस्कार केवल जन्मजात होते हैं
व्याख्या: पतंजलि के अनुसार, हर चित्तवृत्ति एक संस्कार छोड़ जाती है और वही संस्कार आगे चलकर नई वृत्तियाँ उत्पन्न करता है। यह चक्र तभी टूटता है जब योग के माध्यम से वृत्तियों का निरोध होता है।
Q100. योग दर्शन का अंतिम लक्ष्य क्या है?
A) कैवल्य प्राप्त करना
B) सिद्धियाँ प्राप्त करना
C) लंबी आयु प्राप्त करना
D) शक्ति प्रदर्शन करना
व्याख्या: पतंजलि योगदर्शन का अंतिम और सर्वोच्च लक्ष्य है – 'कैवल्य' प्राप्त करना। यह वह अवस्था है जहाँ आत्मा प्रकृति से पूरी तरह मुक्त होकर स्वतंत्र चैतन्य स्वरूप में स्थित हो जाती है।
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