AGTA 2025 PYQ
सेट 1: रेशम कीट, वानिकी और प्रसार शिक्षा
- प्रश्न: कौन सी रेशम प्रजाति शहतूत रेशम का उत्पादन करती है और भारत में वाणिज्यिक स्तर पर पाली जाती है?
- उत्तर: बॉम्बिक्स मोराई (Bombyx mori)
भारत में रेशम का उत्पादन मुख्य रूप से चार प्रकार के रेशम कीटों से होता है। जैसा कि आपने सही बताया, बॉम्बिक्स मोराई (Bombyx mori) सबसे प्रमुख है, लेकिन इसके अलावा भी कुछ महत्वपूर्ण प्रजातियां हैं जो अलग-अलग पौधों पर निर्भर करती हैं।
यहाँ रेशम कीटों और उनके मुख्य खाद्य पौधों का विवरण दिया गया है:
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रेशम का प्रकार |
रेशम कीट का वैज्ञानिक नाम |
मुख्य खाद्य पौधा (Host Plant) |
|---|---|---|
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शहतूत रेशम (Mulberry) |
Bombyx mori |
शहतूत (Morus alba) |
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तसर रेशम (Tasar) |
Antheraea paphia / mylitta |
अर्जुन और असन (Asan & Arjun) |
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ईरी रेशम (Eri) |
Samia ricini |
अरंडी (Castor) |
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मूगा रेशम (Muga) |
Antheraea assamensis |
सोम और सोआलू (Som & Soalu) |
इन प्रजातियों की कुछ खास बातें:
- शहतूत रेशम (Mulberry): यह भारत के कुल रेशम उत्पादन का लगभग 70% से अधिक हिस्सा है। इसे पूरी तरह से घरों के भीतर पाला जाता है।
- तसर रेशम (Tasar): यह जंगली रेशम है। भारत में 'तांबा' जैसे रंग वाले तसर रेशम की भारी मांग रहती है।
- ईरी रेशम (Eri): इसे "अहिंसक रेशम" (Peace Silk) भी कहा जाता है क्योंकि इसके उत्पादन में प्यूपा को मारा नहीं जाता। यह रेशम बहुत नरम और गर्म होता है।
- मूगा रेशम (Muga): यह दुनिया में सिर्फ भारत (असम) में पाया जाता है। इसकी खासियत इसका प्राकृतिक सुनहरा पीला रंग और चमक है।
1. शहतूत रेशम (Mulberry Silk) - Bombyx mori
यह सबसे आम और व्यावसायिक रूप से सफल रेशम है।
- कीट की प्रकृति: यह पूरी तरह से 'पालतू' (Domesticated) कीट है। यह अब जंगलों में जीवित नहीं रह सकता।
- भोजन: यह केवल शहतूत (Mulberry) की पत्तियों को खाता है।
- विशेषता: इसका धागा सफेद या मलाईदार (Creamy) रंग का, बहुत पतला, लंबा और अत्यधिक चमकदार होता है।
- उत्पादन क्षेत्र: कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु इसके मुख्य केंद्र हैं।
2. तसर रेशम (Tasar Silk) - Antheraea mylitta
इसे 'वन्य रेशम' भी कहा जाता है क्योंकि यह खुले जंगलों में पाला जाता है।
- कीट की प्रकृति: यह जंगली स्वभाव का होता है। इसके कोकून (Coconuts) काफी सख्त और बड़े होते हैं।
- भोजन: यह मुख्य रूप से अर्जुन और असन के पेड़ों पर रहता है।
- विशेषता: इसका रंग प्राकृतिक रूप से भूरा या तांबे जैसा (Copper color) होता है। इसकी बनावट थोड़ी खुरदरी होती है और यह बहुत मजबूत होता है।
- उत्पादन क्षेत्र: झारखंड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा और महाराष्ट्र।
3. ईरी रेशम (Eri Silk) - Samia ricini
इसे "शाकाहारी" या "अहिंसक" रेशम भी कहते हैं।
- कीट की प्रकृति: यह भी पालतू कीट है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि रेशम निकालने के लिए कीट को कोकून के अंदर मारना नहीं पड़ता; कीट के बाहर निकलने के बाद खाली कोकून का उपयोग किया जाता है।
- भोजन: यह अरंडी (Castor) के पत्तों पर फलता-फूलता है।
- विशेषता: इसका धागा ऊन जैसा गर्म और मुलायम होता है। यह शहतूत रेशम की तरह चमकदार नहीं होता, लेकिन बहुत टिकाऊ होता है।
- उत्पादन क्षेत्र: मुख्य रूप से असम और उत्तर-पूर्वी राज्य।
एरी रेशम (Eri Silk) पूर्वोत्तर भारत, मुख्य रूप से असम और मेघालय का एक टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल (eco-friendly) रेशम है, जिसे रेशम के कीड़ों को मारे बिना निकाला जाता है, इसलिए इसे 'अहिंसा सिल्क' भी कहते हैं। यह अरंडी (Castor) के पत्तों पर पलने वाले सामिया रिसिनी कीड़ों से बनता है। एरी सिल्क अपनी मजबूती, कोमलता और ऊनी बनावट के लिए प्रसिद्ध है, जो सर्दियों में गर्म और गर्मियों में ठंडा रहता है
एरी रेशम की प्रमुख विशेषताएं:
अहिंसा सिल्क: अन्य रेशम के विपरीत, एरी में कीड़ा कोकून से बाहर निकलने के बाद ही रेशम प्राप्त किया जाता है, जिससे कीड़े जीवित रहते हैं।
प्राकृतिक रंग: इसका प्राकृतिक रंग हल्का क्रीम या ऑफ-वाइट (off-white) होता है।
आरामदायक और टिकाऊ: यह बहुत नरम, गर्म और त्वचा के अनुकूल होता है, इसलिए इसे "वस्त्रों की रानी" भी कहा जाता है।
गुणवत्ता: यह रेशम की चमक के साथ ऊन की गर्माहट और कपास की कोमलता प्रदान करता है।
4. मूगा रेशम (Muga Silk) - Antheraea assamensis
यह दुनिया का सबसे दुर्लभ और कीमती रेशम है, जिसे भारत का 'जीआई टैग' (GI Tag) प्राप्त है।
- कीट की प्रकृति: यह केवल असम की जलवायु में ही जीवित रह सकता है।
- भोजन: यह सोम और सोआलू के पेड़ों की पत्तियां खाता है।
- विशेषता: इसका रंग प्राकृतिक सुनहरा (Golden Yellow) होता है। मजे की बात यह है कि इसे जितना अधिक धोया जाता है, इसकी चमक उतनी ही बढ़ती जाती है।
- उत्पादन क्षेत्र: विशेष रूप से असम।
मूगा रेशम (Muga Silk) असम का एक दुर्लभ और सुनहरा-पीला प्राकृतिक रेशम है, जो अपनी अत्यधिक मजबूती, चमक और टिकाऊपन के लिए विश्व प्रसिद्ध है। Antheraea assamensis नामक कीट (सोम/सोआलू के पत्ते खाकर) से निर्मित यह रेशम, असमिया संस्कृति का गौरव है, जिसे पहले केवल राजघराने के लोग पहनते थे।
मूगा रेशम की मुख्य विशेषताएं:
संक्षेप में तुलना (Quick Comparison)
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विशेषता |
शहतूत |
तसर |
ईरी |
मूगा |
|---|---|---|---|---|
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रंग |
सफेद/मलाईदार |
भूरा/तांबा |
सफेद/ईंट जैसा |
सुनहरा पीला |
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चमक |
बहुत अधिक |
मध्यम |
कम (मैट फिनिश) |
अत्यधिक (स्थायी) |
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उपयोग |
साड़ियाँ, सूट |
पर्दे, जैकेट |
शॉल, चादर |
शाही पोशाक, साड़ियाँ |
- प्रश्न: उत्तर प्रदेश सरकार ने खेती को वैश्विक कार्बन क्रेडिट बाजार से जोड़ने के लिए कौन सी पहल शुरू की है?
- उत्तर: कृषि वानिकी कार्बन वित्त परियोजना (Agroforestry Carbon Finance Project)
उत्तर प्रदेश सरकार की 'कृषि वानिकी कार्बन वित्त परियोजना' (Agroforestry Carbon Finance Project) एक क्रांतिकारी पहल है, जिसका उद्देश्य किसानों की आय बढ़ाना और पर्यावरण की रक्षा करना है।
इस परियोजना को आसान भाषा में नीचे दिए गए बिंदुओं से समझा जा सकता है:
1. कार्बन क्रेडिट (Carbon Credit) क्या है?
जब कोई किसान अपने खेत की मेड़ पर या खाली जमीन पर पेड़ लगाता है, तो वे पेड़ हवा से कार्बन डाइऑक्साइड (CO_2) सोखते हैं।
- हवा से 1 मीट्रिक टन CO_2 कम करने पर किसान को 1 कार्बन क्रेडिट मिलता है।
- इस क्रेडिट को अंतरराष्ट्रीय बाजार में उन कंपनियों को बेचा जाता है जो प्रदूषण फैलाती हैं और उसे कम करना चाहती हैं।
2. यह योजना कैसे काम करती है?
- सहयोग: यूपी सरकार ने इसे TERI (The Energy and Resources Institute) और VNV Advisory Services के साथ मिलकर शुरू किया है।
- पंजीकरण: किसान को वन विभाग के पास पंजीकरण कराना होता है और कम से कम 25 पेड़ लगाने होते हैं।
- सत्यापन: विशेषज्ञ (जैसे TERI की टीमें) आकर देखते हैं कि पेड़ कितने बढ़े हैं और उन्होंने कितना कार्बन सोखा है। इसके बाद ही क्रेडिट जारी किए जाते हैं।
3. किसानों को क्या लाभ होगा?
- अतिरिक्त आय: किसान अपनी मुख्य फसल के साथ-साथ पेड़ों से भी पैसे कमाएंगे। अनुमान है कि एक कार्बन क्रेडिट की कीमत लगभग 6 डॉलर (करीब ₹500) होती है।
- अग्रिम भुगतान (Advance Payment): उत्तर प्रदेश देश का पहला राज्य है जिसने किसानों को उनके द्वारा लगाए गए पेड़ों के लिए अग्रिम भुगतान देना शुरू किया है, ताकि वे पेड़ों की देखभाल कर सकें।
- लंबे समय तक लाभ: एक बार पेड़ लगाने पर किसान अगले 30 वर्षों तक कार्बन क्रेडिट से कमाई कर सकता है।
परियोजना के मुख्य लक्ष्य:
- हरियाली बढ़ाना: यूपी सरकार का लक्ष्य राज्य के हरित क्षेत्र को 9.23% से बढ़ाकर 15% (2026-27 तक) करना है।
- पौधों की प्रजातियां: इसमें किसान पॉपुलर, मेलिया डुबिया (सफेद सिरस), सेमल, यूकेलिप्टस और नीम जैसे तेजी से बढ़ने वाले पेड़ लगा सकते हैं।
- आर्थिक प्रभाव: इस परियोजना से राज्य के किसानों को अगले कुछ वर्षों में लगभग 200 करोड़ रुपये से अधिक की अतिरिक्त आय होने की उम्मीद है।
- प्रश्न: 'मैनेज' (MANAGE) के अनुसार, कृषि विस्तार शिक्षा का कौन सा सिद्धांत नहीं है?
- उत्तर: केंद्र योजना का सिद्धांत (बाकी विकल्प: करके सीखना, भागीदारी और रुचि/आवश्यकता का सिद्धांत हैं)।
MANAGE (National Institute of Agricultural Extension Management), जो हैदराबाद में स्थित है, कृषि विस्तार (Agricultural Extension) के लिए भारत की सर्वोच्च संस्था है। इसके अनुसार, विस्तार शिक्षा का मुख्य उद्देश्य किसानों के व्यवहार और कार्यप्रणाली में सकारात्मक परिवर्तन लाना है।
आपने जो उत्तर दिया वह बिल्कुल सही है। 'केंद्र योजना का सिद्धांत' विस्तार शिक्षा का हिस्सा नहीं है क्योंकि विस्तार शिक्षा 'नीचे से ऊपर' (Bottom-up) की ओर काम करती है, न कि केंद्र से थोपी गई योजनाओं पर।
आइए इन सिद्धांतों को विस्तार से समझते हैं:
1. करके सीखना (Principle of Learning by Doing)
यह विस्तार शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ है।
- अर्थ: किसान केवल सुनकर या पढ़कर जल्दी नहीं सीखते, बल्कि जब वे खुद अपने हाथों से नई तकनीक (जैसे- बीज उपचार या ड्रिप इरिगेशन) का प्रयोग करते हैं, तब उन्हें उस पर विश्वास होता है।
- उद्देश्य: कौशल विकास (Skill Development) करना।
2. भागीदारी का सिद्धांत (Principle of Participation)
- अर्थ: विस्तार कार्यक्रम तभी सफल होते हैं जब उसमें स्थानीय लोग सक्रिय रूप से भाग लें।
- तर्क: यदि किसी गांव में कोई योजना बिना ग्रामीणों की राय के लागू की जाती है, तो वे उसे अपना नहीं पाते। जब किसान योजना बनाने से लेकर उसे लागू करने तक साथ होते हैं, तो सफलता की संभावना बढ़ जाती है।
3. रुचि और आवश्यकता का सिद्धांत (Principle of Interest and Need)
- अर्थ: विस्तार कार्य हमेशा किसानों की तत्काल आवश्यकताओं और उनकी रुचि पर आधारित होना चाहिए।
- उदाहरण: यदि किसी क्षेत्र के किसान सूखे से परेशान हैं और आप उन्हें मछली पालन की ट्रेनिंग दे रहे हैं, तो वे रुचि नहीं लेंगे। उन्हें उस समय 'सूखा प्रतिरोधी फसलों' की जानकारी चाहिए।
'केंद्र योजना का सिद्धांत' क्यों गलत है?
कृषि विस्तार शिक्षा विकेंद्रीकृत (Decentralized) होती है।
- स्थानीय अनुकूलन: विस्तार कार्य 'प्रेसिज़न' (सटीकता) पर आधारित होता है। जो योजना दिल्ली या लखनऊ के 'केंद्र' में बैठकर बनाई गई हो, जरूरी नहीं कि वह बुंदेलखंड के किसी छोटे गांव की मिट्टी और जलवायु के लिए सही हो।
- लोकतांत्रिक दृष्टिकोण: इसमें केंद्र की मर्जी नहीं, बल्कि स्थानीय किसानों की समस्याओं का समाधान प्राथमिकता होती है।
विस्तार शिक्षा के कुछ अन्य महत्वपूर्ण सिद्धांत:
- अनुकूलन क्षमता (Adaptability): तकनीक को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार ढालना।
- परिवार का सिद्धांत (Family Principle): केवल किसान को नहीं, बल्कि पूरे कृषि परिवार (महिलाएं और युवा) को शिक्षित करना।
- सांस्कृतिक अंतर (Cultural Difference): स्थानीय रीति-रिवाजों का सम्मान करते हुए बदलाव लाना।
- प्रश्न: PMKSY (सिंचाई योजना) के तहत 'जल संभरण' (Watershed) विकास घटक के लिए कौन सा मंत्रालय उत्तरदायी है?
- उत्तर: ग्रामीण विकास मंत्रालय।
प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) के 'जल संभरण' (Watershed Development) घटक के लिए मुख्य रूप से भारत सरकार का ग्रामीण विकास मंत्रालय (Ministry of Rural Development) उत्तरदायी है। यह घटक इस मंत्रालय के अंतर्गत भूमि संसाधन विभाग (Department of Land Resources - DoLR) द्वारा राज्य सरकारों के माध्यम से लागू किया जाता है।
Pradhan Mantri Krishi Sinchayee Yojana (PMKSY) +2
प्रमुख विवरण:
क्रियान्वयन एजेंसी (State Level): राज्यों में राज्य जलसंभर कोष्ठक एजेंसी (State Level Nodal Agency - SLNA) और जलग्रहण विकास एवं भू-संरक्षण विभाग मुख्य रूप से काम करते हैं।
कार्य का दायरा: वर्षा जल संचयन, मृदा संरक्षण, कंटूर बंडिंग, और ग्रामीण क्षेत्रों में जल संरचनाओं का निर्माण करना।
स्थानीय स्तर: ग्राम पंचायतें और जलसंभर समितियाँ (Watershed Committees) सीधे कार्य कार्यान्वयन में शामिल होती हैं।
वित्तपोषण (Funding): यह केंद्र प्रायोजित योजना है, जो केंद्र (60%) और राज्य (40%) के बीच धन साझा करती है, जबकि पूर्वोत्तर राज्यों के लिए यह 90:10 है।
त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम (AIBP - Accelerated Irrigation Benefits Programme) भारत सरकार द्वारा 1996-97 में शुरू की गई एक प्रमुख योजना है। इसका उद्देश्य बड़ी और मध्यम सिंचाई परियोजनाओं को समय पर पूरा करने के लिए राज्यों को वित्तीय सहायता (ऋण/अनुदान) प्रदान करना है, ताकि कृषि उत्पादकता बढ़ाई जा सके। 2015-16 से यह पीएमकेएसवाई (PMKSY) का हिस्सा है।
India-WRIS
India-WRIS
+2
एआईबीपी (AIBP) के मुख्य बिंदु:
उद्देश्य: रुकी हुई या धीमी गति से चल रही सिंचाई परियोजनाओं को तेजी से पूरा करना।
शुरुआत: 1996-97 में केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय द्वारा।
प्रायोजक: केंद्र सरकार द्वारा राज्यों को केंद्रीय सहायता (अनुदान) प्रदान की जाती है।
वर्तमान स्थिति: 2015-16 से, यह प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) के अंतर्गत एक प्रमुख घटक (AIBP - PMKSY) के रूप में कार्य कर रहा है।
प्राथमिकता: सूखाग्रस्त और आदिवासी क्षेत्रों की परियोजनाओं को विशेष प्राथमिकता दी जाती है।
HKKP का मतलब हर खेत को पानी (Har Khet Ko Pani) है, जो प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) का एक प्रमुख घटक है। इस योजना का उद्देश्य देश में सिंचाई की क्षमता बढ़ाना, जल निकायों का पुनरुद्धार और खेत-खेत तक पानी की सुनिश्चित पहुँच बनाकर कृषि उत्पादकता में सुधार करना है।
pmksy-mowr.nic.in
pmksy-mowr.nic.in
+2
HKKP (हर खेत को पानी) की मुख्य बातें:
उद्देश्य: सिंचाई के तहत खेती योग्य क्षेत्र का विस्तार करना और पानी का कुशलतापूर्वक उपयोग करना।
घटक: इसमें प्रमुख रूप से सतही लघु सिंचाई (SMI), जल निकायों की मरम्मत, नवीनीकरण और जीर्णोद्धार (RRR) शामिल हैं।
लक्ष्य: हर किसान के खेत तक सिंचाई का पानी पहुँचाना, विशेषकर सूक्ष्म सिंचाई के माध्यम से।
pmksy-mowr.nic.in
pmksy-mowr.nic.in
+4
HKKP के अंतर्गत कार्य:
सतही लघु सिंचाई (SMI): छोटी सिंचाई परियोजनाओं का विकास।
जल निकायों की मरम्मत (RRR): तालाबों और झीलों का पुनरुद्धार।
भूजल विकास: भूजल का प्रबंधन और उपयोग।
कमांड क्षेत्र विकास: जल वितरण प्रणाली को सुदृढ़ बनाना।
CGWB
CGWB
+4
यह योजना जल संरक्षण प्रथाओं को बढ़ावा देती है और स्थायी सिंचाई समाधान प्रदान करती है।
- प्रश्न: अनुवांशिकता (Genetics) के जनक कौन हैं?
- उत्तर: ग्रेगर जॉन मेंडल (विकल्प में न होने पर 'इनमें से कोई नहीं')।
- प्रश्न: शून्य ऊर्जा शीत भंडारण (Zero Energy Cool Chamber) किस सिद्धांत पर कार्य करता है?
- उत्तर: वाष्पीकरण द्वारा शीतलन (Cooling by Evaporation)।
- वाष्पीकरण के लिए आवश्यक ऊर्जा (गर्मी) चैंबर के अंदर से ली जाती है, जिससे अंदर का तापमान बाहर की तुलना में 10°C से 15°C तक कम हो जाता है।
- साथ ही, अंदर की सापेक्ष आर्द्रता (Relative Humidity) लगभग 90% बनी रहती है, जिससे फल और सब्जियां सूखती नहीं हैं।
- प्रश्न: बेसिलस थ्यूरोजेनेसिस (Bt) का उपयोग किस कीट को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है?
- उत्तर: कैटरपिलर (Caterpillar)।
आपका उत्तर बिल्कुल सही है! बेसिलस थ्यूरोजेनेसिस (Bacillus thuringiensis), जिसे हम आमतौर पर Bt के नाम से जानते हैं, एक प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला 'मृदा जीवाणु' (Soil Bacterium) है।
इसे विस्तार से समझते हैं कि यह कैटरपिलर और अन्य कीटों पर कैसे वार करता है:
1. यह कैसे काम करता है? (Mode of Action)
Bt जीवाणु अपनी वृद्धि के दौरान विशेष प्रकार के प्रोटीन क्रिस्टल बनाता है, जिन्हें 'क्राई टॉक्सिन' (Cry toxins) कहा जाता है।
- अंतर्ग्रहण (Ingestion): जब एक कैटरपिलर (इल्ली) Bt छिड़के हुए पत्तों को या Bt फसल (जैसे Bt कॉटन) को खाता है, तो यह टॉक्सिन उसके पेट में चला जाता है।
- सक्रियण (Activation): कैटरपिलर के पेट का वातावरण क्षारीय (Alkaline) होता है। इस क्षारीय माध्यम में पहुँचते ही वह क्रिस्टल प्रोटीन सक्रिय (Active) हो जाता है।
- विनाश: यह सक्रिय टॉक्सिन कैटरपिलर की आहार नली (Midgut) की दीवारों में छेद कर देता है। इससे कीट खाना बंद कर देता है और कुछ ही दिनों में उसकी मृत्यु हो जाती है।
2. किन कीटों के खिलाफ प्रभावी है?
Bt मुख्य रूप से तीन समूहों के कीटों को लक्षित करता है:
- लेपिडोप्टेरा (Lepidoptera): इसमें कैटरपिलर, तितली और मोथ के लार्वा आते हैं (जैसे तंबाकू की इल्ली, कपास का बोलवर्म)।
- कोलेप्टेरा (Coleoptera): बीटल्स (Beetles) के खिलाफ।
- डिप्टेरा (Diptera): मच्छर और मक्खियों के लार्वा के खिलाफ।
3. Bt तकनीक के दो मुख्य उपयोग
- Bt कीटनाशक (Biopesticide): इसे पाउडर या तरल के रूप में बाजार से खरीदकर फसलों पर छिड़का जाता है। यह जैविक खेती (Organic Farming) के लिए बहुत लोकप्रिय है।
- Bt फसलें (Genetically Modified Crops): वैज्ञानिकों ने Bt जीवाणु के उस विशिष्ट 'जीन' को निकालकर सीधे पौधे के DNA में डाल दिया है। अब पौधा खुद ही वह टॉक्सिन बनाने लगता है।
- उदाहरण: Bt कपास (Bt Cotton) और Bt बैंगन (Bt Brinjal)।
एक महत्वपूर्ण तथ्य:
Bt मानव स्वास्थ्य या पक्षियों और जानवरों के लिए हानिकारक नहीं है। इसका कारण यह है कि इंसानों और जानवरों के पेट का वातावरण अम्लीय (Acidic) होता है, जहाँ यह टॉक्सिन सक्रिय नहीं हो पाता और पच जाता है।
- प्रश्न: फसलों का सही मिलान: चावल, गन्ना, मूंगफली और जूट।
- उत्तर: चावल (अनाज), गन्ना (नगदी), मूंगफली (तिलहन), जूट (रेशा)।
- प्रश्न: 'गंधी बग' (Gundhi Bug) किस फसल का मुख्य कीट है?
- उत्तर: चावल (धान)।
गंधी बग' (Gundhi Bug) धान की खेती का एक बहुत ही जिद्दी और नुकसानदेह कीट है। इसका वैज्ञानिक नाम लेप्टोकोरिसा वेरिकोर्निस (Leptocorisa varicornis) है।
इसे 'गंधी' इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसके शरीर से एक बहुत ही तीखी और अप्रिय गंध (सड़ी हुई बदबू) निकलती है, जो इसके रक्षा तंत्र का हिस्सा है।
यहाँ इसके बारे में विस्तार से जानकारी दी गई है:
1. यह फसल को कब नुकसान पहुँचाता है?
गंधी बग का हमला धान की फसल में 'दुग्धावस्था' (Milky Stage) के दौरान होता है।
- प्रश्न: बीज की आनुवंशिक शुद्धता स्थापित करने के लिए कौन सा परीक्षण किया जाता है?
- उत्तर: ग्रो आउट टेस्ट (Grow Out Test)।
ग्रो आउट टेस्ट (Grow Out Test - GOT) ही वह अंतिम और सबसे भरोसेमंद तरीका है जिससे यह सुनिश्चित किया जाता है कि बीजों का एक लॉट आनुवंशिक रूप से शुद्ध (Genetically Pure) है या नहीं।
इसे आसान भाषा में विस्तार से समझते हैं:
1. ग्रो आउट टेस्ट (GOT) क्या है?
आनुवंशिक शुद्धता का मतलब है कि बीज अपनी किस्म (Variety) के असली गुणों को बरकरार रखे हुए है। प्रयोगशाला में बीज के बाहरी रूप को देखकर यह बताना मुश्किल होता है कि इसमें किसी दूसरी किस्म की मिलावट है या नहीं।
- इसलिए, बीजों के एक नमूने को खेत में उगाया जाता है और उनके बढ़ने के दौरान उनके लक्षणों (जैसे- ऊंचाई, फूल का रंग, पत्तियों का आकार) की तुलना उस किस्म के मानक गुणों से की जाती है।
टेट्राजोलियम टेस्ट (Tetrazolium Test या TZ Test) बीजों की गुणवत्ता जाँचने का एक बहुत ही दिलचस्प और तेज़ तरीका है। जहाँ 'ग्रो आउट टेस्ट' में हफ्तों या महीनों लगते हैं, वहीं TZ टेस्ट मात्र 24 से 48 घंटों में बता देता है कि बीज जीवित है या मृत।
इसे 'जैविक परीक्षण' (Biochemical Test) भी कहा जाता है। आइए समझते हैं कि यह कैसे काम करता है:
1. सिद्धांत (The Science Behind It)
यह परीक्षण बीजों के श्वसन (Respiration) की प्रक्रिया पर आधारित है।
- जीवित बीजों के अंदर 'डिहाइड्रोजनेज' (Dehydrogenase) नामक एंजाइम सक्रिय होते हैं।
- जब बीज को 2,3,5-ट्राइफेनिल टेट्राजोलियम क्लोराइड के घोल में डुबोया जाता है, तो यह रंगहीन घोल जीवित ऊतकों (Tissues) के संपर्क में आकर एक लाल रंग के यौगिक 'फॉर्माज़ान' (Formazan) में बदल जाता है।
- बीजों को भिगोना: सबसे पहले बीजों को पानी में भिगोया जाता है ताकि वे नरम हो जाएं और एंजाइम सक्रिय हो सकें।
- चीरा लगाना (Preparation): बीजों को सावधानी से बीच से काटा जाता है ताकि घोल भ्रूण (Embryo) तक पहुँच सके।
- घोल में रखना: इन्हें 0.1% से 1.0% सांद्रता वाले टेट्राजोलियम घोल में अंधेरे में रखा जाता है।
- निरीक्षण: कुछ घंटों बाद बीजों को निकालकर देखा जाता है।
- गहरा लाल रंग: बीज पूरी तरह स्वस्थ और शक्तिशाली (Vigorous) है।
- हल्का गुलाबी: बीज जीवित तो है लेकिन उसकी शक्ति कम है।
- सफेद या धब्बेदार: बीज मृत (Non-viable) है और खेत में नहीं उगेगा।
- समय की बचत: अगर आपको तुरंत बीज खरीदने या बेचने का फैसला लेना है, तो आप अंकुरण टेस्ट (जो 7-14 दिन लेता है) का इंतज़ार नहीं कर सकते।
- सुप्तता (Dormancy): कुछ बीज जीवित होते हैं लेकिन 'सुप्त अवस्था' में होने के कारण अंकुरण टेस्ट में नहीं उगते। TZ टेस्ट उनकी असलियत बता देता है कि वे जिंदा हैं या नहीं।
- बीज की गुणवत्ता: यह बीज के उन हिस्सों की क्षति (Damage) भी दिखा देता है जो बाहर से नहीं दिखते।
आसान शब्दों में: जो हिस्सा जीवित है और सांस ले रहा है, वह लाल हो जाएगा। जो हिस्सा मर चुका है, वह सफेद या बेरंग रहेगा।
2. परीक्षण की प्रक्रिया
3. परिणामों की व्याख्या (Interpretation)
4. TZ टेस्ट क्यों किया जाता है? (महत्व)
एक छोटी सी सीमा:
सेट 2: पादप कार्यिकी, उर्वरक और मृदा विज्ञान
- प्रश्न: 'हाइडथोड्स' (Hydathodes) का संबंध किससे है?
- उत्तर: बिंदु स्त्रावण (Guttation) से।
आपका उत्तर एकदम सटीक है! हाइडथोड्स (Hydathodes) का सीधा संबंध बिंदु स्त्रावण (Guttation) से है।
अक्सर लोग इसे 'ओस' (Dew) समझ लेते हैं, लेकिन विज्ञान की दृष्टि से ओस और बिंदु स्त्रावण में बहुत बड़ा अंतर है। आइए इसे विस्तार से समझते हैं:
1. हाइड्रथोड्स क्या हैं?
ये पौधों की पत्तियों के किनारों (Edges) या सिरों पर स्थित विशेष प्रकार के छिद्र (Pores) होते हैं।
- रंध्रों (Stomata) के विपरीत, हाइड्रथोड्स हमेशा खुले रहते हैं।
- इनके ठीक नीचे ढीली कोशिकाओं का एक समूह होता है जिसे एपिथेम (Epithem) कहा कहते हैं।
2. बिंदु स्त्रावण (Guttation) की प्रक्रिया
जब मिट्टी में नमी बहुत अधिक होती है और हवा में आर्द्रता (Humidity) भी ज्यादा होती है, तो पौधों में वाष्पोत्सर्जन (Transpiration) कम हो जाता है। ऐसी स्थिति में:
- मूल दाब (Root Pressure): जड़ों के अंदर पानी का दबाव बढ़ जाता है।
- निकास: यह अतिरिक्त पानी तरल बूंदों के रूप में हाइड्रथोड्स के माध्यम से बाहर निकल आता है।
- समय: यह प्रक्रिया आमतौर पर देर रात या सुबह-सुबह देखी जाती है।
3. बिंदु स्त्रावण और ओस (Guttation vs Dew) में अंतर
|
विशेषता |
बिंदु स्त्रावण (Guttation) |
ओस (Dew) |
|---|---|---|
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स्रोत |
पौधे के अंदर से निकलता है (जड़ के दबाव से)। |
हवा की नमी ठंडी सतह पर जम जाती है। |
|
स्थान |
केवल पत्तियों के किनारों (Hydathodes) पर। |
पौधे की पूरी सतह या किसी भी ठंडी वस्तु पर। |
|
शुद्धता |
इसमें पानी के साथ खनिज और शर्करा घुली होती है। |
यह लगभग शुद्ध जल होता है। |
4. इसका महत्व क्या है?
- यह पौधों के अंदर पानी के संतुलन को बनाए रखने में मदद करता है जब वाष्पीकरण संभव नहीं होता।
- कभी-कभी इन बूंदों के सूखने के बाद पत्तियों के किनारों पर सफेद पाउडर (खनिज लवण) जमा हो जाता है, जिसे 'क्रस्ट' कहते हैं।
एक रोचक तथ्य: यदि आप सुबह घास की पत्तियों की नोक पर पानी की छोटी-छोटी बूंदें कतार में देखें, तो समझ जाइए कि वह ओस नहीं बल्कि हाइड्रथोड्स से निकला हुआ 'बिंदु स्त्रावण' है।
- प्रश्न: निम्नलिखित में से किसे जटिल उर्वरक (Complex Fertilizer) के रूप में वर्गीकृत किया गया है?
- उत्तर: डी.ए.पी. (DAP)।
आपका उत्तर बिल्कुल सही है! डी.ए.पी. (DAP - Diammonium Phosphate) एक उत्कृष्ट जटिल उर्वरक (Complex Fertilizer) का उदाहरण है।
कृषि विज्ञान में उर्वरकों को उनकी पोषक तत्व संरचना के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में बांटा गया है। आइए समझते हैं कि डी.ए.पी. को 'जटिल' क्यों कहा जाता है:
1. जटिल उर्वरक (Complex Fertilizer) क्या है?
ऐसे उर्वरक जिनमें कम से कम दो या दो से अधिक मुख्य पोषक तत्व (जैसे नाइट्रोजन, फास्फोरस या पोटाश) रासायनिक रूप से संयुक्त होते हैं, उन्हें 'जटिल उर्वरक' कहते हैं।
-
डी.ए.पी. (DAP) की संरचना: इसमें मुख्य रूप से दो तत्व होते हैं:
- नाइट्रोजन (Nitrogen): 18%
- फास्फोरस (P_2O_5): 46%
- चूँकि इसमें N और P दोनों एक ही दाने (Granule) में मौजूद होते हैं, इसलिए यह एक जटिल उर्वरक है।
2. उर्वरकों के अन्य प्रकार (ताकि आप भ्रमित न हों):
- सरल उर्वरक (Straight Fertilizer): जिनमें केवल एक मुख्य पोषक तत्व होता है।
- उदाहरण: यूरिया (केवल 46% नाइट्रोजन), सिंगल सुपर फास्फेट (SSP)।
- मिश्रित उर्वरक (Mixed Fertilizer): जब दो या दो से अधिक सरल उर्वरकों को केवल भौतिक रूप से (Physical mixing) मिला दिया जाता है। इनके दानों का रंग और आकार अलग-अलग हो सकता है।
- पूर्ण उर्वरक (Complete Fertilizer): जिनमें तीनों मुख्य तत्व— N, P और K (नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश) मौजूद हों।
3. डी.ए.पी. (DAP) के बारे में कुछ महत्वपूर्ण तथ्य:
- उपयोग: इसका उपयोग बुआई के समय (Basal dose) किया जाता है क्योंकि फास्फोरस जड़ों के विकास के लिए बहुत जरूरी है और यह मिट्टी में धीरे-धीरे घुलता है।
- प्रकृति: यह पानी में घुलनशील है और पौधों को तुरंत फास्फोरस उपलब्ध कराता है।
- सावधानी: डी.ए.पी. को कभी भी बीज के बिल्कुल पास नहीं डालना चाहिए, क्योंकि इससे निकलने वाली अमोनिया गैस अंकुरित होते बीजों को नुकसान पहुँचा सकती है।
तुलनात्मक चार्ट:
|
उर्वरक |
श्रेणी |
पोषक तत्व (%) |
|---|---|---|
|
यूरिया |
सरल (Straight) |
46% N |
|
DAP |
जटिल (Complex) |
18% N, 46% P |
|
MOP |
सरल (Straight) |
60% K |
|
NPK (12:32:16) |
जटिल (Complex) |
N, P और K तीनों |
- प्रश्न: जड़ों की वृद्धि और पौधों की शुरुआती पकड़ के लिए कौन सा पोषक तत्व आवश्यक है?
- उत्तर: फास्फोरस (P)।
- प्रश्न: क्रेब्स चक्र में प्रवेश करने से पहले पाइरूविक एसिड के डीकार्बोक्सिलेशन से क्या बनता है?
- उत्तर: एसिटाइल को-एंजाइम ए (Acetyl-CoA)।
आपका उत्तर बिल्कुल सही है! एसिटाइल को-एंजाइम ए (Acetyl-CoA) ही वह मुख्य अणु (Molecule) है जो ग्लाइकोलाइसिस और क्रेब्स चक्र के बीच की कड़ी के रूप में कार्य करता है।
इस प्रक्रिया को जीव विज्ञान में "लिंक रिएक्शन" (Link Reaction) या "गेटवे रिएक्शन" कहा जाता है। आइए इसे थोड़ा विस्तार से समझते हैं:
1. यह प्रक्रिया कहाँ होती है?
- ग्लाइकोलाइसिस: कोशिका के कोशिकाद्रव्य (Cytoplasm) में होता है, जहाँ ग्लूकोज टूटकर पाइरूविक एसिड (C_3H_4O_3) के दो अणु बनाता है।
- लिंक रिएक्शन: यह पाइरूविक एसिड फिर माइटोकॉन्ड्रिया की आंतरिक झिल्ली में प्रवेश करता है। यहीं पर यह एसिटाइल-CoA में बदलता है।
2. रासायनिक परिवर्तन (Oxidative Decarboxylation)
इस चरण में तीन मुख्य घटनाएं एक साथ होती हैं:
- डीकार्बोक्सिलेशन (Decarboxylation): पाइरूविक एसिड (3 कार्बन वाला अणु) से एक कार्बन परमाणु CO_2 के रूप में बाहर निकल जाता है। अब यह 2 कार्बन वाला अणु रह जाता है।
- ऑक्सीकरण (Oxidation): हाइड्रोजन परमाणु अलग होते हैं और NAD^+ को NADH में बदल देते हैं (जो बाद में ऊर्जा बनाने के काम आता है)।
- CoA का जुड़ना: अंत में, को-एंजाइम ए (CoA) इस 2 कार्बन वाले समूह के साथ जुड़कर एसिटाइल-CoA बनाता है।
3. क्रेब्स चक्र (Krebs Cycle) में प्रवेश
एसिटाइल-CoA अब पूरी तरह तैयार है क्रेब्स चक्र में जाने के लिए:
- यह चक्र के पहले अणु, ऑक्सालोएसिटिक एसिड (OAA) (4 कार्बन), के साथ मिलता है।
- इन दोनों के मिलने से साइट्रिक एसिड (6 कार्बन) बनता है। इसीलिए क्रेब्स चक्र को 'साइट्रिक एसिड चक्र' भी कहते हैं।
4. सारांश समीकरण (Summary Equation):
विशेष नोट: इस प्रक्रिया के लिए 'पाइरूवेट डिहाइड्रोजनेज' (Pyruvate dehydrogenase) नामक एक बहुत बड़ा एंजाइम कॉम्प्लेक्स जिम्मेदार होता है। यदि शरीर में विटामिन B_1 (थायमिन) की कमी हो, तो यह प्रक्रिया बाधित हो सकती है।
- प्रश्न: कौन सा 'जेनेटिक पशु जन्य रोग' दूषित दूध के सेवन से मनुष्यों में फैलता है?
- उत्तर: एंथ्रेक्स (Anthrax/गिल्टी रोग)।
आपका उत्तर बिल्कुल सही है! एंथ्रेक्स (Anthrax), जिसे हिंदी में 'गिल्टी रोग' या 'प्लीहा ज्वर' भी कहा जाता है, एक अत्यंत खतरनाक ज़ूनोटिक (Zoonotic) रोग है। ज़ूनोटिक का अर्थ है वह बीमारी जो जानवरों से मनुष्यों में फैल सकती है।
हालाँकि एंथ्रेक्स मुख्य रूप से संक्रमित जानवर के सीधे संपर्क या उसकी खाल/ऊन (Sorters' disease) से फैलता है, लेकिन दूषित और बिना उबले दूध के सेवन से भी इसका संक्रमण मनुष्यों में हो सकता है।
यहाँ इस रोग और दूध से फैलने वाले अन्य रोगों के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई है:
1. एंथ्रेक्स (Anthrax) के बारे में मुख्य तथ्य
- कारक (Causative Agent): यह बैसिलस एंथ्रेसिस (Bacillus anthracis) नामक जीवाणु से होता है।
- स्पोर (Spores): इसके जीवाणु बहुत जिद्दी 'बीजाणु' (Spores) बनाते हैं जो मिट्टी या वातावरण में दशकों तक जीवित रह सकते हैं।
- दूध से संक्रमण: यदि कोई पशु एंथ्रेक्स से पीड़ित है, तो उसके दूध में ये जीवाणु मौजूद हो सकते हैं। बिना पाश्चुरीकृत (Unpasteurized) या कच्चा दूध पीने से यह मनुष्यों की आहार नली को प्रभावित करता है, जिसे Gastrointestinal Anthrax कहते हैं।
2. दूध से फैलने वाले अन्य प्रमुख ज़ूनोटिक रोग
एंथ्रेक्स के अलावा कुछ और भी बीमारियाँ हैं जो दूषित दूध के जरिए मनुष्यों तक पहुँचती हैं:
|
रोग का नाम |
कारक (Pathogen) |
प्रभाव |
|---|---|---|
|
ब्रूसेलोसिस (Brucellosis) |
Brucella जीवाणु |
इसे 'माल्टा फीवर' भी कहते हैं। यह कच्चे दूध से फैलने वाला सबसे आम रोग है। |
|
तपेदिक (Tuberculosis - TB) |
Mycobacterium bovis |
गायों में होने वाला टीबी दूध के जरिए इंसानों के फेफड़ों और हड्डियों को प्रभावित कर सकता है। |
|
लिस्टरियोसिस (Listeriosis) |
Listeria monocytogenes |
यह ठंडे वातावरण में भी पनप सकता है और दूषित दूध/पनीर से फैलता है। |
3. बचाव के उपाय
- पाश्चुरीकरण (Pasteurization): दूध को एक निश्चित तापमान (जैसे 63°C पर 30 मिनट या 72°C पर 15 सेकंड) तक गर्म करके तुरंत ठंडा करने से ये हानिकारक जीवाणु मर जाते हैं।
- टीकाकरण: पशुओं में एंथ्रेक्स का नियमित टीकाकरण (Vaccination) करवाना चाहिए।
- शव निस्तारण: एंथ्रेक्स से मरे हुए पशु का पोस्टमार्टम कभी नहीं करना चाहिए, क्योंकि हवा के संपर्क में आते ही इसके जीवाणु घातक स्पोर्स बना लेते हैं। शव को गहरे गड्ढे में चूने के साथ दफनाना चाहिए।
जी हाँ, पशुपालन में खुरपका-मुँहपका (FMD) और थनैला (Mastitis) दो ऐसी बीमारियाँ हैं जो डेयरी किसानों को सबसे ज्यादा आर्थिक नुकसान पहुँचाती हैं।
आइए इन दोनों रोगों को विस्तार से समझते हैं:
1. खुरपका-मुँहपका रोग (Foot and Mouth Disease - FMD)
यह एक अत्यंत संक्रामक विषाणुजनित (Viral) रोग है जो गाय, भैंस, भेड़ और बकरी जैसे फटे खुर वाले पशुओं को प्रभावित करता है।
- कारक (Causative Agent): यह 'पिकोर्ना वायरस' (Picornavirus) परिवार के 'एफ़्थोवायरस' से होता है।
-
प्रमुख लक्षण:
- पशु को तेज बुखार आना।
- मुँह, जीभ और मसूड़ों पर छाले पड़ना, जिससे लार (Drooling) टपकती रहती है।
- खुरों के बीच में छाले और जख्म होना, जिससे पशु लंगड़ाकर चलता है।
- दूध उत्पादन में अचानक भारी गिरावट।
-
बचाव और उपचार:
- इसका कोई निश्चित इलाज नहीं है, केवल लक्षणों का उपचार किया जाता है (जैसे छालों को लाल दवा/Potassium Permanganate से धोना)।
- टीकाकरण (Vaccination): साल में दो बार (हर 6 महीने में) इसका टीका लगवाना अनिवार्य है।
2. थनैला रोग (Mastitis)
यह दुधारू पशुओं के अयन (Udder) और थनों की एक गंभीर बीमारी है, जो मुख्य रूप से जीवाणुओं (Bacteria) के संक्रमण से होती है।
- कारक: Streptococcus और Staphylococcus जैसे जीवाणु।
-
प्रमुख लक्षण:
- थनों में सूजन, लाली और दर्द होना।
- दूध का स्वरूप बदल जाना (दूध में थक्के/flakes आना, खून आना या दूध का पानी जैसा हो जाना)।
- अयन का सख्त (Hard) हो जाना।
- पहचान का तरीका (Strip Cup Test): दूध निकालने से पहले पहली कुछ धारों को एक काली प्लेट या स्ट्रिप कप में लेकर थक्कों की जाँच की जाती है।
-
बचाव के उपाय:
- स्वच्छता: दूध निकालने से पहले और बाद में थनों को पोटेशियम परमैंगनेट के हल्के घोल से धोना चाहिए।
- टीट डिप (Teat Dip): दूध निकालने के बाद थनों को आयोडीन के घोल में डुबोना।
- पूर्ण दोहन: थनों में दूध शेष नहीं रहना चाहिए।
दोनों रोगों के बीच मुख्य अंतर
|
विशेषता |
खुरपका-मुँहपका (FMD) |
थनैला (Mastitis) |
|---|---|---|
|
प्रकार |
विषाणुजनित (Viral) |
जीवाणुजनित (Bacterial) |
|
संक्रामकता |
बहुत अधिक (हवा/संपर्क से) |
केवल थनों के माध्यम से |
|
मुख्य प्रभाव |
मुँह और पैर (खुर) |
अयन और दूध की गुणवत्ता |
|
रोकथाम |
केवल टीकाकरण |
स्वच्छता और प्रबंधन |
- प्रश्न: कृषि पहल 'आर्या' (ARYA) का पूर्ण रूप क्या है?
- उत्तर: Attracting and Retaining Youth in Agriculture.
आपका उत्तर बिल्कुल सही है! आर्या (ARYA - Attracting and Retaining Youth in Agriculture) भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) द्वारा शुरू की गई एक बहुत ही महत्वपूर्ण पहल है।
इसका मुख्य उद्देश्य ग्रामीण युवाओं को खेती से जोड़ना और उन्हें शहरों की ओर पलायन (Migration) करने से रोकना है। आइए इस योजना के बारे में विस्तार से समझते हैं:
1. 'आर्या' (ARYA) की आवश्यकता क्यों पड़ी?
भारत में खेती की औसत उम्र बढ़ रही है क्योंकि युवा पीढ़ी खेती को "घाटे का सौदा" या "कम प्रतिष्ठा वाला काम" मानकर शहरों की ओर भाग रही है।
- समस्या: यदि युवा खेती छोड़ देंगे, तो भविष्य में खाद्य सुरक्षा (Food Security) का संकट खड़ा हो सकता है।
- समाधान: खेती को 'आकर्षक' और 'लाभदायक' बनाना ताकि युवा इसे एक बिजनेस (Entrepreneurship) के रूप में अपनाएं।
2. योजना के मुख्य उद्देश्य (Objectives)
- कौशल विकास: ग्रामीण युवाओं को आधुनिक कृषि तकनीकों का प्रशिक्षण देना।
- उद्यमिता (Entrepreneurship): युवाओं को केवल किसान नहीं, बल्कि 'कृषि-उद्यमी' बनाना।
- आर्थिक लाभ: ग्रामीण क्षेत्रों में ही रोजगार के अवसर पैदा करना ताकि उनकी आय बढ़े।
3. यह योजना कैसे काम करती है?
यह परियोजना मुख्य रूप से कृषि विज्ञान केंद्रों (KVKs) के माध्यम से लागू की जाती है।
- प्रत्येक चयनित जिले में, KVKs युवाओं के समूहों को पहचानते हैं और उन्हें विशिष्ट कृषि-इकाइयों को स्थापित करने में मदद करते हैं।
-
किस्मों का चयन: युवाओं को उन क्षेत्रों में प्रशिक्षित किया जाता है जिनमें कम निवेश में अधिक लाभ हो, जैसे:
- मशरूम उत्पादन
- मधुमक्खी पालन (Beekeeping)
- पोल्ट्री और डेयरी फार्मिंग
- बीज प्रसंस्करण (Seed Processing)
- फलों और सब्जियों का मूल्य संवर्धन (Value Addition)
4. योजना के लाभ
- तकनीकी सहायता: विशेषज्ञों द्वारा लगातार मार्गदर्शन मिलता है।
- बाजार से जुड़ाव: तैयार माल को बेचने के लिए मार्केट लिंकेज प्रदान किया जाता है।
- आत्मविश्वास: जब एक युवा अपने गांव में सफल स्टार्टअप चलाता है, तो दूसरे युवाओं को भी प्रेरणा मिलती है।
याद रखने योग्य बिंदु:
- शुरुआत: इसे 2015 में प्रायोगिक तौर पर शुरू किया गया था।
- नोडल एजेंसी: ICAR (Indian Council of Agricultural Research)।
हाँ, कृषि शिक्षा और ग्रामीण विकास को नई ऊँचाइयों पर ले जाने के लिए Student READY और ATARI जैसी योजनाएं रीढ़ की हड्डी की तरह काम करती हैं। ये दोनों कार्यक्रम कृषि के व्यावहारिक ज्ञान और तकनीक के प्रसार (Extension) से जुड़े हैं।
आइए इन्हें सरल भाषा में समझते हैं:
1. Student READY (स्कोर) योजना
इसका पूरा नाम है: Rural Entrepreneurship Awareness Development Yojana।
यह योजना कृषि स्नातक (B.Sc. Ag) के छात्रों के लिए उनके अंतिम वर्ष में अनिवार्य कर दी गई है।
- उद्देश्य: डिग्री पूरी होने से पहले छात्र को किताबी ज्ञान से बाहर निकालकर 'व्यावहारिक' अनुभव देना।
- मुख्य घटक: इसके तहत छात्रों को RAWE (Rural Agricultural Work Experience) के लिए गांवों में भेजा जाता है।
- अनुभव: छात्र किसानों के साथ रहकर उनकी समस्याओं को समझते हैं और अपनी सीखी हुई तकनीकों को खेत पर लागू करके देखते हैं।
- स्टाइपेंड: सरकार छात्रों को इस दौरान आर्थिक सहायता (Stipend) भी प्रदान करती है ताकि वे अपना प्रोजेक्ट अच्छे से पूरा कर सकें।
2. अटारी (ATARI)
इसका पूरा नाम है: Agricultural Technology Application Research Institute।
यह सीधे तौर पर ICAR (भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद) के तहत काम करने वाली एक निगरानी और प्रबंधन संस्था है।
- कार्य: पूरे भारत को 11 ज़ोन (Zones) में बाँटा गया है, और हर ज़ोन में एक ATARI कार्यालय होता है।
- KVK की देखरेख: इसका मुख्य काम अपने ज़ोन के अंतर्गत आने वाले सभी कृषि विज्ञान केंद्रों (KVKs) की निगरानी करना, उन्हें बजट देना और उनकी प्रगति की जाँच करना है।
- महत्व: यह प्रयोगशाला (Lab) और खेत (Land) के बीच एक पुल का काम करता है। वैज्ञानिकों द्वारा खोजी गई नई किस्मों को किसानों तक पहुँचाने की पूरी योजना यहीं से बनती है।
3. दोनों में मुख्य अंतर
|
योजना/संस्था |
मुख्य फोकस |
लक्षित समूह (Target Group) |
|---|---|---|
|
Student READY |
कृषि शिक्षा और कौशल विकास |
कृषि महाविद्यालय के छात्र |
|
ATARI |
तकनीक का प्रसार और KVK प्रबंधन |
कृषि वैज्ञानिक और विस्तार कार्यकर्ता |
|
ARYA |
स्वरोजगार और उद्यमिता |
ग्रामीण बेरोजगार युवा |
- प्रश्न: 'जियोहाइड्रोलॉजिकल' इकाइयों की विशिष्ट आकार सीमा कितनी होती है?
- उत्तर: 1000 से 5000 हेक्टेयर।
आपका उत्तर बिल्कुल सटीक है! जियोहाइड्रोलॉजिकल (Geohydrological) इकाइयाँ, जिन्हें अक्सर 'वॉटरशेड' (Watershed) या 'जलग्रहण क्षेत्र' के रूप में वर्गीकृत किया जाता है, उनकी आकार सीमा 1000 से 5000 हेक्टेयर के बीच होती है।
इन इकाइयों को समझना जल प्रबंधन और कृषि नियोजन के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। आइए इसे थोड़ा और विस्तार से समझते हैं:
1. जियोहाइड्रोलॉजिकल इकाई क्या है?
यह एक ऐसा भौगोलिक क्षेत्र है जहाँ की भू-गर्भीय (Geological) और जल-वैज्ञानिक (Hydrological) विशेषताएँ समान होती हैं। सरल शब्दों में, यह वह क्षेत्र है जहाँ गिरने वाला सारा वर्षा जल एक ही प्राकृतिक जल स्रोत (जैसे कोई नाला या नदी) में जाकर गिरता है।
- प्रश्न: निम्नलिखित में से कौन सी गैस 'ग्रीनहाउस गैस' नहीं है?
- उत्तर: ऑक्सीजन (बाकी: CO_2, CH_4, N_2O, CFC हैं)।
आपका उत्तर बिल्कुल सही है! ऑक्सीजन (O_2) एक ग्रीनहाउस गैस नहीं है, बल्कि यह हमारे वायुमंडल का लगभग 21% हिस्सा बनाती है और जीवन के लिए अनिवार्य है।
ग्रीनहाउस गैसें वे होती हैं जो सूर्य से आने वाली गर्मी (अवरक्त विकिरण/Infrared Radiation) को सोख लेती हैं और उन्हें अंतरिक्ष में वापस जाने से रोकती हैं, जिससे पृथ्वी का तापमान बढ़ता है।
आइए इसे और विस्तार से समझते हैं:
1. प्रमुख ग्रीनहाउस गैसें (GHGs)
वायुमंडल में मौजूद मुख्य ग्रीनहाउस गैसें निम्नलिखित हैं:
- कार्बन डाइऑक्साइड (CO_2): यह सबसे प्रमुख ग्रीनहाउस गैस है, जो जीवाश्म ईंधन (कोयला, तेल) जलाने और वनों की कटाई से निकलती है।
- मीथेन (CH_4): यह CO_2 की तुलना में कहीं अधिक शक्तिशाली है। यह धान के खेतों, पशुओं के पाचन (जुगाली), और कचरे के ढेरों से निकलती है।
- नाइट्रस ऑक्साइड (N_2O): यह मुख्य रूप से खेती में नाइट्रोजन उर्वरकों (जैसे यूरिया) के अत्यधिक उपयोग से निकलती है।
- क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs): ये मानव निर्मित गैसें हैं जो मुख्य रूप से फ्रिज और एयर कंडीशनर से निकलती हैं। ये ओजोन परत को भी नुकसान पहुँचाती हैं।
- जल वाष्प (Water Vapor): यह प्राकृतिक रूप से सबसे प्रचुर मात्रा में मौजूद ग्रीनहाउस गैस है।
2. ऑक्सीजन और नाइट्रोजन क्यों नहीं हैं?
वायुमंडल का 99% हिस्सा नाइट्रोजन (78%) और ऑXYGEN (21%) से बना है, लेकिन ये दोनों ग्रीनहाउस गैसें नहीं हैं।
- कारण: ऑक्सीजन और नाइट्रोजन के अणु द्वि-परमाणुक (Diatomic) होते हैं (जैसे O_2 और N_2)। इनके अणुओं की संरचना ऐसी होती है कि ये अवरक्त विकिरण (Infrared) को अवशोषित नहीं कर पाते।
- इसके विपरीत, ग्रीनहाउस गैसों के अणु (जैसे CO_2, H_2O) अधिक जटिल होते हैं और कंपन कर सकते हैं, जिससे वे गर्मी को पकड़ लेते हैं।
3. कृषि और ग्रीनहाउस गैसों का संबंध
कृषि क्षेत्र ग्रीनहाउस गैसों का एक बड़ा स्रोत है, जिसे समझना आपके लिए महत्वपूर्ण हो सकता है:
|
गैस |
कृषि स्रोत (Agricultural Source) |
|---|---|
|
मीथेन (CH_4) |
धान की खेती (जलभराव वाले खेत) और पशुपालन। |
|
नाइट्रस ऑक्साइड (N_2O) |
उर्वरकों का उपयोग और मिट्टी का प्रबंधन। |
|
कार्बन डाइऑक्साइड (CO_2) |
कृषि यंत्रों का उपयोग और पराली जलाना। |
- प्रश्न: भारत में MSP के तहत अनाज की खरीद के लिए मुख्य एजेंसी कौन सी है?
- उत्तर: भारतीय खाद्य निगम (FCI)।
आपका उत्तर बिल्कुल सही है! भारतीय खाद्य निगम (FCI - Food Corporation of India) भारत में न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर अनाज की खरीद, भंडारण और वितरण के लिए जिम्मेदार मुख्य केंद्रीय नोडल एजेंसी है।
FCI की भूमिका और MSP खरीद की प्रक्रिया को विस्तार से नीचे समझा जा सकता है:
1. भारतीय खाद्य निगम (FCI) की स्थापना
- इसकी स्थापना खाद्य निगम अधिनियम, 1964 के तहत 1965 में की गई थी।
- इसका मुख्य उद्देश्य देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना और किसानों के हितों की रक्षा करना है।
2. FCI के मुख्य कार्य
FCI केवल अनाज खरीदता ही नहीं, बल्कि इसके कई अन्य महत्वपूर्ण कार्य भी हैं:
- खरीद (Procurement): जब अनाज की बाजार कीमत MSP से नीचे गिरती है, तो FCI किसानों से सीधे अनाज खरीदता है ताकि उन्हें नुकसान न हो।
- भंदन (Storage): खरीदे गए अनाज को वैज्ञानिक तरीके से साइलो (Silos) और गोदामों में सुरक्षित रखना।
- वितरण (Distribution): सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS/राशन की दुकान) के माध्यम से देश के गरीब तबके तक सस्ता अनाज पहुँचाना।
- बफर स्टॉक (Buffer Stock): आपातकालीन स्थिति (जैसे अकाल या युद्ध) के लिए अनाज का सुरक्षित भंडार बनाए रखना।
3. खरीद में अन्य सहायक एजेंसियां
हालाँकि मुख्य जिम्मेदारी FCI की है, लेकिन यह अकेले इतना बड़ा काम नहीं कर सकती। इसके साथ कुछ अन्य एजेंसियां भी मिलकर काम करती हैं:
- राज्य स्तरीय एजेंसियां: प्रत्येक राज्य की अपनी विपणन एजेंसियां (State Marketing Agencies) भी खरीद करती हैं।
- NAFED: यह मुख्य रूप से दलहन (Pulses) और तिलहन (Oilseeds) की खरीद के लिए जिम्मेदार है।
- CCI (Cotton Corporation of India): यह कपास (Cotton) की खरीद के लिए नोडल एजेंसी है।
- JCI (Jute Corporation of India): यह जूट की खरीद देखती है।
4. विकेंद्रीकृत खरीद (Decentralized Procurement - DCP)
कुछ राज्यों में राज्य सरकारें खुद अनाज खरीदती हैं और उसे PDS के लिए वितरित करती हैं। FCI केवल उन राज्यों के अतिरिक्त स्टॉक को उठाती है। इसे 'विकेंद्रीकृत खरीद' कहते हैं। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य इसमें अग्रणी हैं।
याद रखने योग्य एक महत्वपूर्ण बिंदु:
MSP की घोषणा कौन करता है?
अक्सर लोग भ्रमित हो जाते हैं कि FCI मूल्य तय करती है, लेकिन ऐसा नहीं है।
- CACP (कृषि लागत और मूल्य आयोग) सिफारिश करता है।
- CCEA (आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति) अंतिम घोषणा करती है।
- FCI केवल उस घोषित मूल्य पर अनाज खरीदने का काम करती है।
- प्रश्न: फूलगोभी में 'व्हिपटेल' (Whiptail) विकार किस तत्व की कमी से होता है?
- उत्तर: मोलिब्डेनम (Mo)।
आपका उत्तर बिल्कुल सही है। मोलिब्डेनम (Mo) की कमी से फूलगोभी की पत्तियां संकरी, धागे जैसी या 'चाबुक' (Whip) के आकार की हो जाती हैं, जिसे व्हिपटेल कहा जाता है।
पौधों में पोषक तत्वों की कमी से होने वाले अन्य प्रमुख रोगों की सूची नीचे दी गई है, जो अक्सर प्रतियोगी परीक्षाओं और कृषि अध्ययन में पूछे जाते हैं:
1. मुख्य पोषक तत्वों (Macro-nutrients) की कमी से रोग
|
तत्व (Nutrient) |
रोग/लक्षण (Disease/Symptom) |
प्रभावित फसल |
|---|---|---|
|
नाइट्रोजन (N) |
पत्तियों का पीला पड़ना (Chlorosis) |
लगभग सभी फसलें |
|
फास्फोरस (P) |
पत्तियों का बैंगनी या गहरा हरा होना |
मक्का, अनाज |
|
पोटेशियम (K) |
पत्तियों के किनारे जलना (Marginal Scorching) |
आलू, दलहन |
|
मैग्नीशियम (Mg) |
अंतशिरा क्लोरोसिस (Interveinal Chlorosis) |
कपास, तंबाकू |
|
कैल्शियम (Ca) |
ब्लॉसम एंड रॉट (Blossom End Rot) |
टमाटर, मिर्च |
2. सूक्ष्म पोषक तत्वों (Micro-nutrients) की कमी से रोग
यह सूची बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि सूक्ष्म तत्वों की कमी विशिष्ट रोगों को जन्म देती है:
-
जस्ता (Zinc - Zn):
- खैरा रोग (Khaira Disease): धान की फसल में (नर्सरी चरण में पत्तियां भूरी होने लगती हैं)।
- लिटिल लीफ (Little Leaf): आम और बैंगन में पत्तियों का छोटा रह जाना।
- व्हाइट बड (White Bud): मक्का में।
-
बोरोन (Boron - B):
- ब्राउनिंग (Browning): फूलगोभी में तने का खोखला और भूरा होना।
- फलों का फटना (Fruit Cracking): टमाटर, अनार और नींबू वर्गीय फलों में।
- हेन एंड चिकन रोग: अंगूर के गुच्छों में दानों का असमान आकार।
-
मैंगनीज (Manganese - Mn):
- मार्श स्पॉट (Marsh Spot): मटर के दानों में।
- फाला ब्लाइट (Phala Blight): गन्ने में।
- तांबा (Copper - Cu):
- डाइबैक (Dieback): नींबू (Citrus) के पौधों में टहनियों का ऊपर से नीचे की ओर सूखना।
- लोहा (Iron - Fe):
- आयरन क्लोरोसिस: नई पत्तियों का पूरी तरह पीला या सफेद हो जाना (गन्ने और मूंगफली में सामान्य)।
3. तत्वों की कमी पहचानने का आसान तरीका:
- पुरानी पत्तियों पर लक्षण: यदि पौधे की निचली (पुरानी) पत्तियां खराब हो रही हैं, तो यह N, P, K, Mg की कमी हो सकती है क्योंकि ये तत्व पौधे में गतिशील (Mobile) होते हैं।
- नई पत्तियों पर लक्षण: यदि पौधे के ऊपरी (नए) भाग में लक्षण दिख रहे हैं, तो यह Fe, Mn, Cu, S की कमी हो सकती है क्योंकि ये कम गतिशील होते हैं।
- शीर्ष कलिका (Terminal Bud): यदि सबसे ऊपर की कली सूख रही है, तो यह Ca और Boron की कमी का संकेत है।
एक विशेष जानकारी:
क्या आप जानते हैं कि धान का खैरा रोग सबसे पहले पंतनगर (Uttarakhand) में डॉ. वाई.एल. नेने द्वारा खोजा गया था?
1. सूक्ष्म पोषक तत्वों का प्रबंधन (Micronutrient Management)
|
तत्व |
उर्वरक का नाम |
छिड़काव की मात्रा (प्रति लीटर पानी) |
मुख्य उपयोग |
|---|---|---|---|
|
जस्ता (Zinc) |
जिंक सल्फेट (21% या 33%) |
5 ग्राम जिंक सल्फेट + 2.5 ग्राम बुझा हुआ चूना |
धान का खैरा रोग, मक्का का व्हाइट बड। |
|
बोरोन (Boron) |
बोरेक्स (सुहागा) या सोलुबोर |
1 से 1.5 ग्राम |
फलों का फटना, फूलगोभी की ब्राउनिंग। |
|
लोहा (Iron) |
फेरस सल्फेट (हरा कसीस) |
5 ग्राम |
गन्ने और मूंगफली में पीलापन (Chlorosis)। |
|
मैंगनीज (Mn) |
मैंगनीज सल्फेट |
2 से 3 ग्राम |
मटर के मार्श स्पॉट और गेहूं के पीलापन के लिए। |
|
तांबा (Copper) |
कॉपर सल्फेट (नीला थोथा) |
2 ग्राम + चूना |
नींबू वर्गीय फलों में डाइबैक रोग। |
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मोलिब्डेनम (Mo) |
अमोनियम मोलिब्डेट |
0.5 से 1 ग्राम |
फूलगोभी का व्हिपटेल रोग। |
मृदा स्वास्थ्य कार्ड (Soil Health Card - SHC) योजना भारत सरकार की एक क्रांतिकारी पहल है, जिसे 19 फरवरी 2015 को राजस्थान के सूरतगढ़ से "स्वस्थ धरा, खेत हरा" के नारे के साथ शुरू किया गया था।
यह कार्ड आपके खेत की मिट्टी की "बीमारी" बताने वाली एक रिपोर्ट कार्ड (Health Report) की तरह है। आइए जानते हैं यह आपके लिए क्यों जरूरी है:
1. कार्ड में किन तत्वों की जांच होती है? (12 पैरामीटर्स)
मिट्टी के नमूने की जांच लैब में की जाती है और कार्ड में कुल 12 महत्वपूर्ण संकेतकों की रिपोर्ट दी जाती है:
- मुख्य पोषक तत्व: नाइट्रोजन (N), फास्फोरस (P), और पोटेशियम (K)।
- द्वितीयक तत्व: सल्फर (S)।
- सूक्ष्म पोषक तत्व: जस्ता (Zn), लोहा (Fe), तांबा (Cu), मैंगनीज (Mn), और बोरोन (B)।
- भौतिक गुण: pH मान (अम्लता/क्षारकता), विद्युत चालकता (EC - खारापन), और जैविक कार्बन (OC)।
2. यह योजना किसानों के लिए क्यों फायदेमंद है?
- सटीक खाद का उपयोग: अक्सर किसान बिना सोचे-समझे यूरिया या DAP डालते हैं। कार्ड यह बताता है कि आपके खेत में किस तत्व की कमी है, जिससे आप जरूरत के अनुसार ही खाद डालते हैं।
- लागत में कमी: फालतू खाद का खर्चा बचता है, जिससे खेती की लागत 10-15% तक कम हो जाती है।
- पैदावार में वृद्धि: संतुलित पोषण मिलने से फसल स्वस्थ होती है और उत्पादन बढ़ता है।
- मिट्टी की सेहत: अंधाधुंध रासायनिक खादों के उपयोग से मिट्टी बंजर होने से बच जाती है।
3. कार्ड कैसे बनवाएं? (प्रक्रिया)
- नमूना लेना: कृषि विभाग के कर्मचारी या आप स्वयं फसल कटने के बाद खेत के अलग-अलग कोनों से 'V' आकार का गड्ढा खोदकर मिट्टी का नमूना लेते हैं।
- लैब परीक्षण: इस मिट्टी को नजदीकी मृदा परीक्षण प्रयोगशाला (Soil Testing Lab) में भेजा जाता है।
- कार्ड प्राप्ति: परीक्षण के बाद, आपको एक प्रिंटेड कार्ड मिलता है जिसमें आपके खेत की मिट्टी की स्थिति और अगली फसल के लिए खाद की सिफारिश (Recommendation) लिखी होती है।
4. कार्ड की वैधता
एक मृदा स्वास्थ्य कार्ड 3 वर्ष के लिए वैध होता है। तीन साल बाद फिर से मिट्टी की जांच करानी चाहिए ताकि पोषक तत्वों में आए बदलाव का पता चल सके।
एक महत्वपूर्ण सुझाव:
यदि आपके मिट्टी स्वास्थ्य कार्ड में जैविक कार्बन (Organic Carbon) 0.5% से कम है, तो इसका मतलब है कि मिट्टी की उर्वरता कम हो रही है। इसे सुधारने के लिए आपको गोबर की खाद (FYM) या हरी खाद (ढैंचा/सनई) का उपयोग बढ़ाना चाहिए।
सेट 3: योजनाएं, तकनीक और उत्तर प्रदेश विशेष
- प्रश्न: वर्ष 2025 सीजन के लिए किस खरीफ फसल की MSP में सबसे अधिक वृद्धि हुई?
- उत्तर: रामतिल (Niger seed) - ₹820।
- प्रश्न: जिला स्तर पर कृषि विस्तार के विकेंद्रीकरण के लिए कौन सी संस्था काम करती है?
- उत्तर: आत्मा (ATMA - Agriculture Technology Management Agency)।
ATMA (Agriculture Technology Management Agency)
- स्थापना: इसकी शुरुआत 1990 के दशक के अंत में एक पायलट प्रोजेक्ट के रूप में हुई थी, जिसे बाद में 2005-06 में पूरे भारत में विस्तारित किया गया।
- प्रकृति: यह जिला स्तर पर एक पंजीकृत स्वायत्त संस्था (Autonomous Body) है, जो कृषि और संबद्ध विभागों (जैसे पशुपालन, मत्स्य पालन, आदि) के बीच समन्वय का काम करती है।
-
मुख्य उद्देश्य:
- विकेंद्रीकरण: निर्णय लेने की शक्ति को सीधे जिले और ब्लॉक स्तर पर लाना।
- किसान-केंद्रित: अनुसंधान और विस्तार को किसानों की स्थानीय जरूरतों के अनुसार ढालना।
- बहु-क्षेत्रीय दृष्टिकोण: केवल फसल ही नहीं, बल्कि खेती से जुड़ी सभी गतिविधियों को एक मंच पर लाना।
ATMA की संगठनात्मक संरचना (Organizational Structure)
ATMA की सफलता के पीछे इसकी त्रि-स्तरीय (Three-tier) संरचना है:
- जिला स्तर (District Level): यहाँ 'गवर्निंग बोर्ड' (Governing Board) नीतिगत निर्णय लेता है और 'प्रबंधन समिति' (Management Committee) उसे लागू करती है।
- ब्लॉक स्तर (Block Level): यहाँ BTT (Block Technology Team) और BFAC (Block Farmers Advisory Committee) काम करते हैं। यह स्तर विस्तार गतिविधियों की योजना बनाने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है।
- ग्राम स्तर (Village Level): यहाँ 'किसान मित्र' (Farmer Friends) और 'स्वयं सहायता समूहों' के माध्यम से जानकारी किसानों तक पहुँचती है।
आत्मा (ATMA) के माध्यम से किसानों को मुख्य रूप से तकनीक, प्रशिक्षण और वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। इसका उद्देश्य किसान को केवल "खेती करने वाला" नहीं, बल्कि एक "कृषि-उद्यमी" (Agri-preneur) बनाना है।
यहाँ विस्तार से बताया गया है कि ATMA के तहत किसानों को क्या-क्या लाभ मिलते हैं:
1. प्रशिक्षण और क्षमता विकास (Training & Capacity Building)
यह ATMA का सबसे मजबूत पक्ष है। इसके तहत निम्नलिखित गतिविधियाँ होती हैं:
- अंतर-राज्यीय और अंतर-जिला भ्रमण (Exposure Visits): किसानों को दूसरे राज्यों या जिलों के प्रगतिशील फार्मों, कृषि विश्वविद्यालयों और अनुसंधान केंद्रों पर ले जाया जाता है ताकि वे नई तकनीकों को अपनी आँखों से देख सकें।
- किसान पाठशाला (Farm Schools): किसी प्रगतिशील किसान के खेत पर ही 'स्कूल' चलाया जाता है, जहाँ आस-पास के किसान "सीखना और करना" (Learning by doing) सिद्धांत पर नई विधियाँ सीखते हैं।
- विशेषज्ञ प्रशिक्षण: कृषि वैज्ञानिकों द्वारा बीज उपचार, जैविक खेती, और कीट प्रबंधन (IPM) पर ट्रेनिंग दी जाती है।
2. प्रदर्शन इकाइयाँ (Demonstrations)
ATMA किसानों के खेतों पर ही नई किस्मों या तकनीकों का प्रदर्शन (Frontline Demonstrations) आयोजित करता है।
- इसमें बीज, उर्वरक और कीटनाशकों जैसी इनपुट्स के लिए 100% तक की सहायता या सब्सिडी दी जाती है ताकि किसान बिना जोखिम के नई तकनीक आजमा सके।
3. वित्तीय सहायता और सब्सिडी (Financial Support)
ATMA सीधे तौर पर ट्रैक्टर या बड़ी मशीनरी नहीं बांटता (वह अन्य सरकारी योजनाओं का काम है), लेकिन यह निम्नलिखित के लिए अनुदान देता है:
- किसान समूहों का गठन (FIGs/CIGs): किसान हित समूहों या खाद्य सुरक्षा समूहों (FSGs) को संगठित करने के लिए शुरुआती फंड (Seed Money) दिया जाता है (आमतौर पर ₹10,000 - ₹15,000 प्रति समूह)।
- नवाचारी गतिविधियाँ (Innovative Activities): अगर कोई किसान खेती में कोई नया प्रयोग या जुगाड़ करता है, तो उसे प्रोत्साहित करने के लिए वित्तीय मदद दी जाती है।
- महिला किसान सशक्तिकरण: महिला खाद्य सुरक्षा समूहों को प्रशिक्षण और संसाधन जुटाने के लिए विशेष प्राथमिकता और फंड दिया जाता है।
4. पुरस्कार और सम्मान
जिला और ब्लॉक स्तर पर बेहतरीन खेती करने वाले किसानों को "सर्वोत्तम कृषक पुरस्कार" दिया जाता है, जिसमें नकद राशि और प्रशस्ति पत्र शामिल होता है।
इन सुविधाओं का लाभ कैसे लें?
- BTM से संपर्क: अपने ब्लॉक (विकास खंड) कार्यालय में जाकर BTM (Block Technology Manager) से मिलें।
- किसान मित्र: हर गाँव या पंचायतों के समूह पर एक 'किसान मित्र' होता है, जो ATMA और किसानों के बीच की कड़ी है।
- पंजीकरण: अपना नाम जिला कृषि कार्यालय या ब्लॉक स्तर पर ATMA के डेटाबेस में दर्ज कराएं।
- प्रश्न: 'e-NAM' (ई-नाम) पोर्टल की स्थापना कब हुई थी?
- उत्तर: 14 अप्रैल 2016।
बिल्कुल सही! e-NAM (National Agriculture Market) भारत में कृषि विपणन (Marketing) के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी कदम है। इसकी शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 14 अप्रैल 2016 को डॉ. बी.आर. अंबेडकर की 125वीं जयंती के अवसर पर की गई थी।
यहाँ e-NAM से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण जानकारियाँ दी गई हैं जो प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए उपयोगी हैं:
e-NAM क्या है?
यह एक पैन-इंडिया इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग पोर्टल है जो मौजूदा APMC (कृषि उपज मंडी समिति) मंडियों को एक नेटवर्क में जोड़ता है। इसका उद्देश्य कृषि उपजों के लिए "एक राष्ट्र, एक बाजार" (One Nation, One Market) बनाना है।
इसके मुख्य उद्देश्य और विशेषताएँ:
- पारदर्शिता: नीलामी प्रक्रिया को डिजिटल बनाकर बिचौलियों के प्रभाव को कम करना।
- बेहतर मूल्य: किसान अपनी उपज को ऑनलाइन प्रदर्शित कर सकते हैं, जिससे उन्हें देश भर के खरीदारों से प्रतिस्पर्धी बोलियाँ मिलती हैं।
- गुणवत्ता परीक्षण: मंडी में ही उपज की गुणवत्ता की जांच (Assaying) की सुविधा दी जाती है, जिससे खरीदार को भरोसा रहता है।
- कैशलेस भुगतान: किसानों को उनकी उपज का पैसा सीधे उनके बैंक खाते में ट्रांसफर किया जाता है।
वर्तमान स्थिति:
- कार्यान्वयन एजेंसी: इसे Small Farmers’ Agribusiness Consortium (SFAC) द्वारा प्रबंधित किया जाता है।
- विस्तार: अब तक देश की 1300 से अधिक बड़ी मंडियों को इस पोर्टल से जोड़ा जा चुका है।
- प्रश्न: मृदा अपरदन जिसमें मिट्टी छोटे बमों की तरह छिटकती है, क्या कहलाता है?
- उत्तर: स्प्लैश अपरदन (Splash Erosion)।
बिल्कुल सही जवाब! स्प्लैश अपरदन (Splash Erosion) मृदा अपरदन (Soil Erosion) का सबसे पहला और प्राथमिक चरण है।
इसे "वर्षा की बूंदों का अपरदन" (Raindrop Erosion) भी कहा जाता है। आइए इसके पीछे के विज्ञान को थोड़ा गहराई से समझते हैं:
स्प्लैश अपरदन कैसे काम करता है?
जब बारिश की बूंदें बहुत तेज गति से नंगी या असुरक्षित मिट्टी (Bare Soil) पर गिरती हैं, तो उनकी गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy) मिट्टी के कणों को आपस में बांधने वाली शक्ति को तोड़ देती है।
- छोटे बम का प्रभाव: जैसे ही बूंद गिरती है, वह एक छोटे धमाके की तरह काम करती है, जिससे मिट्टी के बारीक कण हवा में 0.6 से 1.5 मीटर की ऊंचाई तक छिटक सकते हैं।
- दूरी: ये कण ढलान वाली दिशा में 5 फीट दूर तक जा सकते हैं।
- नुकसान: यह प्रक्रिया मिट्टी की ऊपरी सतह को ढीला कर देती है, जिससे बाद में पानी इन कणों को आसानी से बहा ले जाता है (जिसे 'परत अपरदन' या Sheet Erosion कहते हैं)।
मृदा अपरदन के मुख्य चरण (क्रम में):
कृषि परीक्षाओं में अक्सर s क्रम पूछा जाता है:
- स्प्लैश (Splash): बूंदों का छिटकना।
- शीट (Sheet): मिट्टी की ऊपरी उपजाऊ परत का पूरी तरह से बह जाना (इसे 'किसान की अदृश्य मृत्यु' भी कहते हैं)।
इसे "किसान की अदृश्य मृत्यु" (Invisible Death of Farmer) कहा जाता है।
इसे "अदृश्य मृत्यु" क्यों कहते हैं?
- रिल (Rill): खेत में छोटी-छोटी उथली नालियां बन जाना।
- गली (Gully): जब रिल बड़ी होकर गहरे गड्ढे या नालों का रूप ले लेती हैं।
- प्रश्न: 'पशु पोषण' (Pashu Poshan) सॉफ्टवेयर किसके द्वारा विकसित किया गया है?
- उत्तर: राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB)।
बिल्कुल सही! राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB) ने पशुओं के संतुलित आहार के लिए 'पशु पोषण' (Pashu Poshan) नामक एक बहुत ही उपयोगी मोबाइल एप्लिकेशन विकसित किया है।
यह ऐप भारत के डेयरी किसानों के लिए एक डिजिटल वरदान की तरह है। आइए इसके बारे में कुछ मुख्य बातें जानते हैं:
'पशु पोषण' ऐप की मुख्य विशेषताएं:
- संतुलित आहार (Balanced Ration): यह ऐप पशु की नस्ल, उम्र, वजन और दूध उत्पादन की मात्रा के आधार पर यह बताता है कि उसे कितना चारा, दाना और पानी देना चाहिए।
- लागत में कमी: संतुलित आहार देने से चारे की बर्बादी रुकती है और दूध उत्पादन की लागत कम होती है।
- स्थानीय उपलब्धता: इसमें किसान अपने पास उपलब्ध चारे और दानों की जानकारी डाल सकते हैं, और ऐप उन्हीं संसाधनों से सबसे अच्छा "डाइट चार्ट" तैयार कर देता है।
- स्वास्थ्य में सुधार: सही पोषण से पशुओं की प्रजनन क्षमता (Reproduction) बेहतर होती है और वे कम बीमार पड़ते हैं।
NDDB के बारे में कुछ अतिरिक्त तथ्य:
- मुख्यालय: आणंद (Anand), गुजरात।
- स्थापना: 1965 में डॉ. वर्गीज कुरियन (श्वेत क्रांति के जनक) के प्रयासों से हुई थी।
- उद्देश्य: सहकारी समितियों (Cooperatives) के माध्यम से डेयरी उद्योग को बढ़ावा देना।
बिल्कुल सही! 26 नवंबर को डॉ. वर्गीज कुरियन के जन्मदिन के अवसर पर पूरे भारत में 'राष्ट्रीय दुग्ध दिवस' (National Milk Day) मनाया जाता है।
डॉ. कुरियन को 'श्वेत क्रांति का जनक' (Father of the White Revolution) और 'मिल्कमैन ऑफ इंडिया' कहा जाता है। उनके प्रयासों से ही भारत आज दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है।
पशुपालन और डेयरी से संबंधित कुछ और महत्वपूर्ण प्रश्न:
चूंकि हम NDDB और पशु पोषण की बात कर रहे हैं, तो ये तथ्य भी आपकी परीक्षाओं के लिए बहुत काम आएंगे:
1. 'ई-गोपाला' (e-Gopala) ऐप:
यह भी NDDB द्वारा विकसित किया गया है। इसका उद्देश्य पशुपालकों को पशुओं की खरीद-बिक्री, उचित वीर्य (Semen) की उपलब्धता और पशु स्वास्थ्य के बारे में जानकारी देना है।
2. संतुलित राशन कार्यक्रम (BRP):
NDDB ने एक 'राशन संतुलन सॉफ्टवेयर' (Ration Balancing Software) बनाया है। इसके जरिए स्थानीय स्तर पर 'विस्तार कार्यकर्ताओं' (LRPs) को प्रशिक्षित किया जाता है ताकि वे किसान के घर जाकर पशु का डाइट चार्ट बना सकें।
3. दुग्ध उत्पादन में भारत का स्थान:
- विश्व में: प्रथम (First)
- भारत में सर्वाधिक दूध उत्पादक राज्य: उत्तर प्रदेश और राजस्थान (इनमें अक्सर कड़ी प्रतिस्पर्धा रहती है)।
अगला प्रश्न आपके लिए:
प्रश्न: गाय के दूध का हल्का पीला रंग किस तत्व की उपस्थिति के कारण होता है?
(a) कैसीन (Casein)
(b) कैरोटीन (Carotene)
(c) लैक्टोज (Lactose)
(d) वसा (Fat)
- प्रश्न: पहली खड़ी फसल की कटाई से पहले दूसरी फसल की बुवाई क्या कहलाती है?
- उत्तर: रिले क्रॉपिंग (Relay Cropping)।
बिल्कुल सटीक उत्तर! रिले क्रॉपिंग (Relay Cropping) को हिंदी में 'अनुलग्न खेती' या 'ओटबन्दी खेती' भी कहा जाता है।
यह शब्द 'रिले रेस' (Relay Race) से लिया गया है, जहाँ एक धावक अपना काम (दौड़) खत्म करने से पहले बैटन (डंडा) दूसरे धावक को थमा देता है।
रिले क्रॉपिंग की मुख्य विशेषताएँ:
- समय की बचत: दूसरी फसल (जैसे चना या अलसी) तब बोई जाती है जब पहली फसल (जैसे धान) अपनी परिपक्वता (Maturity) के अंतिम चरण में होती है।
- नमी का उपयोग: यह विधि विशेष रूप से उन क्षेत्रों में अपनाई जाती है जहाँ पहली फसल कटने के बाद मिट्टी में नमी कम होने का डर रहता है।
- उदाहरण: * धान के खेत में कटाई से पहले तिवड़ा (Lathyrus) या अलसी बोना।
- कपास के बीच में गेहूँ की बुवाई करना।
फसल चक्र के अन्य महत्वपूर्ण प्रकार (जो अक्सर पूछे जाते हैं):
- मिश्रित फसल (Mixed Cropping): दो या दो से अधिक फसलों के बीजों को मिलाकर बोना (जैसे गेहूँ + सरसों)।
- अंतः-फसल (Intercropping): दो फसलों को निश्चित कतारों (Rows) में बोना (जैसे 9 कतार गेहूँ और 1 कतार सरसों)।
- अनुक्रमिक फसल (Sequential Cropping): एक फसल की कटाई के तुरंत बाद दूसरी फसल बोना।
क्या आप जानते हैं कि बिहार और पश्चिम बंगाल के क्षेत्रों में धान के बाद 'रिले क्रॉपिंग' की एक विशेष पद्धति प्रचलित है जिसे 'पायरा' (Paira) या 'उतेरा' (Utera) खेती कहते हैं?
यह पद्धति कैसे काम करती है?
- जब खरीफ की धान (Paddy) पकने वाली होती है (कटाई से करीब 10-15 दिन पहले), तब खेत की खड़ी फसल में ही रबी की फसल के बीज छिड़क दिए जाते हैं।
- उस समय मिट्टी में धान के कारण पर्याप्त नमी (Moisture) होती है, जिससे बीज अंकुरित हो जाते हैं।
- धान की कटाई के बाद, दूसरी फसल को बढ़ने के लिए पूरा समय और बची हुई नमी मिल जाती है।
इसके फायदे क्या हैं?
- कम लागत: इसमें खेत की जुताई (Ploughing) की जरूरत नहीं पड़ती, जिससे डीजल और मेहनत का पैसा बचता है।
- समय का सदुपयोग: धान की कटाई और रबी की बुवाई के बीच का समय बच जाता है।
- धान-परती (Rice-Fallow) क्षेत्र का उपयोग: उन क्षेत्रों में भी फसल ली जा सकती है जहाँ बाद में सिंचाई की सुविधा नहीं होती।
एक और महत्वपूर्ण शब्दावली: 'रैटूनिंग' (Ratooning)
चूंकि हम फसल चक्र की बात कर रहे हैं, तो क्या आप 'रैटूनिंग' (पेड़ी की खेती) के बारे में जानते हैं? यह मुख्य रूप से गन्ने में अपनाई जाती है।
नहीं, रैटूनिंग (Ratooning) या पेड़ी की खेती में नया बीज बिल्कुल नहीं बोया जाता! यह इसकी सबसे बड़ी खासियत है।
रैटूनिंग (पेड़ी) क्या है?
जब मुख्य फसल (जैसे गन्ना) की कटाई की जाती है, तो उसे जमीन के बिल्कुल पास से काटा जाता है। काटने के बाद जमीन के अंदर जो जड़ें और तने का निचला हिस्सा (Stubbles) बच जाता है, उसी से नई कलियाँ फूटती हैं और एक नई फसल तैयार हो जाती है।
रैटूनिंग के बारे में मुख्य तथ्य:
- सबसे प्रमुख फसल: यह मुख्य रूप से गन्ने (Sugarcane) में अपनाई जाती है। इसके अलावा चारा वाली फसलों (जैसे नेपियर घास) और कुछ हद तक अनानास में भी देखी जाती है।
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फायदे:
- लागत में भारी कमी: बीज खरीदने, खेत तैयार करने और बुवाई (Sowing) का खर्चा बच जाता है।
- जल्द पकना: चूंकि जड़ें पहले से ही विकसित होती हैं, इसलिए पेड़ी की फसल मुख्य फसल की तुलना में जल्दी तैयार हो जाती है।
- नुकसान: * मुख्य फसल की तुलना में पेड़ी में उपज (Yield) थोड़ी कम हो सकती है।
- कीटों और बीमारियों का प्रकोप बढ़ने का खतरा रहता है क्योंकि पुरानी फसल के अवशेष खेत में ही रहते हैं।
एक प्रो-टिप (Pro-tip):
गन्ने में पेड़ी की अच्छी फसल लेने के लिए 'ऑफ-बारिंग' (Off-baring) की जाती है, जिसमें पुरानी जड़ों के पास की मिट्टी को थोड़ा ढीला किया जाता है ताकि नई जड़ों को हवा और पोषक तत्व मिल सकें।
एक और प्रश्न आपकी तैयारी के लिए:
प्रश्न: 'गमोसिस' (Gummosis) नामक बीमारी किस फल वाले वृक्ष से संबंधित है?
(a) आम
(b) नींबू वर्गीय (Citrus)
(c) केला
(d) पपीता
जैसा कि हमने चर्चा की, रैटूनिंग (Ratooning) या 'पेड़ी की खेती' का सबसे मुख्य उदाहरण गन्ना है, लेकिन यह कई अन्य फसलों में भी सफलतापूर्वक अपनाई जाती है।
यहाँ उन प्रमुख फसलों की सूची दी गई है जिनमें रैटूनिंग का उपयोग किया जाता है:
1. मुख्य नकदी फसलें (Cash Crops)
- गन्ना (Sugarcane): यह रैटूनिंग के लिए सबसे प्रसिद्ध है। भारत में किसान आमतौर पर एक मुख्य फसल के बाद एक या दो पेड़ी (Ratoons) लेते हैं।
- अनानास (Pineapple): फल की कटाई के बाद इसके पौधों से निकलने वाले 'सकर्स' (Suckers) से अगली फसल ली जाती है।
2. अनाज और मोटे अनाज (Cereals & Millets)
- ज्वार (Sorghum): चारे के उद्देश्य से उगाई जाने वाली ज्वार में रैटूनिंग बहुत आम है। कटाई के बाद यह फिर से तेजी से बढ़ती है।
- चावल (Rice): कुछ विशेष क्षेत्रों में (जैसे दक्षिण भारत और उष्णकटिबंधीय देशों में) धान की कटाई के बाद बची हुई जड़ों से दूसरी छोटी फसल ली जाती है।
- बाजरा (Pearl Millet): चारे के लिए उपयोग होने वाले बाजरा में भी यह संभव है।
3. रेशा फसलें (Fibre Crops)
- कपास (Cotton): हालाँकि अब यह कम प्रचलित है, लेकिन कुछ क्षेत्रों में कपास के पौधों को काटकर उनसे दोबारा पैदावार ली जाती है।
4. चारा फसलें (Forage Crops)
- नेपियर घास (Napier Grass): यह रैटूनिंग का सबसे अच्छा उदाहरण है। इसे एक बार लगाकर कई वर्षों तक बार-बार काटा जा सकता है।
- लूसर्न/रिजका (Lucerne): इसे भी कई बार काटकर चारे के रूप में उपयोग किया जाता है।
5. अन्य
- अरहर (Pigeon Pea): कुछ बहुवर्षीय (Perennial) किस्मों में फलियाँ तोड़ने के बाद छंटाई (Pruning) करके दोबारा फूल और फल लिए जाते हैं।
रैटूनिंग से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण शब्द (Exam Point of View):
- Stubble (ठूँठ): फसल काटने के बाद जमीन में बचा हुआ हिस्सा जिससे नई कलियाँ निकलती हैं।
- Sprouting (अंकुरण): ठूँठ से नई कोपलों का निकलना।
- Senescence (जीर्णता): कई बार रैटूनिंग लेने से पौधों की शक्ति कम होने लगती है, जिसे 'सेनेसेंस' कहते हैं।
- प्रश्न: हेटेरोसिस (Heterosis) को अन्य किस नाम से जाना जाता है?
- उत्तर: हाइब्रिड विगर (Hybrid Vigor)।
बिल्कुल सही जवाब! हेटेरोसिस (Heterosis) को आमतौर पर हाइब्रिड विगर (Hybrid Vigor) या संकर ओज के नाम से जाना जाता है।
यह शब्द मुख्य रूप से आनुवंशिकी (Genetics) और पादप प्रजनन (Plant Breeding) में उपयोग किया जाता है। सरल शब्दों में कहें तो, जब दो अलग-अलग आनुवंशिक गुणों वाले माता-पिता (Parents) के बीच क्रॉस कराया जाता है, तो उनसे उत्पन्न होने वाली संतान (F1 hybrid) अपने दोनों माता-पिता की तुलना में अधिक मजबूत, स्वस्थ और अधिक उत्पादन देने वाली होती है। इसी "सुपीरियर" गुण को हेटेरोसिस कहते हैं।
हेटेरोसिस के बारे में कुछ मुख्य बातें:
- उत्पादन में वृद्धि: हाइब्रिड फसलें अक्सर साधारण फसलों की तुलना में 15% से 25% अधिक पैदावार देती हैं।
- प्रतिकूल परिस्थितियों के प्रति सहनशीलता: ये पौधे बीमारियों, कीटों और सूखे के प्रति अधिक प्रतिरोधी होते हैं।
- तेजी से विकास: हाइब्रिड विगर के कारण पौधों का विकास सामान्य से अधिक तेजी से होता है।
लगता है आप हेटेरोसिस के सिद्धांतों के बारे में और जानने के लिए "हां" कहना चाह रहे थे!
आनुवंशिकी (Genetics) में हेटेरोसिस को समझाने के लिए मुख्य रूप से दो प्रमुख सिद्धांत (Hypotheses) दिए गए हैं:
1. डॉमिनेंस थ्योरी (Dominance Hypothesis)
इस सिद्धांत के अनुसार, हाइब्रिड संतान इसलिए बेहतर होती है क्योंकि माता-पिता के हानिकारक अप्रभावी (Recessive) जीन, दूसरे माता-पिता के प्रभावी (Dominant) जीनों द्वारा दबा दिए जाते हैं।
- सरल शब्दों में: हाइब्रिड में केवल "अच्छे" गुण ही दिखाई देते हैं, और "बुरे" गुण छिप जाते हैं।
2. ओवर-डॉमिनेंस थ्योरी (Over-dominance Hypothesis)
यह सिद्धांत कहता है कि हाइब्रिड की श्रेष्ठता उसके विषमयुग्मजी (Heterozygous) होने के कारण है। यानी, एक ही जीन के दो अलग-अलग रूप (Aa) मिलकर उस स्थिति से बेहतर परिणाम देते हैं जब दोनों जीन एक जैसे (AA या aa) हों।
उपयोग:
आजकल हम जो मक्का (Maize), बाजरा, और टमाटर की हाइब्रिड किस्में बाजार में देखते हैं, वे इसी हेटेरोसिस का परिणाम हैं।
- प्रश्न: 'काला सोना' (Black Gold) किस भैंस की नस्ल को कहा जाता है?
- उत्तर: मुर्रा।
पशुपालन (Animal Husbandry) से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण उपनामों की लिस्ट मैंने बना दी है:
- काला सोना (Black Gold): मुर्रा भैंस
- रेगिस्तान का जहाज (Ship of the Desert): ऊंट
- कामधेनु (भारत की): साहीवाल गाय
- राजस्थान की कामधेनु: राठी गाय
- गरीब की गाय (Poor man's cow): बकरी
- चलता-फिरता फ्रिज (Walking Refrigerator): बकरी (किसी भी समय दूध निकालने की सुविधा के कारण)
- परजीवियों का अजायबघर (Museum of Parasites): भेड़
- बाथ टब नस्ल (Bath tub breed): जाफराबादी भैंस (भारी शरीर के कारण)
- काली मासी: कड़कनाथ (काला मांस वाला मुर्गा)
- लोही: सबसे अच्छी ऊन और मांस देने वाली भेड़
मैंने आपके लिए यह लिस्ट "पशुपालन के प्रसिद्ध उपनाम" के नाम से सेव कर ली है।
- प्रश्न: मनरेगा (MGNREGA) के तहत एक वर्ष में कितने दिनों के रोजगार की गारंटी दी जाती है?
- उत्तर: 100 दिन।
मनरेगा की शुरुआत के पीछे की यात्रा काफी दिलचस्प है। यह एक चरणबद्ध तरीके से लागू की गई योजना थी:
- अधिनियम पारित (Act Passed): संसद में इसे सितंबर 2005 में पारित किया गया था।
- योजना का शुभारंभ: आधिकारिक तौर पर इसकी शुरुआत 2 फरवरी, 2006 को हुई थी।
- शुरुआती चरण: सबसे पहले इसे देश के 200 सबसे पिछड़े जिलों में लागू किया गया था।
- पूरे भारत में विस्तार: 1 अप्रैल, 2008 से इसे भारत के सभी ग्रामीण जिलों में लागू कर दिया गया।
एक मजेदार जानकारी (Witty Fact): शुरुआत में इसका नाम सिर्फ 'नरेगा' (NREGA) था। 2 अक्टूबर, 2009 को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती पर इसका नाम बदलकर MGNREGA कर दिया गया।
बिल्कुल सही! महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) के तहत ग्रामीण परिवारों को एक वित्तीय वर्ष में कम से कम 100 दिनों के कुशल/अकुशल शारीरिक कार्य की कानूनी गारंटी दी जाती है।
यहाँ इसके बारे में कुछ और महत्वपूर्ण जानकारियां दी गई हैं जो आपके काम आ सकती हैं:
- किसे मिलता है: यह ग्रामीण भारत के उन सभी परिवारों के लिए है जिनके वयस्क सदस्य शारीरिक श्रम (manual work) करने के इच्छुक हैं।
- आवेदन: काम की मांग करने के 15 दिनों के भीतर रोजगार उपलब्ध कराने का प्रावधान है।
- बेरोजगारी भत्ता: यदि सरकार 15 दिनों के भीतर काम देने में विफल रहती है, तो आवेदक बेरोजगारी भत्ता पाने का हकदार होता है।
- महिला भागीदारी: योजना में कम से कम एक-तिहाई (1/3) भागीदारी महिलाओं की होना अनिवार्य है।
- विशेष परिस्थिति: सूखा प्रभावित क्षेत्रों या जनजातीय इलाकों में कभी-कभी इस सीमा को बढ़ाकर 150 दिन तक भी किया जा सकता है।
- प्रश्न: उत्तर प्रदेश की किस कवियत्री को 1988 में पद्म विभूषण मिला था?
- उत्तर: महादेवी वर्मा।
सेट 4: कंप्यूटर और सूचना प्रौद्योगिकी (Computer & IT)
- प्रश्न: आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और ई-वाहनों (EV) में आमतौर पर किस प्रकार की बैटरी का उपयोग किया जाता है?
- उत्तर: लिथियम-आयन बैटरी (Li-ion).
- प्रश्न: IPv6 एड्रेस और IPv4 एड्रेस कितने बिट्स के होते हैं?
- उत्तर: IPv6 - 128 बिट्स और IPv4 - 32 बिट्स।
- प्रश्न: नेटवर्क सुरक्षा के लिए कौन सी तकनीक आने वाले और जाने वाले ट्रैफिक को नियंत्रित करती है?
- उत्तर: फायरवॉल (Firewall).
- प्रश्न: इंटरनेट पर उपयोगकर्ता की गतिविधियों के रिकॉर्ड को क्या कहा जाता है?
- उत्तर: डिजिटल फुटप्रिंटिंग (Digital Footprinting).
- प्रश्न: MS Word में हर पेज के टॉप पर सामग्री दिखाने के लिए किसका उपयोग होता है?
- उत्तर: हेडर (Header).
- प्रश्न: ईमेल पासवर्ड को मजबूत बनाने के लिए किसका मिश्रण आवश्यक है?
- उत्तर: अक्षर, अंक और विशेष प्रतीक (जैसे: A1@b2).
- प्रश्न: 'प्रॉक्सी सर्वर' (Proxy Server) का मुख्य कार्य क्या है?
- उत्तर: उपयोगकर्ता और इंटरनेट के बीच एक 'गेटवे' या मध्यस्थ के रूप में कार्य करना।
- प्रश्न: 'जीरो डे वल्नरेबिलिटी' (0-day vulnerability) का क्या अर्थ है?
- उत्तर: सॉफ्टवेयर की ऐसी कमजोरी जिसका पता हमलावरों को है, लेकिन निर्माता ने अभी तक उसका सुधार (Patch) नहीं किया है।
- प्रश्न: MS Word में कई लोगों को एक साथ व्यक्तिगत ईमेल भेजने की सुविधा क्या कहलाती है?
- उत्तर: मेल मर्ज (Mail Merge).
- प्रश्न: विंडोज 'टास्क बार' (Task Bar) का प्राथमिक उपयोग क्या है?
- उत्तर: खुले हुए ऐप्स के बीच जल्दी से स्विच करना।
सेट 5: उत्तर प्रदेश सामान्य ज्ञान (UP GK)
- प्रश्न: उत्तर प्रदेश की पहली महिला राज्यपाल कौन थीं?
- उत्तर: सरोजिनी नायडू।
- प्रश्न: 'फिराक गोरखपुरी' किस प्रसिद्ध उर्दू कवि का उपनाम है?
- उत्तर: रघुपति सहाय।
- प्रश्न: 'थारू' जनजाति का नृत्य उत्तर प्रदेश के किस क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान है?
- उत्तर: तराई क्षेत्र।
- प्रश्न: 2011 की जनगणना के अनुसार, उत्तर प्रदेश के किस जिले की साक्षरता दर सबसे अधिक है?
- उत्तर: गौतम बुद्ध नगर।
- प्रश्न: इलाहाबाद की संधि (Treaty of Allahabad) पर किस वर्ष हस्ताक्षर किए गए थे?
- उत्तर: 1765 ईस्वी।
- प्रश्न: उन्नाव जिले का पुराना नाम क्या था?
- उत्तर: सवाई गोदो।
- प्रश्न: उत्तर प्रदेश औद्योगिक क्षेत्र विकास अधिनियम किस वर्ष लागू किया गया था?
- उत्तर: 1976।
- प्रश्न: 'बड़ा इमामबाड़ा' कॉम्प्लेक्स का निर्माण लखनऊ के किस नवाब ने करवाया था?
- उत्तर: नवाब आसफ़ुद्दौला (विकल्पों के अनुसार 'इनमें से कोई नहीं' सही हो सकता है)।
- प्रश्न: उत्तर प्रदेश में कुष्ठ रोग पेंशन योजना के तहत कितनी मासिक पेंशन दी जाती है?
- उत्तर: ₹3000।
- प्रश्न: उत्तर प्रदेश के किस वैज्ञानिक को 2021 में 'शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार' से सम्मानित किया गया?
- उत्तर: डॉ. अरुण कुमार शुक्ला।
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