न्याय दर्शन MCQ
Q1. न्याय दर्शन के संस्थापक कौन माने जाते हैं?
A) गौतम
B) कणाद
C) पतंजलि
D) जैमिनि
व्याख्या: न्याय दर्शन के संस्थापक महर्षि गौतम माने जाते हैं, जिन्होंने 'न्यायसूत्र' की रचना की। यह दर्शन मुख्यतः तर्कशास्त्र (Logic) पर आधारित है। इसका उद्देश्य मोक्ष की प्राप्ति के लिए यथार्थ ज्ञान को प्रमाणों द्वारा स्थापित करना है। न्याय दर्शन अन्य दर्शनों की अपेक्षा अधिक तार्किक है और इसने भारतीय ज्ञान परंपरा में 'तर्कशास्त्र' को एक व्यवस्थित रूप दिया।
Q2. न्याय दर्शन में कितने प्रमाण माने गए हैं?
B) दो
C) पाँच
A) चार
D) तीन
व्याख्या: न्याय दर्शन में ज्ञान प्राप्ति के चार प्रमाण (Pramanas) बताए गए हैं – (1) प्रत्यक्ष (Direct Perception), (2) अनुमान (Inference), (3) उपमान (Comparison), और (4) शब्द (Verbal Testimony)। ये प्रमाण सत्य ज्ञान की प्राप्ति के वैध स्रोत माने गए हैं। न्याय दर्शन के अनुसार, जब तक ज्ञान प्रमाण से सिद्ध न हो, तब तक वह मिथ्या या अप्रामाणिक माना जाता है।
Q3. 'अनुमान' प्रमाण का क्या अर्थ है?
B) अनुभव से ज्ञान
C) श्रुति से ज्ञान
D) साक्षी से ज्ञान
A) तर्क के आधार पर ज्ञान
व्याख्या: अनुमान का तात्पर्य है – एक ज्ञात तथ्य के आधार पर किसी अज्ञात तथ्य का ज्ञान प्राप्त करना। जैसे अगर हम किसी पहाड़ पर धुआँ देखते हैं, तो हम यह अनुमान लगाते हैं कि वहाँ आग है। यह अनुमान स्मृति (पूर्व ज्ञान), हेत्वाभास (तर्क) और सामान्य नियम (व्याप्ति) पर आधारित होता है। अनुमान के बिना किसी भी वैज्ञानिक या दार्शनिक सत्य की खोज करना संभव नहीं है, इसलिए न्याय दर्शन में इसका विशेष महत्व है।
Q4. न्याय दर्शन में 'प्रत्यक्ष ज्ञान' की परिभाषा क्या है?
A) इंद्रियों द्वारा प्राप्त ज्ञान
B) तर्क से प्राप्त ज्ञान
C) स्मृति से प्राप्त ज्ञान
D) आस्था से प्राप्त ज्ञान
व्याख्या: प्रत्यक्ष ज्ञान वह है जो हमारी पांच ज्ञानेन्द्रियों (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) के माध्यम से बिना किसी मध्यस्थ के सीधे रूप से प्राप्त होता है। न्याय दर्शन प्रत्यक्ष को प्रमाण का सर्वोच्च रूप मानता है, किंतु यह केवल तब ही प्रमाण होता है जब वह दोषरहित इंद्रियों के द्वारा और मन के योग से प्राप्त हो। उदाहरण: आँखों से वस्तु को देखना प्रत्यक्ष है, परंतु भ्रम या दृष्टिदोष होने पर यह प्रमाण नहीं रह जाता।
Q5. 'उपमान' प्रमाण का तात्पर्य है?
B) प्रत्यक्ष इंद्रियज्ञान
A) समानता के आधार पर ज्ञान
C) स्मृति
D) अनुमान
व्याख्या: उपमान प्रमाण में हम किसी वस्तु की जानकारी दूसरी वस्तु से तुलना करके प्राप्त करते हैं। उदाहरण: यदि कोई व्यक्ति सुनता है कि "गवय" नामक प्राणी जंगल में रहने वाला गाय जैसा जानवर है, और वह जंगल में उस जैसे जानवर को देखकर समझता है कि यह 'गवय' है, तो यह उपमान प्रमाण कहलाता है। यह प्रमाण विशेषतः नई या अज्ञात वस्तुओं की पहचान में सहायक होता है।
Q6. 'शब्द' प्रमाण न्याय दर्शन में किसे कहते हैं?
B) कानों से सुनी गई आवाज़
C) अनुमान से प्राप्त ज्ञान
D) भाष्य
A) विश्वसनीय व्यक्ति या वेदवाक्य की बात
व्याख्या: शब्द प्रमाण का अर्थ है – किसी प्रमाणिक (विश्वसनीय) व्यक्ति या ग्रंथ (जैसे वेद) के वचन के आधार पर ज्ञान प्राप्त करना। यह विशेषतः उन विषयों में उपयोगी होता है जिन्हें प्रत्यक्ष या अनुमान से जानना संभव नहीं, जैसे—धर्म, आत्मा, परलोक आदि। न्याय दर्शन वेदों को अपौरुषेय (मानव रहित) और प्रमाणिक मानता है, इसलिए वेदवाक्य से प्राप्त ज्ञान को शब्द प्रमाण की श्रेणी में रखा गया है।
Q7. न्याय दर्शन किस प्रकार का दर्शन है?
B) भक्ति प्रधान
C) योग प्रधान
A) तर्कप्रधान
D) वेदांत प्रधान
व्याख्या: न्याय दर्शन मुख्यतः "तर्क" (logic) पर आधारित है। इसका लक्ष्य है—ज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति के लिए तर्कपूर्ण प्रमाणों द्वारा सत्य की खोज करना। इसमें प्रत्येक सिद्धांत को प्रमाण द्वारा सिद्ध करना आवश्यक माना गया है। इसी कारण इसे ‘तार्किक दर्शन’ (Logical Philosophy) कहा जाता है। यह दर्शन भारतीय न्याय प्रणाली, शास्त्रार्थ और न्यायशास्त्र की नींव भी बनाता है।
Q8. न्याय दर्शन में 'दुख' का कारण क्या बताया गया है?
B) इंद्रिय सुख
C) मोह
A) अज्ञान
D) आलस्य
व्याख्या: न्याय दर्शन के अनुसार, अज्ञान (अविद्या) ही सभी दुखों की जड़ है। जब मनुष्य सत्य, आत्मा, परमात्मा, और संसार के स्वरूप को नहीं जानता, तब वह गलत धारणाओं और इच्छाओं में फँसता है, जिससे दुख उत्पन्न होते हैं। ज्ञान ही वह साधन है जो इस अज्ञान को दूर कर सकता है और मोक्ष दिला सकता है।
Q9. न्याय दर्शन का प्रमुख ग्रंथ कौन-सा है?
B) योगसूत्र
A) न्यायसूत्र
C) वैशेषिक सूत्र
D) मीमांसा सूत्र
व्याख्या: 'न्यायसूत्र' न्याय दर्शन का मूल ग्रंथ है, जिसकी रचना महर्षि गौतम ने की थी। यह ग्रंथ 5वीं-6वीं शताब्दी ईसा पूर्व का माना जाता है। इसमें ज्ञान, प्रमाण, आत्मा, मोक्ष, तर्क, शास्त्रार्थ, न्याय और दर्शन के अनेक विषयों को तर्कपूर्वक प्रस्तुत किया गया है। यह भारतीय दर्शन में तर्कशास्त्र की नींव रखता है।
Q10. न्याय दर्शन का अंतिम लक्ष्य क्या है?
A) मोक्ष
B) सुख
C) तर्क
D) भक्ति
व्याख्या: न्याय दर्शन का अंतिम लक्ष्य 'मोक्ष' है – यानी जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होना। यह मोक्ष केवल सही ज्ञान से प्राप्त किया जा सकता है, जो प्रमाणों और तर्कों के माध्यम से सिद्ध होता है। ज्ञान के अभाव में आत्मा बंधनों में रहती है, लेकिन जब वह सत्य को जानती है, तो मुक्त हो जाती है। यही इस दर्शन की प्रमुख विशेषता है।
Q11. न्याय दर्शन में 'कृपाण' का क्या अर्थ है?
B) शांति का प्रतीक
C) पवित्र जल
A) ब्राह्मणों का शस्त्र
D) तपस्वियों का व्रत
व्याख्या: न्याय दर्शन में 'कृपाण' को ब्राह्मणों का शस्त्र माना जाता है, जो सत्य की रक्षा करने और अज्ञान को नष्ट करने के लिए प्रयोग किया जाता है। यह तर्क और न्याय के लिए आवश्यक ज्ञान का प्रतीक है, जो किसी भी धार्मिक या दार्शनिक परिपेक्ष्य में प्रकट होता है।
Q12. न्याय दर्शन में 'अपरीक्षित' का क्या अर्थ है?
B) पूर्व अनुभव
A) अप्रत्यक्ष अनुभव
C) साक्षात्कार
D) मनोवैज्ञानिक स्थिति
व्याख्या: 'अपरीक्षित' का तात्पर्य है वह अनुभव या ज्ञान जो प्रत्यक्ष रूप से प्राप्त न हो। इसका उदाहरण वह ज्ञान हो सकता है जिसे तर्क और अनुमान से प्राप्त किया जाता है, लेकिन जिसे हम सीधे तौर पर नहीं देख पाते। यह अप्रत्यक्ष प्रमाणों द्वारा प्राप्त होता है, जैसे भविष्यवाणी या विज्ञान में सिद्धांत।
Q13. न्याय दर्शन में 'सिद्धांत' क्या है?
A) प्रत्यक्ष तर्क से स्थापित सत्य
B) धार्मिक मान्यता
C) ध्यानी स्थिति
D) योग अभ्यास
व्याख्या: न्याय दर्शन में 'सिद्धांत' वह तर्क है, जो सत्य को प्रमाण द्वारा स्थापित करता है। इसका मतलब है, वह सत्य जिसे तर्क, प्रमाण और अनुभव के माध्यम से पुष्टि किया जाता है। सिद्धांत न्याय दर्शन के प्रत्येक घटक में सामर्थ्य और स्पष्टता लेकर आता है।
Q14. न्याय दर्शन के अनुसार 'पश्चाताप' का क्या अर्थ है?
B) मनोवैज्ञानिक विकार
C) किसी कार्य का पश्चात विचार
D) आस्था में वृद्धि
A) ज्ञान की प्राप्ति के बाद अज्ञान को नष्ट करना
व्याख्या: 'पश्चाताप' का अर्थ है – ज्ञान की प्राप्ति के बाद अज्ञान को नष्ट करना। न्याय दर्शन में यह उन आस्थाओं या भ्रमों को त्यागने का एक तरीका है जो वास्तविकता से जुड़े नहीं होते। यह सही ज्ञान के आधार पर गलत कार्यों को स्वीकार और सुधारने की प्रक्रिया है।
Q15. न्याय दर्शन के अनुसार 'साक्षात्कार' का क्या अर्थ है?
A) बिना किसी साक्षी के सत्य की पहचान
B) अंतर्निहित विचार प्रक्रिया
C) धार्मिक उपदेश
D) अंतर्दृष्टि
व्याख्या: 'साक्षात्कार' का तात्पर्य है — बिना किसी प्रमाण या साक्षी के सत्य का ज्ञान प्राप्त करना। यह वह स्थिति है जहाँ व्यक्ति को सत्य का ज्ञान स्वाभाविक रूप से हो जाता है, जैसे ध्यान या मनन से। यह ज्ञान ज्यादातर आध्यात्मिक संदर्भ में उपयोगी होता है।
Q16. न्याय दर्शन के अनुसार 'विरुद्ध' का क्या अर्थ है?
B) सहायक
C) समान
D) अनिश्चित
A) विरोधाभासी
व्याख्या: 'विरुद्ध' का तात्पर्य है — वह जो किसी सिद्धांत या तर्क से विरोध करता है। यह किसी भी तथ्य, कथन या स्थिति का विरोधाभासी होना दर्शाता है, जहाँ एक सिद्धांत दूसरे से मेल नहीं खाता। न्याय दर्शन में, विरुद्ध को गलत या अप्रचलित प्रमाण माना जाता है।
Q17. न्याय दर्शन में 'विज्ञान' का क्या अर्थ है?
B) एक कला
A) व्यवस्थित और प्रमाणित ज्ञान
C) अनुमान के आधार पर ज्ञान
D) धार्मिक अवधारणाएँ
व्याख्या: 'विज्ञान' का तात्पर्य है – वह ज्ञान जो व्यवस्थित और प्रमाणित होता है। न्याय दर्शन में इसे एक सुसंगत और प्रमाणिक प्रणाली के रूप में देखा जाता है। यह प्रमाणों, सिद्धांतों और तर्कों से सत्य की खोज करने की प्रक्रिया है, जो वस्तु, कारण और प्रभाव को जोड़ता है।
Q18. न्याय दर्शन में 'कर्म' का क्या अर्थ है?
A) व्यक्ति के कार्य और उनके परिणाम
B) सत्य का पालन
C) ईश्वर के आदेशों का पालन
D) आस्थावादी कार्य
व्याख्या: 'कर्म' का तात्पर्य है — व्यक्ति के कार्य और उनके परिणाम। न्याय दर्शन में यह माना जाता है कि व्यक्ति के कर्म ही उसके अगले जीवन के फल का निर्धारण करते हैं। यही कर्म फल के सिद्धांत को स्थापित करता है, जो जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त होने के लिए महत्वपूर्ण है।
Q19. न्याय दर्शन में 'संसार' का क्या अर्थ है?
B) केवल भौतिक संसार
C) केवल मानसिक संसार
D) केवल आत्मिक संसार
A) भौतिक और मानसिक संसार
व्याख्या: 'संसार' का तात्पर्य है — वह भौतिक और मानसिक जगत जिसमें हम रहते हैं। यह न्याय दर्शन में वह निरंतर परिवर्तनशील स्थिति है, जिसमें जीव अनुभव, कार्य और परिणामों का सामना करते हैं। यह संसार ही कर्म के परिणामों को जन्म देता है और व्यक्ति को मोक्ष की ओर मार्गदर्शन करता है।
Q20. न्याय दर्शन में 'मोक्ष' का क्या अर्थ है?
A) आत्मा का संसार से मुक्त होना
B) संसार में भौतिक सुख
C) कर्मों का पुनः चक्र
D) शारीरिक सुख
व्याख्या: 'मोक्ष' का तात्पर्य है — आत्मा का संसार के बंधनों से मुक्त होना। यह न्याय दर्शन का अंतिम लक्ष्य है। मोक्ष की प्राप्ति के लिए सत्य ज्ञान, तर्क और प्रमाण के माध्यम से आत्मा का वास्तविक स्वरूप जानना आवश्यक है। मोक्ष तभी प्राप्त होता है, जब आत्मा अपने अज्ञान को समाप्त करती है।
Q21. न्याय दर्शन के अनुसार 'हेत्वाभास' कितने प्रकार के होते हैं?
B) तीन
C) सात
A) पाँच
D) दो
व्याख्या: न्याय दर्शन में 'हेत्वाभास' यानी *तर्क का भ्रम* पाँच प्रकार का होता है — (1) सत्प्रतिपक्ष, (2) विरुद्ध, (3) सिद्धसाधन, (4) असिद्ध, (5) बाधित। ये वे तर्क होते हैं जो प्रथम दृष्टि में सही लगते हैं लेकिन सत्य को प्रमाणित नहीं करते। ये गलत अनुमान का कारण बनते हैं और सत्य ज्ञान में बाधा डालते हैं।
Q22. 'समवाय कारण' किसे कहते हैं?
B) ईश्वर
C) कार्य का दृश्य रूप
D) इच्छाशक्ति
A) वह कारण जो कार्य में अविभाज्य रूप से विद्यमान होता है
व्याख्या: 'समवाय कारण' वह होता है जो कार्य के साथ अविभाज्य रूप से जुड़ा होता है, जैसे कपड़े के लिए धागा। न्याय दर्शन में कारण को तीन भागों में बाँटा गया है — समवायी, असमवायी, और निमित्त। समवाय कारण वस्तु का आंतरिक घटक होता है जो उसमें स्थायी रूप से विद्यमान होता है।
Q23. न्याय दर्शन के अनुसार आत्मा की मुख्य विशेषता क्या है?
B) आकार
A) ज्ञान ग्रहण करने की क्षमता
C) गति
D) स्थूलता
व्याख्या: न्याय दर्शन में आत्मा को चेतन, निराकार और नित्य माना गया है। इसकी प्रमुख विशेषता 'ज्ञान ग्रहण करने की क्षमता' है। आत्मा ही वह तत्व है जो अनुभव करता है, सुख-दुख जानता है और मोक्ष का अधिकारी बनता है। आत्मा इंद्रियों और मन की सहायता से ज्ञान प्राप्त करती है।
Q24. न्याय में 'व्याप्ति' का क्या अर्थ है?
A) कारण और कार्य के बीच स्थायी संबंध
B) तात्कालिक अनुभूति
C) कर्म फल
D) संयोग
व्याख्या: 'व्याप्ति' का अर्थ है — दो वस्तुओं के बीच ऐसा अटूट संबंध, जहाँ एक के होने पर दूसरी का होना निश्चित हो। जैसे, जहाँ धुआँ है वहाँ आग ज़रूर होगी — यह धुआँ और आग की व्याप्ति है। अनुमान प्रमाण की वैधता में व्याप्ति की भूमिका केंद्रीय होती है।
Q25. न्याय दर्शन में 'द्रव्य' कितने प्रकार के माने गए हैं?
B) सात
C) पाँच
D) तीन
A) नौ
व्याख्या: न्याय दर्शन के अनुसार द्रव्य (substance) नौ प्रकार के होते हैं — (1) पृथ्वी, (2) जल, (3) अग्नि, (4) वायु, (5) आकाश, (6) काल, (7) दिशा, (8) आत्मा, (9) मन। ये सभी 'सत्ताओं' (Padarthas) के अंतर्गत आते हैं और संसार की संरचना का आधार माने जाते हैं।
Q26. 'निमित्त कारण' किसे कहते हैं?
B) सजातीय कारण
A) वह कारण जो कार्य का सृजन करता है
C) उपादान
D) ज्ञान
व्याख्या: 'निमित्त कारण' वह होता है जो कार्य की उत्पत्ति में सक्रिय भूमिका निभाता है। जैसे बढ़ई द्वारा लकड़ी से कुर्सी बनाना — यहाँ बढ़ई निमित्त कारण है। यह बाहरी कारण होता है जो कार्य की दिशा निर्धारित करता है।
Q27. न्याय दर्शन में कितने पदार्थ (Padarthas) माने गए हैं?
A) सात
B) चार
C) नौ
D) तीन
व्याख्या: न्याय दर्शन में सात प्रकार के पदार्थ माने गए हैं — (1) द्रव्य, (2) गुण, (3) कर्म, (4) सामान्य, (5) विशेष, (6) संबंध (समवाय), (7) अभाव। ये पदार्थ ब्रह्मांड की हर वस्तु या अनुभव को वर्गीकृत करने में सहायक होते हैं। इनका ज्ञान ही सत्य के निकट ले जाता है।
Q28. न्याय दर्शन में 'गुण' किसे कहा गया है?
B) जो स्वतंत्र रूप से विद्यमान हो
C) जो केवल आत्मा में हो
D) जो पदार्थ न हो
A) जो द्रव्य में स्थित होकर उसके बिना अस्तित्व न रखे
व्याख्या: 'गुण' वह विशेषता है जो द्रव्य में निवास करती है और द्रव्य के बिना स्वतंत्र अस्तित्व नहीं रखती। जैसे रंग, गंध, संख्या आदि। गुणों के माध्यम से ही द्रव्यों को पहचाना जाता है, परंतु गुण स्वयं क्रियात्मक नहीं होते।
Q29. न्याय दर्शन में 'समवाय संबंध' किसके बीच होता है?
A) द्रव्य और गुण के बीच
B) आत्मा और शरीर के बीच
C) मन और इंद्रियों के बीच
D) कारण और कार्य के बीच
व्याख्या: 'समवाय' एक विशेष संबंध है जो अविभाज्य होता है, जैसे द्रव्य और उसके गुण या धागा और कपड़ा। यह संबंध स्थायी होता है और जब तक दोनों वस्तुएँ रहती हैं, तब तक यह संबंध बना रहता है।
Q30. न्याय में 'अभाव' को किस रूप में माना गया है?
B) यह मिथ्या है
C) यह भ्रम है
A) वास्तविकता का अभाव भी एक तत्व है
D) केवल मानसिक स्थिति
व्याख्या: न्याय दर्शन में 'अभाव' को भी एक वास्तविक तत्व माना गया है। किसी वस्तु की अनुपस्थिति को भी अनुभव किया जा सकता है, इसलिए इसे एक स्वतंत्र 'पदार्थ' की तरह स्वीकार किया गया है। उदाहरण: “घड़े में जल नहीं है” — यह भी एक ज्ञान है।
Q31. न्याय दर्शन में 'अनुमान' किस प्रकार का प्रमाण है?
B) प्रत्यक्ष प्रमाण
C) वैदिक प्रमाण
A) अप्रत्यक्ष प्रमाण
D) मानसिक प्रमाण
व्याख्या: न्याय दर्शन में अनुमान एक अप्रत्यक्ष प्रमाण है। यह व्याप्ति (संबंध) पर आधारित होता है। जैसे धुएँ को देखकर हम अनुमान लगाते हैं कि वहाँ आग है। अनुमान में तीन अंग होते हैं – हेतु, दृष्टांत और व्याप्ति।
Q32. 'शब्द प्रमाण' किसे कहा जाता है?
B) लेखन से प्राप्त ज्ञान
A) विश्वसनीय व्यक्ति के वाक्य द्वारा प्राप्त ज्ञान
C) केवल वेद
D) मनोविज्ञान
व्याख्या: न्याय में 'शब्द' प्रमाण का अर्थ है – किसी योग्य, सत्यवादी, और ज्ञानी व्यक्ति के वाक्य द्वारा प्राप्त ज्ञान। वेद अपौरुषेय माने गए हैं, इसलिए वे भी शब्द प्रमाण के अंतर्गत आते हैं।
Q33. 'प्रत्यक्ष' प्रमाण में कितने तत्व होते हैं?
A) छह
B) दो
C) चार
D) आठ
व्याख्या: न्याय में प्रत्यक्ष ज्ञान के छह अंग बताए गए हैं – इंद्रिय, अर्थ (वस्तु), संयोग, इंद्रियार्थ संनिकर्ष, ज्ञान और आत्मा। ये सभी तत्व प्रत्यक्ष ज्ञान को संभव बनाते हैं।
Q34. न्याय में 'मन' की विशेषता क्या है?
B) स्थूल और सर्वव्यापक
C) गतिशील
D) जड़
A) सूक्ष्म और एकदेशी
व्याख्या: न्याय दर्शन के अनुसार 'मन' सूक्ष्म (इंद्रियों से परे) और एकदेशी (एक समय में एक ही वस्तु पर केंद्रित) होता है। यह आत्मा और इंद्रियों के बीच सेतु का कार्य करता है और ज्ञान प्रक्रिया को संभव बनाता है।
Q35. न्याय दर्शन में 'इच्छा', 'प्रयत्न', और 'ज्ञान' का संबंध किससे है?
A) आत्मा
B) मन
C) इंद्रिय
D) शरीर
व्याख्या: न्याय दर्शन में इच्छा, प्रयत्न, सुख-दुख, ज्ञान आदि आत्मा के गुण माने गए हैं। आत्मा ही इन सबका अनुभव करती है और यही इनका अधिष्ठान (आधार) होती है।
Q36. न्याय दर्शन में 'स्मृति' किस प्रकार का ज्ञान है?
B) नवीन ज्ञान
C) प्रमेय
A) पूर्व अनुभव का पुनः आभास
D) मिथ्या ज्ञान
व्याख्या: स्मृति वह ज्ञान है जो पूर्व में हुए अनुभव के पुनः स्मरण से उत्पन्न होता है। न्याय दर्शन में इसे *अप्रामाणिक* (प्रमाण नहीं) माना गया है क्योंकि यह नवीन सत्य नहीं बताता, बल्कि बीते हुए का स्मरण मात्र है।
Q37. 'भ्रम' को न्याय में क्या कहा गया है?
A) अयथार्थ ज्ञान
B) प्रमेय
C) अनुमान
D) यथार्थ ज्ञान
व्याख्या: 'भ्रम' वह ज्ञान है जो वस्तु को वैसा नहीं दिखाता जैसी वह वास्तव में है। जैसे रस्सी को साँप समझ लेना। न्याय दर्शन में भ्रम को अयथार्थ ज्ञान कहा गया है और यह प्रमेय नहीं माना गया।
Q38. न्याय दर्शन के अनुसार इंद्रियों की संख्या कितनी मानी गई है?
B) चार
C) छह
A) पाँच
D) सात
व्याख्या: न्याय में पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ मानी गई हैं — चक्षु (नेत्र), घ्राण (नाक), रसना (जीभ), त्वचा और कर्ण (कान)। ये इंद्रियाँ ज्ञान प्राप्ति के साधन हैं। मन को छठवीं इंद्रिय नहीं माना गया, बल्कि उसे आत्मा से जोड़ने वाली एक सूक्ष्म सत्ता माना गया।
Q39. न्याय में 'प्रमेय' का क्या अर्थ है?
B) तर्क करने योग्य सिद्धांत
A) जानने योग्य वस्तु
C) शब्द
D) प्रमाण
व्याख्या: प्रमेय वह वस्तु या विषय है जिसे प्रमाणों के द्वारा जाना जाता है। न्याय दर्शन में नौ प्रमेय गिनाए गए हैं – आत्मा, शरीर, इंद्रिय, अर्थ, बुद्धि, मन, प्रयास, दोष, जन्म।
Q40. न्याय दर्शन में 'प्रमाण' और 'प्रमेय' का क्या संबंध है?
B) प्रमेय से प्रमाण उत्पन्न होता है
C) दोनों समान हैं
D) कोई संबंध नहीं
A) प्रमाण से प्रमेय का ज्ञान होता है
व्याख्या: प्रमाण वह माध्यम है जिससे प्रमेय (जानने योग्य वस्तु) का ज्ञान होता है। जैसे प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द, आदि प्रमाणों के द्वारा आत्मा, शरीर आदि प्रमेयों का ज्ञान प्राप्त होता है।
Q41. न्याय दर्शन में 'हेत्वाभास' का कौन-सा प्रकार "सत्प्रतिपक्ष" कहलाता है?
A) जब विपरीत हेतु भी सिद्ध हो सकता है
B) जब हेतु सिद्ध न हो
C) जब हेतु बाधित हो
D) जब हेतु विरोधी हो
व्याख्या: सत्प्रतिपक्ष वह हेत्वाभास है, जिसमें विपक्ष में कोई अन्य तर्क उतनी ही शक्ति से उपस्थित हो जाता है। उदाहरण: “यह पर्वत धुँधला है, क्योंकि यह जल से घिरा है” — परंतु कोई कहे, “नहीं, यह धुँधला नहीं है क्योंकि यह वायु से घिरा है”। दोनों के तर्क समान शक्ति रखते हैं, इसलिए सत्प्रतिपक्ष कहा जाता है।
Q42. 'सिद्धसाधन' हेत्वाभास का क्या अर्थ है?
B) जिसमें विरोधी तर्क हो
C) जिसमें कारण गलत हो
A) जिसमें हेतु सिद्ध होने वाली वस्तु पर ही आधारित हो
D) जिसमें अनुमान नहीं हो
व्याख्या: 'सिद्धसाधन' वह त्रुटिपूर्ण तर्क होता है जहाँ हम जिस वस्तु को सिद्ध करना चाहते हैं, उसी को कारण के रूप में प्रस्तुत कर देते हैं। यह तर्क चक्रवात उत्पन्न करता है और कोई नवीन ज्ञान नहीं देता।
Q43. न्याय दर्शन में अनुमान के कितने भेद माने गए हैं?
B) दो
A) तीन
C) चार
D) पाँच
व्याख्या: न्याय दर्शन में अनुमान तीन प्रकार के होते हैं: (1) पूर्ववत (cause to effect), (2) शेषवत (effect to cause), (3) सामान्यतोदृष्ट (based on general observation)। ये सभी व्याप्ति और तर्क पर आधारित होते हैं।
Q44. पूर्ववत अनुमान का उदाहरण क्या है?
A) बादलों को देखकर वर्षा का अनुमान लगाना
B) नदी में जल देख कर पर्वत पर वर्षा का अनुमान
C) किसी का बीमार दिखना
D) अग्नि का अनुभव करना
व्याख्या: पूर्ववत अनुमान वह है जिसमें हम कारण देखकर प्रभाव का अनुमान लगाते हैं। जैसे बादल (कारण) को देखकर वर्षा (प्रभाव) का अनुमान लगाना। यह अनुमान सामान्यतः भविष्य की घटनाओं के लिए किया जाता है।
Q45. शेषवत अनुमान किस आधार पर किया जाता है?
B) कारण से प्रभाव
C) सामान्य सत्य से विशेष
D) श्रुति प्रमाण
A) प्रभाव से कारण का अनुमान
व्याख्या: शेषवत अनुमान में प्रभाव को देखकर उसके कारण का अनुमान लगाया जाता है। उदाहरण: नदी का जल बढ़ा है — इसलिए वर्षा हुई होगी। यह वैज्ञानिक दृष्टि से भी मान्य अनुमान प्रक्रिया है।
Q46. सामान्यतोदृष्ट अनुमान किस प्रकार होता है?
A) सामान्य अनुभव पर आधारित
B) विशिष्ट अनुभव
C) अप्रमेय
D) पूर्वानुमान
व्याख्या: सामान्यतोदृष्ट अनुमान तब किया जाता है जब कारण और कार्य को कभी प्रत्यक्ष नहीं देखा गया हो, लेकिन उनके सह-अस्तित्व का सामान्य अनुभव होता है। जैसे समुद्र की लहरों को देखकर चंद्रमा के प्रभाव का अनुमान।
Q47. न्यायसूत्र के रचयिता कौन हैं?
B) कणाद
C) पतंजलि
A) गौतम
D) जैमिनी
व्याख्या: न्याय दर्शन का प्रमुख ग्रंथ "न्यायसूत्र" है, जिसकी रचना महर्षि गौतम ने की थी। यह ग्रंथ न्याय दर्शन की मूल संरचना है और उसमें तर्क, प्रमाण, प्रमेय आदि की विस्तार से व्याख्या की गई है।
Q48. न्याय दर्शन में प्रमाण और प्रमेय का संबंध कैसा है?
B) प्रमेय प्रमाण से बड़ा होता है
A) प्रमाण से प्रमेय जाना जाता है
C) प्रमाण मिथ्या है
D) दोनों एक ही हैं
व्याख्या: न्याय दर्शन के अनुसार प्रमाण वह साधन है जिससे प्रमेय — यानी जानने योग्य वस्तु का ज्ञान होता है। प्रमाण के बिना प्रमेय का ज्ञान असंभव है।
Q49. न्याय में 'दोष' का क्या अर्थ है?
B) शरीर की अशुद्धता
C) इंद्रिय दोष
D) प्रमेय
A) वह जो गलत कर्मों का कारण बने
व्याख्या: न्याय दर्शन में 'दोष' आत्मा के भीतर स्थित वह प्रवृत्ति है जो मोह, राग और द्वेष जैसे कारणों से गलत कर्म की ओर प्रेरित करती है। दोष ही बंधन का कारण बनते हैं।
Q50. न्याय दर्शन में मोक्ष किससे प्राप्त होता है?
A) यथार्थ ज्ञान से
B) तपस्या से
C) त्याग से
D) योग से
व्याख्या: न्याय दर्शन का अंतिम लक्ष्य मोक्ष है, जो यथार्थ ज्ञान (प्रमाणों द्वारा प्राप्त सत्य ज्ञान) से प्राप्त होता है। जब आत्मा सभी दोषों और अज्ञान से मुक्त हो जाती है, तब मोक्ष की अवस्था आती है।
Q51. न्याय दर्शन में ‘इंद्रियार्थ संनिकर्ष’ का क्या महत्व है?
B) मन का काम
C) आत्मा का संपर्क
A) इंद्रिय और वस्तु का संपर्क ही प्रत्यक्ष ज्ञान की शर्त है
D) स्मृति
व्याख्या: इंद्रिय और अर्थ (वस्तु) के बीच संनिकर्ष यानी संपर्क के बिना प्रत्यक्ष ज्ञान असंभव है। यह संनिकर्ष न्याय दर्शन में ज्ञान की पूर्वशर्त मानी जाती है। जैसे – आँख और रंग के बीच संनिकर्ष होने पर ही रंग का ज्ञान संभव है।
Q52. न्याय में 'ज्ञान' की स्वभाविक प्रवृत्ति क्या मानी गई है?
A) आत्मा में उत्पन्न होने वाला विशेष गुण
B) मन में उठने वाला विचार
C) इंद्रिय में स्थित लक्षण
D) भ्रम
व्याख्या: न्याय में ज्ञान आत्मा में उत्पन्न होने वाला विशेष गुण है। आत्मा ही ज्ञान का अधिष्ठान है, और मन, इंद्रिय, अर्थ, आदि इसके सहायक हैं। ज्ञान ही यथार्थ और अयथार्थ को प्रकट करता है।
Q53. ‘अभाव’ को न्याय दर्शन में किस रूप में स्वीकार किया गया है?
B) केवल कल्पना
C) प्रमाणिक नहीं
D) माया
A) एक स्वतंत्र सत्ता (पदार्थ)
व्याख्या: न्याय दर्शन ‘अभाव’ को भी एक स्वतंत्र सत्ता मानता है। यह ‘सात पदार्थों’ में से एक नहीं है, परंतु *अष्टम* सत्ता के रूप में इसे स्वीकार किया गया है। जैसे – ‘घड़े का अभाव’ भी एक अनुभव है, इसलिए वह भी जानने योग्य है।
Q54. 'प्रागभाव' किस अभाव का उदाहरण है?
B) नाश के बाद की स्थिति
A) उत्पत्ति से पहले की स्थिति
C) विरोधाभाव
D) सामान्य अभाव
व्याख्या: ‘प्रागभाव’ वह अभाव है जो किसी वस्तु की उत्पत्ति से पूर्व होता है। जैसे – घड़ा बनने से पहले उसका न होना। यह केवल एक बार ही होता है और कार्य की उत्पत्ति के साथ समाप्त हो जाता है।
Q55. 'प्रध्वंसाभाव' का तात्पर्य क्या है?
B) उत्पत्ति से पहले की स्थिति
A) वस्तु के विनष्ट हो जाने के बाद की स्थिति
C) विरोध का अभाव
D) भ्रम का प्रमाण
व्याख्या: ‘प्रध्वंसाभाव’ वह स्थिति है जब कोई वस्तु नष्ट हो जाती है और फिर कभी नहीं आती। जैसे – मिट्टी का घड़ा टूटने के बाद उसका अभाव। यह नाश के बाद होने वाला अभाव है।
Q56. 'समवाय संबंध' किन तत्वों के बीच होता है?
B) आत्मा और शरीर
C) मन और इंद्रिय
D) मन और आत्मा
A) अविभाज्य रूप से जुड़े तत्वों के बीच
व्याख्या: ‘समवाय’ वह स्थायी और अविभाज्य संबंध है, जो दो तत्वों के बीच होता है जैसे – धागे और कपड़े के बीच। द्रव्य और गुण, द्रव्य और कर्म, और अंग-अंगी के संबंधों में समवाय होता है।
Q57. न्याय दर्शन में 'गुण' की सबसे बड़ी विशेषता क्या मानी गई है?
A) वह द्रव्य में होता है लेकिन स्वतंत्र रूप से कार्य नहीं करता
B) वह अकेले कार्य करता है
C) वह शरीर में स्थित होता है
D) वह कारण बनता है
व्याख्या: गुण वह विशेषता है जो द्रव्य में होती है, परंतु स्वयं क्रियाशील नहीं होती। जैसे – रंग, गंध, संख्या आदि। गुण हमेशा किसी द्रव्य के साथ जुड़े रहते हैं और उसका परिचय देते हैं।
Q58. न्याय दर्शन में कौन-सा तत्व ‘कार्य’ कहलाता है?
B) वह जो सदा रहता हो
C) ईश्वर द्वारा निर्मित हो
A) वह जो कारणों से उत्पन्न हो
D) ज्ञान हो
व्याख्या: कार्य वह है जो कारणों (समवाय, असमवाय, निमित्त) के सहयोग से उत्पन्न होता है। जैसे – कपड़ा, जो धागे (समवाय कारण) और बुनकर (निमित्त कारण) से बनता है।
Q59. न्याय दर्शन में प्रमाण की सीमा किससे तय होती है?
B) केवल प्रत्यक्ष तक
A) यथार्थ ज्ञान की प्राप्ति तक
C) केवल अनुमान तक
D) आत्मा के दर्शन तक
व्याख्या: प्रमाणों का उद्देश्य है यथार्थ ज्ञान प्राप्त करना। इसलिए प्रमाण की सीमा वहीं तक है जहाँ तक वह किसी वस्तु का सत्य ज्ञान दे सके। अन्यथा वह अज्ञान या भ्रम की स्थिति मानी जाती है।
Q60. न्याय दर्शन में मोक्ष की परिभाषा क्या दी गई है?
A) दुखों की पूर्ण निवृत्ति
B) शरीर का त्याग
C) आत्मा का लय
D) ध्यान की अवस्था
व्याख्या: न्याय में मोक्ष का अर्थ है – आत्मा की ऐसी अवस्था जिसमें न जन्म होता है, न मृत्यु, और न ही कोई दुःख या कष्ट। यह दुःखों की *पूर्ण निवृत्ति* की अवस्था है, जिसे यथार्थ ज्ञान से प्राप्त किया जा सकता है।
Q61. न्याय दर्शन में 'आत्मा' का प्रमुख लक्षण क्या है?
B) शरीर
C) मन
D) शब्द
A) ज्ञान
व्याख्या: न्याय दर्शन के अनुसार आत्मा का प्रमुख गुण है 'ज्ञान'। आत्मा ही जानने, इच्छा करने, प्रयास करने और सुख-दुख अनुभव करने वाली सत्ता है। ज्ञान आत्मा का धर्म है।
Q62. न्याय दर्शन के अनुसार 'प्रयत्न' किसका गुण है?
B) मन
C) शरीर
A) आत्मा
D) इंद्रिय
व्याख्या: प्रयत्न यानी किसी कर्म को करने की चेष्टा, आत्मा का गुण माना गया है। आत्मा की इच्छाशक्ति और प्रयास मिलकर ही क्रिया संभव करते हैं।
Q63. 'कर्म' का प्रमुख लक्षण न्याय दर्शन में क्या है?
A) गति
B) इच्छा
C) ज्ञान
D) इंद्रिय
व्याख्या: न्याय दर्शन में ‘कर्म’ का अर्थ है गति या क्रिया। यह द्रव्य का गुण है और पाँच प्रकार की गतियाँ मानी गई हैं — उत्क्षेपण (ऊपर फेंकना), अवक्षेपण (नीचे गिरना), आकुञ्चन (सिकुड़ना), प्रसारण (फैलना), और गमन (चलना)।
Q64. न्याय दर्शन में ईश्वर को किस रूप में स्वीकार किया गया है?
B) केवल ध्यान का विषय
C) वेदों का निर्माता
D) मिथ्या सत्ता
A) सृष्टि का कारण और नियंता
व्याख्या: न्याय दर्शन में ईश्वर को सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान और सृष्टि का निमित्त कारण माना गया है। वह कर्मों का फल देने वाला और सृष्टि का नियंत्रक है, लेकिन वह समवाय कारण नहीं है।
Q65. न्याय दर्शन के अनुसार दुख का मूल कारण क्या है?
B) इंद्रिय सुख
A) अज्ञान
C) शरीर
D) ईश्वर की इच्छा
व्याख्या: न्याय दर्शन में दुखों की जड़ अज्ञान (अविद्या) को माना गया है। अज्ञान के कारण हम दोषों (राग, द्वेष) से ग्रसित होकर गलत कर्म करते हैं, जिससे पुनर्जन्म और दुख उत्पन्न होते हैं।
Q66. न्याय में मोक्ष प्राप्ति के लिए किस साधन को सर्वोपरि माना गया है?
B) पूजा
C) ध्यान
A) यथार्थ ज्ञान
D) त्याग
व्याख्या: मोक्ष प्राप्ति के लिए न्याय दर्शन में यथार्थ ज्ञान (सच्चे ज्ञान) को अनिवार्य माना गया है। यह ज्ञान प्रमाणों के माध्यम से प्राप्त होता है और आत्मा को अज्ञान से मुक्त करता है।
Q67. न्याय दर्शन में 'शरीर' का उपयोग किस लिए होता है?
A) आत्मा के अनुभव के लिए एक उपकरण
B) ज्ञान का कारण
C) मोक्ष का साधन
D) बाधा
व्याख्या: न्याय दर्शन में शरीर को आत्मा के अनुभवों के लिए एक उपकरण माना गया है। शरीर के माध्यम से आत्मा इंद्रियों और मन के सहारे ज्ञान और कर्म करती है।
Q68. न्याय में 'मन' का कार्य क्या है?
B) ज्ञान उत्पन्न करना
C) इच्छाओं का कारण
D) प्रमेय
A) आत्मा और इंद्रिय के बीच सेतु बनाना
व्याख्या: न्याय दर्शन में मन सूक्ष्म और एकदेशी माना गया है, और इसका कार्य आत्मा और इंद्रियों के बीच संपर्क स्थापित करना है। मन के बिना एक समय में एक इंद्रिय कार्य नहीं कर सकती।
Q69. न्याय दर्शन में 'पदार्थ' कितने माने गए हैं?
B) चार
A) सात
C) पाँच
D) आठ
व्याख्या: न्याय दर्शन में सात पदार्थ माने गए हैं — द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय और अभाव। इनसे समस्त जगत का निर्माण और ज्ञान संभव होता है।
Q70. 'विशेष' (विशेषता) का तात्पर्य न्याय दर्शन में क्या है?
A) प्रत्येक शाश्वत वस्तु की पहचान कराने वाला तत्व
B) सामान्य ज्ञान
C) कार्य का परिणाम
D) समय
व्याख्या: 'विशेष' न्याय दर्शन में वह तत्व है जो प्रत्येक नित्य वस्तु को अन्य से अलग करता है। जैसे आत्मा को अन्य आत्माओं से अलग करने वाली ‘आत्मिक विशेषता’। यह अविनाशी, शाश्वत और अद्वितीय होती है।
Q71. न्याय दर्शन में ‘प्रमेय’ का अर्थ क्या है?
B) प्रमाण का साधन
C) अनुभव का विषय
A) जानने योग्य वस्तुएँ
D) मन का विषय
व्याख्या: ‘प्रमेय’ उन वस्तुओं को कहते हैं जिन्हें प्रमाणों के माध्यम से जाना जा सकता है। न्याय दर्शन में 12 प्रमेय बताए गए हैं, जैसे आत्मा, शरीर, इंद्रिय, मन, दुःख, मोक्ष आदि।
Q72. प्रमेयों को जानने का प्रमुख साधन क्या है?
A) प्रमाण
B) स्मृति
C) ईश्वर
D) अनुभूति
व्याख्या: न्याय में प्रमेयों का ज्ञान प्रमाण के माध्यम से होता है। चार प्रमाण माने गए हैं: प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, और शब्द। इनके बिना प्रमेयों का यथार्थ ज्ञान असंभव है।
Q73. न्याय दर्शन के अनुसार 'श्रवण, मनन और निदिध्यासन' का उद्देश्य क्या है?
B) ईश्वर की आराधना
C) वेद पठन
A) यथार्थ ज्ञान की प्राप्ति
D) मोक्ष के बाद की स्थिति
व्याख्या: श्रवण (सुनना), मनन (चिंतन करना), और निदिध्यासन (गहन विचार) – इन तीनों का उद्देश्य प्रमेयों को गहराई से समझकर यथार्थ ज्ञान प्राप्त करना है, जिससे अज्ञान का नाश होता है और मोक्ष संभव होता है।
Q74. न्याय दर्शन में 'कर्तृत्व' किसे प्राप्त होता है?
B) मन को
C) इंद्रियों को
A) आत्मा को
D) शरीर को
व्याख्या: न्याय दर्शन के अनुसार आत्मा ही 'कर्तृत्व' (कर्म करने की क्षमता) और 'भोक्तृत्व' (फल भोगने की योग्यता) की अधिकारी होती है। मन, इंद्रिय और शरीर केवल उपकरण हैं।
Q75. न्याय में 'श्रुति' का महत्व किस संदर्भ में है?
B) मिथ्या ज्ञान
C) लोक व्यवहार
D) कर्मकांड
A) प्रमाण रूप में
व्याख्या: 'श्रुति' यानी वेदों को न्याय दर्शन में प्रमाण (शब्द प्रमाण) के रूप में मान्यता प्राप्त है। विशेषतः जिन विषयों का ज्ञान प्रत्यक्ष या अनुमान से नहीं होता, वहाँ श्रुति का सहारा लिया जाता है।
Q76. न्याय दर्शन के अनुसार सृष्टि की उत्पत्ति कैसे होती है?
B) केवल ईश्वर की इच्छा से
A) जीवों के कर्म और ईश्वर की इच्छा से
C) केवल कर्म से
D) प्रकृति से
व्याख्या: न्याय के अनुसार सृष्टि की उत्पत्ति जीवों के पूर्व कर्म और ईश्वर के नियमन से होती है। ईश्वर केवल निमित्त कारण है, जबकि कर्म के अनुसार जीवों की स्थिति निर्धारित होती है।
Q77. न्याय दर्शन के अनुसार ज्ञान का मुख्य उद्देश्य क्या है?
B) सुख की प्राप्ति
C) धर्म पालन
D) दर्शन शास्त्र का अध्ययन
A) दुखों की निवृत्ति
व्याख्या: न्याय दर्शन में ज्ञान को दुखों की निवृत्ति का साधन माना गया है। जैसे-जैसे यथार्थ ज्ञान बढ़ता है, अज्ञान, मोह, राग-द्वेष समाप्त होते हैं, और आत्मा मोक्ष की ओर बढ़ती है।
Q78. न्याय दर्शन में 'प्रमाण' की कितनी अवस्थाएँ बताई गई हैं?
A) दो – उत्पत्ति और फल
B) तीन – कारण, लक्षण, परिणाम
C) चार – प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द
D) एक – अनुभव
व्याख्या: न्याय में प्रमाण की दो अवस्थाएँ मानी जाती हैं: (1) प्रमाण उत्पत्ति (Knowledge arises) और (2) फल (ज्ञान उत्पन्न होता है)। प्रमाण का उद्देश्य प्रमेय के विषय में यथार्थ ज्ञान देना है।
Q79. न्याय दर्शन में 'भोक्तृत्व' किसे कहा गया है?
B) शरीर का काम
C) इंद्रिय का अनुभव
A) आत्मा के फल भोगने की योग्यता
D) कर्म का फल
व्याख्या: आत्मा ही भोक्ता (भोग करने वाली) होती है। वह सुख-दुख, पुण्य-पाप के फल को भोगती है। मन, इंद्रिय और शरीर केवल माध्यम होते हैं।
Q80. न्याय दर्शन में 'अविद्या' का परिणाम क्या है?
A) पुनर्जन्म और दुख
B) सुख
C) मोक्ष
D) ज्ञान
व्याख्या: न्याय में ‘अविद्या’ ही सारे दुखों की जड़ मानी गई है। इससे दोष उत्पन्न होते हैं, जिससे पाप कर्म होते हैं, और पुनर्जन्म और दुखों की श्रृंखला चलती रहती है।
Q81. न्याय दर्शन में 'शब्द प्रमाण' किसे कहा गया है?
B) केवल वेद
C) अनुभव
D) अनुमान
A) विश्वास योग्य व्यक्ति के वचन से प्राप्त ज्ञान
व्याख्या: 'शब्द प्रमाण' का अर्थ है – ऐसे योग्य वक्ता के कथन से प्राप्त ज्ञान, जो त्रिकालदर्शी और सत्यवादी हो। वेद भी इसी श्रेणी में आते हैं। यह प्रमाण उन विषयों में उपयोगी है जो प्रत्यक्ष या अनुमान से नहीं जाने जा सकते।
Q82. न्याय दर्शन में 'पद' और 'वाक्य' का संबंध क्या है?
B) वाक्य से पद निकलता है
C) दोनों असंबंधित हैं
A) पदों के संयोग से वाक्य बनता है
D) पद का कोई महत्व नहीं
व्याख्या: न्याय में 'शब्द' दो रूपों में माने गए हैं – पद (word) और वाक्य (sentence)। पदों के क्रमबद्ध और युक्तियुक्त प्रयोग से वाक्य का अर्थ निकलता है। शब्द प्रमाण का सही प्रयोग तभी संभव होता है जब पद और वाक्य में सामंजस्य हो।
Q83. न्याय दर्शन में 'स्मृति' की सत्यता पर क्या दृष्टिकोण है?
A) यह प्रमाण नहीं है
B) यह प्रमुख प्रमाण है
C) वेद के समान है
D) अनुमेय है
व्याख्या: न्याय दर्शन में स्मृति को प्रमाण नहीं माना गया है क्योंकि यह पूर्व अनुभव पर आधारित होती है और नवीन यथार्थ ज्ञान नहीं देती। प्रमाण केवल वही होता है जो वर्तमान में यथार्थ ज्ञान उत्पन्न करे।
Q84. ‘हेत्वाभास’ का तात्पर्य क्या है?
B) यथार्थ प्रमाण
A) झूठा या मिथ्या कारण
C) उपमान
D) अनुमान का फल
व्याख्या: हेत्वाभास का अर्थ है – ऐसा कारण जो देखने में तो सही प्रतीत होता है, लेकिन वास्तव में प्रमाण देने में असमर्थ होता है। न्याय दर्शन में पाँच प्रकार के हेत्वाभास बताए गए हैं, जैसे: सत्प्रतिपक्ष, विरोधी, असिद्ध, बाधित, अनन्वित।
Q85. न्याय दर्शन में प्रमाण और अप्रमाण में मुख्य अंतर क्या है?
A) प्रमाण यथार्थ ज्ञान देता है, अप्रमाण भ्रम उत्पन्न करता है
B) दोनों समान हैं
C) अप्रमाण उपयोगी है
D) प्रमाण से केवल स्मृति मिलती है
व्याख्या: न्याय दर्शन के अनुसार केवल वही ज्ञान प्रमाण है जो यथार्थ हो — अर्थात वस्तु को जैसी है वैसा प्रकट करे। अन्यथा वह अप्रमाण है और भ्रम, संदेह या अज्ञान का कारण बनता है।
Q86. 'अनुमान' के लिए न्यूनतम कितने अंग आवश्यक होते हैं?
B) दो
C) चार
A) तीन
D) पाँच
व्याख्या: न्याय में अनुमान के लिए तीन आवश्यक अंग माने गए हैं: (1) प्रतिज्ञा (hypothesis), (2) हेतु (reason), और (3) दृष्टान्त (example)। ये तीनों मिलकर अनुमान को प्रमाणिक बनाते हैं।
Q87. 'धूमात् वह्निः' — इस न्याय का प्रकार क्या है?
A) सामान्य अनुमान
B) उपमान
C) शब्द प्रमाण
D) विशेष अनुमान
व्याख्या: 'जहाँ धुआँ है वहाँ अग्नि है' — यह अनुमान का उदाहरण है, जिसमें धूम (धुआँ) को देखकर अग्नि के अस्तित्व का अनुमान लगाया जाता है। यह सामान्य अनुमान (अन्वय) कहलाता है।
Q88. न्याय में 'धर्म' और 'अधर्म' किसका कारण माने गए हैं?
B) शरीर का
C) ज्ञान का
D) ईश्वर के क्रोध का
A) पुनर्जन्म और सुख-दुख का
व्याख्या: धर्म और अधर्म को अदृश्य (अदृष्ट) कारण माना गया है, जो जीव के कर्मों के अनुसार पुनर्जन्म, सुख-दुख और जीवन की दशा को निर्धारित करते हैं।
Q89. न्याय दर्शन में 'मोक्ष' किस स्थिति को कहा गया है?
B) स्वर्ग की प्राप्ति
A) दुखों की पूर्ण निवृत्ति और जन्म-मरण का अंत
C) ब्रह्म से एकत्व
D) ध्यान की अवस्था
व्याख्या: न्याय दर्शन के अनुसार मोक्ष का अर्थ है — सभी दुखों से मुक्ति और पुनर्जन्म की श्रृंखला का अंत। यह अवस्था आत्मा की स्वतंत्रता और शुद्धता की स्थिति है, जिसमें ज्ञान बना रहता है लेकिन अनुभव नहीं होता।
Q90. न्याय दर्शन में प्रमेयों की संख्या कितनी मानी गई है?
B) सात (7)
C) पाँच (5)
A) बारह (12)
D) आठ (8)
व्याख्या: न्याय दर्शन में कुल 12 प्रमेय बताए गए हैं — आत्मा, शरीर, इंद्रिय, अर्थ, बुद्धि, मन, प्रयास, दोष, जन्म, फल, दुःख और मोक्ष। ये सभी जानने योग्य विषय हैं, जिन्हें प्रमाणों से जाना जाता है।
Q91. न्याय दर्शन में 'यथार्थ ज्ञान' की परिभाषा क्या है?
A) ऐसा ज्ञान जो वस्तु को जैसी है वैसा प्रकट करे
B) स्मृति पर आधारित ज्ञान
C) तर्क से उत्पन्न संदेह
D) मनोवांछित ज्ञान
व्याख्या: यथार्थ ज्ञान का अर्थ है — ऐसा ज्ञान जो वस्तु की वास्तविकता के अनुरूप हो। यदि ज्ञान में और वस्तु में संगति हो तो वह प्रमाण माना जाता है, अन्यथा अप्रमाण।
Q92. न्याय दर्शन में 'विपर्यय' किसे कहा गया है?
B) यथार्थ ज्ञान
C) अनुमान
D) उपमान
A) मिथ्या ज्ञान
व्याख्या: विपर्यय वह ज्ञान है जो वस्तु को उसके वास्तविक स्वरूप में नहीं दिखाता — जैसे रस्सी को साँप समझना। यह अप्रमाण है और अज्ञान का उदाहरण है।
Q93. न्याय दर्शन में 'संशय' (संदेह) की उत्पत्ति कैसे होती है?
B) केवल स्मृति से
A) समान गुणों और भिन्न रूपों के कारण
C) शब्द प्रमाण से
D) अनुमान से
व्याख्या: जब किसी वस्तु में दो या अधिक वस्तुओं के समान गुण विद्यमान हों, लेकिन पहचान स्पष्ट न हो, तब संशय उत्पन्न होता है। यह यथार्थ ज्ञान नहीं है, इसलिए अप्रमाण है।
Q94. न्याय दर्शन के अनुसार 'समवाय' क्या है?
B) आकस्मिक संबंध
C) कालिक संबंध
A) अपरिहार्य और नित्य संबंध
D) विशेषता
व्याख्या: समवाय वह संबंध है जो दो अविभाज्य वस्तुओं के बीच होता है, जैसे – गुण और द्रव्य, या कर्म और द्रव्य। यह संबंध नित्य, अपरिहार्य और स्थायी होता है।
Q95. न्याय दर्शन में 'विशेष' किसका द्योतक है?
A) नित्य द्रव्यों की पहचान कराने वाला तत्व
B) गुणों का योग
C) कोई क्रिया
D) काल विशेष
व्याख्या: विशेष उस अव्यक्त तत्व को कहते हैं जो एक आत्मा को दूसरी आत्मा से अलग करता है। यह नित्य, अविभाज्य और केवल नित्य द्रव्यों में पाया जाता है।
Q96. न्याय दर्शन में 'प्रमाण' की परस्पर सहायता का क्या नियम है?
B) प्रमाण अकेले होते हैं
C) केवल प्रत्यक्ष ही मान्य है
A) एक प्रमाण दूसरे की पुष्टि कर सकता है
D) प्रमाण विरोध करते हैं
व्याख्या: न्याय दर्शन में सभी प्रमाण स्वतंत्र होते हुए भी एक-दूसरे की पुष्टि कर सकते हैं। जैसे किसी वस्तु को पहले प्रत्यक्ष से देखा जाए और फिर अनुमान से पुष्टि की जाए।
Q97. न्याय दर्शन में किसे 'दोष' कहा गया है?
A) राग, द्वेष, मोह
B) शरीर
C) मन
D) ज्ञान
व्याख्या: राग (आसक्ति), द्वेष (विरोध) और मोह (अज्ञान) को 'दोष' कहा गया है। ये आत्मा में स्थित होकर कर्म का कारण बनते हैं और पुनर्जन्म और दुख उत्पन्न करते हैं।
Q98. न्याय दर्शन में आत्मा के कितने प्रकार माने गए हैं?
B) एक
C) अनेक, लेकिन परिभाषित नहीं
A) दो – जीवात्मा और परमात्मा
D) तीन
व्याख्या: न्याय दर्शन में आत्मा दो प्रकार की मानी गई है — (1) जीवात्मा, जो बंधन और मोक्ष के चक्र में है, और (2) परमात्मा, जो सर्वज्ञ, सृष्टि का नियंता और मोक्षदाता है।
Q99. न्याय दर्शन में ज्ञान की उत्पत्ति का माध्यम क्या है?
A) आत्मा, मन, इंद्रिय और विषय का संपर्क
B) केवल आत्मा
C) केवल मन
D) ईश्वर
व्याख्या: ज्ञान तभी उत्पन्न होता है जब आत्मा, मन, इंद्रिय और बाह्य विषय के बीच उचित संबंध स्थापित हो। यह व्यवस्था न्याय दर्शन का प्रमुख तात्त्विक सिद्धांत है।
Q100. न्याय दर्शन का अंतिम उद्देश्य क्या है?
B) सुख की प्राप्ति
C) यश और प्रसिद्धि
D) ज्ञान संग्रह
A) मोक्ष — दुखों से पूर्ण मुक्ति
व्याख्या: न्याय दर्शन का चरम लक्ष्य है — मोक्ष। मोक्ष का अर्थ है जन्म-मरण, सुख-दुख, और अज्ञान के चक्र से मुक्ति। यह केवल यथार्थ ज्ञान से ही संभव होता है।
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